राहुल की छुट्टी के पीछे राजपरिवार की तकरार?

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राजप्रासादों के अंदरूनी झगड़ों, मनमुटाव और कलह के हज़ारों क़िस्से इतिहास में दर्ज हैं और कांग्रेस पार्टी में इस समय जो हो रहा है, उसी का एक पन्ना दिखाई देता है.

राहुल गांधी की छुट्टी पर जाने की इच्छा को इस नज़रिए से देखने में कोई हर्ज़ नहीं है.

नए-पुराने की बहस

पार्टी के लोग बता रहे हैं कि राहुल की छुट्टी का संबंध आत्म-चिंतन से अधिक इसी साल बंगलुरु में कांग्रेस के प्रस्तावित महाधिवेशन से भी हो सकता है.

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उनका मानना है कि यह पार्टी नेतृत्व पर दबाव बनाने का प्रयास है कि कमान युवा पीढ़ी को सौंप दी जाए, जिसके लिए इंतज़ार 10 साल से चल रहा है.

पार्टी के जानकार तो यहां तक कहते हैं कि राहुल गांधी के छुट्टी मांगने से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उनकी अर्ज़ी स्वीकार कर ली. वे इसे दबाव के जवाब में डाला गया दबाव मानते हैं.

सोनिया गांधी संभवतः अब तक राहुल की नेतृत्व क्षमता से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं और यह फ़ैसला नहीं कर सकी हैं कि पार्टी के पुराने दिग्गजों को दरकिनार कर सारा ज़िम्मा ‘राहुल ब्रिगेड’ को सौंप दिया जाए. इसका निर्णय शायद बंगलुरु में होना है.

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पार्टी से छुट्टी मांगने की घटनाएं जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के मामले में भी हुई थीं लेकिन दोनों मामलों में पार्टी ने इससे इनकार कर दिया था. तो क्या इसका अर्थ यह है कि इस बार की दुविधा पहले से ज़्यादा बड़ी और कड़ी है?

नए और पुराने नेतृत्व के बीच एक को चुनने की बहस कांग्रेस में पहले भी कई बार हुई थी. उसी तर्ज पर, जैसी अब हो रही है.

परिवार की गद्दी

एक बार बहस के नतीजे में मोतीलाल नेहरू ने महात्मा गांधी को पत्र लिखकर कमान युवा नेतृत्व को सौंपने की सलाह दी.

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उन्होंने यहां तक कहा कि ‘जवाहर टाइप’ नए लोग जितनी जल्दी कमान संभालें, उतना बेहतर क्योंकि पुरानी नस्ल तेज़ी से ख़त्म हो रही है. उनका कहना था कि अगर वल्लभभाई पटेल सबसे उपयुक्त व्यक्ति और विकल्प हैं लेकिन पार्टी अब नए लोगों को चलानी चाहिए.

महात्मा गांधी स्वयं सरदार पटेल के पक्ष में थे. उन्होंने मोतीलाल की सलाह मानने इनकार कर दिया और कहा कि ‘अभी जवाहर का समय नहीं आया है.’

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मोतीलाल नेहरू 1928 में कांग्रेस अध्यक्ष बने और 1929 के लाहौर अधिवेशन में पार्टी की कमान जवाहरलाल नेहरू को सौंप दी गई. 45 साल के इतिहास में यह पहला मौक़ा था जब पिता ने अपने पुत्र को पार्टी की ज़िम्मेदारी दी.

कांग्रेस की अध्यक्षता का सवाल 1939 में शायद सबसे गंभीर रूप से उठा, जब सुभाषचंद्र बोस ने गांधी के उम्मीदवार भोगाराजू पट्टाभि सीतारमैया को 205 मतों से हरा दिया.

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गांधी इससे असंतुष्ट थे. उन्होंने कहा था, ‘पट्टाभि की हार मेरी हार है.’

नेहरू 1951 में फिर अध्यक्ष बने और 1954 के कलकत्ता अधिवेशन तक पद पर रहे. उसके बाद पांच साल, 1958 तक, यूएन धेबर ने यह ज़िम्मेदारी निभाई.

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इसे केवल एक राजनीतिक संयोग कैसे कहा जा सकता है कि इंदिरा गांधी 1958 में छुट्टी पर जाना चाहती थीं और 1959 के दिल्ली अधिवेशन में उन्हें पार्टी अध्यक्ष चुन लिया गया.

अगले साल उन्हें यह पद फिर देने की बात उठी, पर इंदिरा गांधी ने ख़ुद इससे इनकार कर दिया और नीलम संजीव रेड्डी अध्यक्ष बने.

उपेक्षा संभव नहीं

रेड्डी के बाद दक्षिण भारत से ही 1964 में कामराज और 1968 में निजलिंगप्पा ने पार्टी की ज़िम्मेदारी संभाली.

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पीवी नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व काल को छोड़कर कांग्रेस की अध्यक्षता नेहरू गांधी परिवार की राय को सबसे अहम मानकर एक से दूसरे को जाती रही.

सीताराम केसरी इसके अंतिम अपवाद थे, जिनके बाद पार्टी फिर परिवार पर आश्रित हो गई.

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एक अंतर और भी है. आज़ादी से पहले अध्यक्षता के सवाल के केंद्र में पार्टी होती थी, 1998 के बाद एक परिवार है, परिवार को पार्टी में विकल्प-शून्य समझा जाता है और ऐसे में केवल एक ही व्यक्ति इसका निर्णय कर सकता है- सोनिया गांधी.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सारी चुनावी विफलताओं और अंशकालिक नेतृत्व के बावजूद दस जनपथ के राजप्रासाद के लिए राहुल गांधी की उपेक्षा करना संभव नहीं होगा.

माना जा रहा है कि दबाव वाली छुट्टी से लौटकर राहुल गांधी पार्टी नेतृत्व संभाल लेंगे, जिस पर बंगलुरु में मुहर लग जाएगी, पार्टी देर-सबेर इस फैसले के पक्ष में खड़ी होगी.

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