जहाँ कैंसर के डर से कोई पानी भी नहीं पीता...

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दिल्ली से सटे गौतम बुद्ध नगर यानी नोएडा के कुछ गांवों में कैंसर के मरीज़ों की संख्या बढ़ने के चलते लड़के-लड़कियों की शादी तक नहीं हो पा रही है.

लोग यहां चाय, पानी तक पीने से परहेज़ करते हैं और स्थानीय निवासियों को अपने घर-बार तक बेचने पड़े हैं.

लेकिन प्रशासन का कहना है कि कैंसर के मरीज़ यहां राष्ट्रीय औसत से कम हैं और पानी में कैंसर के कण बिल्कुल भी नहीं पाए गए हैं.

पढ़िए पूरी रिपोर्ट

प्रताप सिंह अपना घर बेचने के लिए बहुत बेचैन हैं क्योंकि उनकी शादी नहीं हो पा रही है.

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बागपत के मूल निवासी 22 वर्षीय प्रताप पिछले साल फरवरी में अपने दो भाइयों, दिनेश और रमेश के साथ गौतम बुद्ध नगर के बिसरख खंड के खेड़ा धर्मपुरा गांव में रहने आए थे.

प्रताप प्रॉपर्टी का व्यवसाय करने लगे तो उनके भाई ग़ाज़ियाबाद में फ़ैक्ट्रियों में काम करने लगे.

लेकिन जब पिछले साल जुलाई में धर्मपुरा का नाम बड़ी संख्या में कैंसर मरीज़ों की वजह से सुर्खियों में आया तो दिनेश और रमेश अपनी प्रॉपर्टी बेचकर ग़ाज़ियाबाद बॉर्डर पर लोनी में शिफ़्ट हो गए.

उधर प्रताप ने शादी करने का विचार किया. उनका कहना है कि दस लड़कियों के परिजन उन्हें सिर्फ़ इसलिए ख़ारिज कर चुके हैं क्योंकि इलाके में कैंसर के मरीज़ बहुत ज़्यादा हैं.

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हीरो मोटर्स में काम करने वाले खेड़ा धर्मपुरा के ही 21 वर्षीय युवक रोशन शर्मा की सगाई दादरी में हुई थी. लेकिन तीन महीने पहले ही धर्मपुरा की कैंसर कुख्याति के चलते उनकी शादी टूट गई.

धर्मपुरा के नज़दीक खेड़ा हाथीपुरा गांव के रियल स्टेट एजेंट मिट्ठू को अपने छोटे भाई की शादी करवाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा.

खेड़ा धर्मपुरा और हाथीपुरा के अलावा बिसरख ब्लॉक में आधा दर्जन गांवों- छपरौला, अच्छेजा, सादोपुर, सादुल्लापुर, दुजाना और बिशॉली- में लोगों को अपने बेटे, बेटियों की शादी करने में दिक्कत आ रही हैं.

'ज़मीन में ज़हर'

लेकिन ये सारे लोग इलाके में कैंसर के मामलों का प्रचार करने के लिए मीडिया को भी ज़िम्मेदार मानते हैं.

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और तो और इलाके में कैंसर और भूजल प्रदूषण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए काम करने वाले सामाजिक समूह, जय हो, को भी दुजाना गांव में लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा.

खेड़ा धर्मपुरा में इसके सदस्य अनिल मावी ने कहा, "उन्होंने हम पर शादियां रोकने और इस बीमारी की लगातार मीडिया कवरेज के ज़रिए अविवाहितों की संख्या बढ़ाने का आरोप लगाया."

शादी और प्रॉपर्टी को छोड़िए यहां आने वाले लोग पानी और चाय पीने तक से बचते हैं.

नरेश मावी कहते हैं, "हम महसूस कर सकते हैं कि वह डर रहे हैं. लोग भूजल में बनी चाय तक नहीं पीते."

स्थानीय लोग विवाह समारोह के भोज में भी खाना आरओ के पानी से बनवाने पर मजबूर हैं. क्योंकि सैकड़ों बोतलें सिर्फ़ खाना बनाने में ही इस्तेमाल हो जाती हैं, इसलिए शादियों का ख़र्च भी बढ़ गया है.

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Image caption खेड़ा धर्मपुरा की बाला देवी स्तन कैंसर की शिकार हैं.

जीटी रोड के नज़दीक छपरौला औद्योगिक क्षेत्र के पास स्थित आठ गांवों में पिछले पांच साल में- फेफड़े, गले, दिमाग, स्तन, प्रोस्टेट, ब्लड कैंसर के चलते कई मौतें हो गई हैं.

जय हो के अध्यक्ष योगेश नागर ने प्रदूषण फैलाने वाली कंपनयों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाने की मांग को लेकर याचिका दायर की है.

इसमें कहा गया है कि छपरौला में 250 छोटे, मध्यम और बड़े उद्योग हैं (जिनमें से ज़िला प्रशासन के पास सिर्फ़ 36 का रजिस्ट्रेशन है). इनमें से ज़्यादातर फ़ैक्ट्रियाँ औद्योगिक कचरे को बिना ट्रीटमेंट के सीधे खुले हुए नालों में डाल रहे हैं या फिर रिवर्स बोरिंग के ज़रिए ज़मीन में."

'औसत से कम बीमार'

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कैंसर इस इलाके के संसाधनों को भी सोख रहा है. यह बीमारी लोगों को अपनी कृषि भूमि बेचने पर मजबूर कर रही है.

खेड़ा धर्मपुरा के एक किसान सुखपाल सिंह को पिछले डेढ़ साल से स्तन कैंसर से पीड़ित अपनी बीवी के इलाज के लिए पांच बीघा ज़मीन बेचनी पड़ी.

दुजाना गांव में रहने वाले यामाहा मोटर्स के कर्मचारी प्रवेश के पिता रविंदर नागर पिछले एक पखवाड़े से बिस्तर पकड़े हैं और प्रवेश का दावा है कि उनके इलाज पर 40 लाख रुपये ख़र्च हो चुके हैं.

फेफड़ों के कैंसर के चलते रविंदर नागर का पिछले चार साल में 35 किलो वजन कम हुआ है (100 किलो में से) और वह अपने भूतकाल की पीली परछाई भर नज़र आते हैं.

उधर पानी के प्रदूषण और इस आशंका के चलते कि इसकी वजह से कैंसर होता है, इलाके में मिनरल वाटर इंटस्ट्री तेजी से फल फूल रही है.

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कई निजी वाटर प्लांट इलाके में काम करने लगे हैं.

हालांकि ज़िला स्वास्थ्य विभाग इस गुल-गपाड़े में शामिल नज़र आता है. पिछले साल हुए इलाके के एक सर्वेक्षण के अनुसार एक लाख की आबादी पर 39 कैंसर के मरीज़ मिले थे (जो राष्ट्रीय औसत से एक कम है).

गौतम बुद्ध नगर के ज़िला मैजिस्ट्रेट एनपी सिंह ने कहा कि गांवों से लिए गए पानी के नमूनों में किसी तरह के कैसर के कण नहीं पाए गए हैं.

(पहचान छुपाने के लिए कुछ नाम बदल दिए गए हैं.)

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