भाजपा ने पीडीपी के आगे हथियार डाल दिए?

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भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद के अलगाववादी नेता मसर्रत आलम को रिहा करने के फ़ैसले ने सरकार में साझीदार भारतीय जनता पार्टी को सचमुच घेर लिया है.

पिछले साल हुए चुनावों में भाजपा को वोट देने वाले पार्टी समर्थक पार्टी पर मुफ़्ती और पीडीपी के सामने पूरी तरह हथियार डाल देने का आरोप लगा रहे हैं.

चुनौती

इस घटना के बाद भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह पार्टी नेतृत्व पर सभी महत्वपूर्ण मुद्दों- धारा 370, अफ़्स्पा, पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों को बसाने और परिसीमन- से समझौता करने का आरोप लगा रहे अपने मतदाताओं को कैसे मनाए.

एक ओर तो पीडीपी अपने मुख्य आधार क्षेत्र कश्मीर में 'ठीक' संदेश पहुंचा रही है तो भाजपा पर अपने मतक्षेत्रों से अपनी बात को दृढ़तापूर्वक रखने का ज़बरदस्त दबाव आ रहा है.

हालांकि भाजपा के लिए एक राहत की ख़बर हालिया घटनाक्रम से आ सकती है.

उल्लेखनीय बात है कि मुफ़्ती के नेतृत्व वाली सरकार ने विहिप नेता प्रवीण तोगड़िया को जम्मू में स्वर्ण जयंती समारोह के लिए रैलियां करने की इजाज़त देना तय कर लिया है.

तोगड़िया राजौरी में एक मामले में वांछित हैं और उमर अब्दुल्लाह सरकार ने उनके राज्य में घुसने पर प्रतिबंध लगा रखा था.

भाजपा की मुश्किलें

राज्य की आठ दिन पुरानी पीडीपी-बीजेपी सरकार के मुख्यमंत्री और पीडीपी के अन्य नेता भाजपा को पहले दिन से ही मुश्किल में डालते रहे हैं.

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शपथ लेते ही मुफ़्ती अलगाववादियों, चरमपंथियों और पाकिस्तान को शांतिपूर्ण चुनाव के लिए धन्यवाद दे दिया. जिसके लिए प्रधानमंत्री को संसद में जवाब देना पड़ा.

इसके बाद एक पीडीपी विधायक ने संसद पर हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरू को फांसी की निंदा करके और उनके शव की मांग कर दी.

इसके बाद मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का आदेश दे दिया जिसके बाद अलगाववादी नेता मसर्रत आलम को रिहा कर दिया गया. मुख्यमंत्री के पास गृह मंत्रालय का भी प्रभार है.

आलम पर अक्तूबर 2010 के प्रदर्शनों में उनकी कथित भूमिका (उन्हें इन प्रदर्शनों का मुख्य रणनीतिकार माना जाता है) को लेकर पीएसए लगाया गया था, जिसमें 100 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

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