कौन हैं मसर्रत आलम?

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बुधवार को रैली में पाकिस्तान का झंडा फ़हराने और नारेबाज़ी के बाद पुलिस ने अलगाववादी नेता मसर्रत आलम बट के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के हवाले से ख़बर है कि जम्मू कश्मीर पुलिस ने मसर्रत आलम के ख़िलाफ़ अनलॉफुल एक्टिविटीज़ (प्रिवेन्शन) एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है.

इस क़ानून के तहत पुलिस ने पाकिस्तान का समर्थन करने वाले नेता सैय्यद अली शाह गिलानी के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज कर लिया है.

हाल ही में हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता और मुस्लिम लीग के चेयरमैन 44 वर्षीय मसर्रत को लगभग साढ़े चार साल के बाद जेल से रिहा किया गया.

जम्मू-कश्मीर में एक मार्च 2015 को पीडीपी-बीजेपी गठबंधन सरकार बनी. राज्य के नए मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद के पद संभालने के कुछ दिनों बाद ही मसर्रत की रिहाई हुई.

मसर्रत आलम पहले भी जेल में लंबा समय काट चुके हैं. आइए डालते हैं एक नज़र कि कैसा रहा है मसर्रत आलम बट का सफ़र.

मसर्रत आलम का सफ़र

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मौजूदा विवाद मसर्रत आलम की जनवरी 2010 में हुई गिरफ़्तारी और मार्च 2015 में हुई रिहाई को लेकर है.

लेकिन श्रीनगर के ज़ैण्डरा इलाक़े में रहने वाले मसर्रत आलम 1990 से लेकर अबतक लगभग 19 साल जेल में गुज़ार चुके हैं

10 नवंबर 1971 को जन्मे मसर्रत को पहली बार दो अक्तूबर 1990 को पब्लिक सेफ़्टी एक्ट (पीएसए), 1978 के तहत गिरफ़्तार किया गया था.

इस क़ानून के तहत ज़िले के डीएम या संभाग आयुक्त किसी की भी गिरफ़्तारी के आदेश दे सकते हैं अगर उनसे राज्य की सुरक्षा या शांति भंग होने का ख़तरा हो.

लेकिन गिरफ़्तारी के 12 दिनों के अंदर राज्य के गृह मंत्रालय से उसकी मंज़ूरी लेनी पड़ती है.

राज्य की सुरक्षा को ख़तरा होने की स्थिति में दो साल और शांति भंग होने की आशंका होने की स्थिति में एक साल तक जेल में बंद रखा जा सकता है.

लेकिन 2012 में इस क़ानून में एक संशोधन कर ये मियाद क्रमश: छह महीने और तीन महीने कर दी गई.

पीएसए में गिरफ़्तार

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अक्तूबर 1990 से जून 2009 तक उनपर 10 बार पीएसए लगाया गया था.

कई बार तो ऐसा हुआ कि जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट ने उनकी गिरफ़्तारी को ख़ारिज कर दिया लेकिन उन्हें रिहा करने के बजाए किसी दूसरे केस में उन्हें फ़ौरन गिरफ़्तार कर लिया गया. फिर बाद में उन पर पीएसए लगाया गया.

जनवरी 2010 में गिरफ़्तार होने से पहले वो ज़मानत पर जेल से बाहर थे.

मसरर्त को जनवरी 2010 में पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत गिरफ़्तार किया गया था. लेकिन अप्रैल में अदालत ने उन्हें रिहा कर दिया.

उमर अब्दुल्लाह सरकार ने अक्तूबर 2010 में उन्हें फिर पीएसए के अंतर्गत गिरफ़्तार किया. उस समय सरकार का कहना था कि राज्य में हुई पत्थरबाज़ी की वारदातों के पीछे उनका हाथ है.

ग़ौरतलब है कि साल 2010 में पत्थर फेंक रहे कश्मीरी युवाओं पर सुरक्षा बलों ने गोलियां चलाई थी जिनमें लगभग 120 युवा मारे गए थे.

मसर्रत ने अपनी गिरफ़्तारी को कई बार अदालत में चुनौती दी और अदालत ने उनकी गिरफ़्तारी को ग़ैर-क़ानूनी क़रार देते हुए उनकी रिहाई के आदेश भी दिए. लेकिन पुलिस हर बार उन्हें किसी और मामले में गिरफ़्तार कर लेती थी.

अदालत में गिरफ़्तारी को दी चुनौती

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अक्तूबर 2012 में उन्हें 16वीं बार पीएसए के तहत गिरफ़्तार किया गया था.

मसर्रत ने फ़रवरी 2013 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. सुप्रीम कोर्ट ने जब राज्य सरकार से जवाब तलब किया तो राज्य सरकार ने कहा कि मसर्रत आलम पर से पीएसए हटा लिया गया है. लेकिन इसके बाद भी उन्हें रिहा करने के बजाए उनपर कई दूसरे मामले दर्ज कर लिए गए.

आख़िरी दफ़ा 17वीं बार पीएसए के तहत उन्हें 15 अक्तूबर 2014 को गिरफ़्तार किया गया था. लेकिन जम्मु-कश्मीर पुलिस के अनुसार 12 दिनों के अंदर गृह मंत्रालय से उनकी गिरफ़्तारी की मंज़ूरी नहीं ली जा सकी थी जो कि पीएसए के तहत ज़रूरी है.

पुलिस के अनुसार इस दौरान उन पर कुल 27 दूसरे मामले भी दर्ज किए गए थे जिनमें 26 में उन्हें ज़मानत मिल गई और बाक़ी एक मामले में अदालत ने उन्हें बरी कर दिया गया है. आख़िरकार सात मार्च, 2015 को उन्हें रिहा कर दिया गया.

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