हाँ, मैं तालिबानी सोच वाला हूं: एपी सिंह

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भारत सरकार ने दिल्ली गैंगरेप पर बनी डॉक्यूमेंट्री पर प्रतिबंध लगा दिया है.

मीडिया और संसद में इस मुद्दे पर काफ़ी कुछ कहा गया है.

जहां कुछ लोग स्वतंत्र फ़िल्मकार लेज़्ली उडविन की डॉक्यूमेंट्री पर प्रतिबंध का समर्थन कर रहे हैं, दूसरी ओर, प्रतिबंध की आलोचना भी हो रही है.

डॉक्यूमेंट्री पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद बीबीसी संवाददाता रूपा झा ने घटना के दोषी मुकेश सिंह के वकील एपी सिंह से बात की.

इस बातचीत के कुछ हिस्से.

क्या डॉक्यूमेंट्री पर प्रतिबंध लगना चाहिए था?

डॉक्यूमेंट्री पर प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए. विचारों की स्वतंत्रता होनी चाहिए. अभियुक्त को भी अपनी बात कहने का अधिकार होना चाहिए. वह मृतात्मा के बारे में क्या कह रहा है, यह उसकी अपनी समझ की बात है.

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हालांकि मृतका के बारे में नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उससे भावनाएं जुड़ी होती हैं, लेकिन उसे आप विचारों से कैसे रोक लेंगे?

प्रतिबंध के समर्थकों का कहना है कि ऐसे लोगों को, विचारों को मंच देने से माहौल ख़राब हो रहा है.

मीडिया पुलिस नहीं है, उसे दोनों पक्ष रखने चाहिए. एक पक्ष ने यह कहा, दूसरे ने यह कहा. आप फ़ैसला नहीं कर सकते.

लेकिन लोगों का यह भी कहना है कि ज़्यादातर मर्दों की मानसिकता ऐसी ही है.

नहीं, मर्दों की मानसिकता ऐसी नहीं है. औरत को बचाने वाला कौन होता है? मर्द ही होता है. औरत को मां, बहन मर्द ही कहता है. मर्द ही पति बनकर औरत की रक्षा भी करता है, उसके लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देता है. बेटी का पिता भी मर्द ही होता है.

आदमी अपना पूरा जीवन परिवार के लिए लगा देता है. उस परिवार में मां भी होती है, बहन, पत्नी, बेटी, भतीजी भी होती है. महिलाओं की रक्षा करने का जज़्बा पुरुष से अधिक किसमें हो सकता है?

इस डॉक्यूमेंट्री में आपने जो बातें कहीं हैं....

मैं आज भी उन पर कायम हूं. मेरी मां, मेरी पत्नी, मेरी बेटी- उनके लिए मैं ज़िम्मेदार हूं, मैं उनका अभिभावक हूं. उन्हें कोई शिकायत नहीं है. अगर वह बीबीसी से शिकायत करने जाएं तो आप इसका विरोध कीजिए. वह गृह मंत्री राजनाथ सिंह के पास जाएं तो वह कार्रवाई करें. वह दिल्ली पुलिस कमिश्मर के पास जाएं तो वह एक्शन लें.

आपने इस डॉक्यूमेंट्री में कहा है कि अगर आपकी बेटी अपनी मर्ज़ी से या आपकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ किसी के साथ घूमने जाए तो आप उसे मार देंगे?

हाँ, वह बग़ैर अनुमति के किसी मर्द के साथ बाहर जाए और किसी से संबंध बनाए तो बिल्कुल मार दूंगा. उसे आग लगाकर जला दूंगा.

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तो क्या महिलाओ को यह चुनने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह क्या करना चाहती हैं?

महिलाओं की पसंद पिता पर निर्भर होनी चाहिए, महिलाओं की पसंद भाई पर निर्भर होनी चाहिए, महिलाओं की पसंद अपने परिवार के मुखिया पर निर्भर होनी चाहिए. उस मुखिया पर, जिसने अपना जीवन परिवार के लिए, उस महिला के लिए, उस बच्ची के लिए समर्पित कर दिया है.

क्या यही बात आप अपने बेटे पर भी लागू करते हैं?

बिल्कुल. बेटी को थप्पड़ बाद में मारूंगा, बेटे को तो पकड़कर पीटना शुरू कर देता हूं कि यह ग़लत कैसे किया तूने. बिल्कुल मारूंगा, मार डालूंगा और लोग ऐसे लड़कों को मार डालते हैं. मेरठ में आप देख लीजिए, यूपी में आप देख लीजिए.

क्या यह सही है? औरतों को इस तरह मार डालना क्या सही है?

बिल्कुल सही है. लोगों का रवैया सुधारात्मक होना चाहिए, दंडात्मक होना चाहिए. आप कहते हैं इसको दंड नहीं देना और इसी का परिणाम है कि गुड़गांव में एक छोटा सा बच्चा पिस्तौल लेकर पहुंच जाता है और अपने साथी को गोली मार देता है.

आपने जो अनुशासन ख़त्म कर दिया, बच्चों में डर ख़त्म कर दिया, उसी का परिणाम है कि एक बच्चा अपना अपहरण करवाकर अपने पिता से फिरौती वसूल करता है.

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लेकिन निर्भया अगर अपने दोस्त के साथ फ़िल्म देखने गई तो क्या उसका वह हश्र होना चाहिए था?

मैंने उसके लिए तो कुछ कहा ही नहीं है. मैंने जो कहा है वह मेरी बहन, मेरी बेटी के लिए था.

अगर आपकी बहन या बेटी बाहर निकलती हैं, जैसे निर्भया निकली थी....

हाँ, अगर मेरी बेटी घर के बाहर निकलती है और रात के दो बजे तक मैं पता नहीं करना चाहता कि वह कहां है, तो दुनिया में मैं नहीं होउंगा या वह नहीं होगी. हो सकता है अगली सुबह इस दुनिया में दोनों ही नहीं हो.

मैं उस राजपरिवार से नहीं हूं कि ड्राइवर और दोस्त रात को दो बजे मेरी बेटी को शराब के नशे में घर में लिटा कर जाएं. मैं दरवाज़ा खोलूं और देखूं कि अच्छा यह मेरी बेटी का ब्वॉयफ़्रेंड है. रात को तीन बजे कोई मेरी बेटी को शराब के नशे में धुत्त घर छोड़ जाए और उसके कपड़े हटे हुए हों. ऐसे में अगली सुबह इस दुनिया में या तो मैं नहीं रहूंगा या वह नहीं होगी.

तो भारत में औरतों को मर्दों यानी पिता, पति और भाई की बात ही सुननी चाहिए और उन्हीं के हिसाब से ज़िंदगी जीना चाहिए?

बिल्कुल. तभी समाज बनेगा, तभी देश का निर्माण होगा. हमारी सोच है कि धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया लेकिन चरित्र चला गया तो हमारा सब कुछ चला गया.

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लेकिन अगर 21वीं सदी में कोई महिला, कोई लड़की अपनी मर्ज़ी से कोई फ़ैसला लेना चाहती है तो क्या वह दंडनीय अपराध है?

नहीं, ऐसा नहीं है. वह आए और कहे कि पिताजी मेरी इच्छा रात के दो बजे तक घूमने की है. मैं कहूंगा, बहुत अच्छा बेटी. मैं अपने बेटे या भाई को कहूंगा कि चलो बैठो गाड़ी में, आज रात दो बजे तक घूमेंगे, सुबह चार बजे तक घूमेंगे.

लेकिन, वह लड़की दो बजे रात तक किसी दोस्त से साथ भी तो घूम सकती है, किसी से प्रेम भी तो कर सकती है?

नहीं, शादी से पहले पुरुष दोस्त के साथ घूमने का कोई मतलब नहीं है. फिर आप कहेंगी कि यौन संबंध भी बना सकती है, वह गर्भवती भी हो सकती है, गर्भपात भी करवा सकती है. माफ़ कीजिए, मैं उस परिवार से नहीं हूं कि मैं जब अपनी बेटी या बहन की शादी कराने जाऊं तो मेरे पास एक लिस्ट हो. मैं कहूं कि मेरी बेटी से शादी कर लो और उसके बॉयफ़्रेंडो की लिस्ट है, और वह इतनी बार गर्भपात करवा चुकी है. अब आप बताओ कि कब बारात लेकर मेरे घर आ रहे हो?

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लेकिन मुकेश और उसके साथियों ने जो किया.

वह एकदम अलग विषय है. वह मुझसे संबंधित नहीं है. वह बिल्कुल ग़लत किया. महिला की इज़्ज़त करनी चाहिए. हर सूरत में महिला को सम्मान देना चाहिए, सुरक्षा देनी चाहिए.

और अगर आप केस की बात करें तो लड़के को चोटें नहीं आईं और लड़की ने अपनी जान दे दी. अगर सच्चा प्रेम होता, अगर वाहियात प्रेम न होता, अगर गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड का प्रेम न होता तो लड़का अपनी जान दे देता और लड़की को बचा लेता. ऐसा होता है हमारी सभ्यता और संस्कृति में.

आज समय बदल रहा है, समाज बदल रहा है, महिलाएं बदल रही हैं. ऐसे में आपकी बातें 18वीं सदी की नहीं लगतीं?

हमारी विचारधारा दक़ियानूसी है, हमारी सोच तालिबानी है. लेकिन अगर हमारा परिवार बचता है, हमारा देश बचता है, हमारे देश में बलात्कार ख़त्म हो जाते हैं तो हम तालिबानी हैं. हमें तालिबानी बनना अच्छा लगता है, दकियानूसी बनना अच्छा लगता है. अगर हमारे घर नहीं टूटते हैं, आज अदालतों में तलाक के केस अगर हम कम कर लेते हैं तो दकियानूसी होने में मैं गौरवान्वित महसूस करता हूं.

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