भारत: 'चीन का मुकाबला नहीं, असर कम करने पर ज़ोर'

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिन्द महासागर के तीन देशों की पांच दिन की यात्रा के अंतिम चरण में शुक्रवार को श्रीलंका पहुँचे हुए हैं.

इस पूरे दौरे का उद्देश्य सेशेल्स, मॉरीशस और श्रीलंका के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करना है.

लेकिन ये दौरा भारत की लंबी अवधि की उस रणनीति की एक कड़ी की तरह भी देखा जाना चाहिए जिसके अंतर्गत भारत की ये कोशिश है कि हिन्द महासागर और इसके तट पर बसे देशों में चीन के बढ़ते असर को कम कैसे किया जाए.

पढ़िए पूरा विश्लेषण

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प्रधानमंत्री मोदी ने जिन तीन देशों का दौरा किया है, उन देशों में चीन के बढ़ते आर्थिक और सैन्य असर को भारत काफी सालों से महसूस कर रहा है.

ये बात और है कि नरेंद्र मोदी की इस यात्रा से पहले दस वर्ष तक चली यूपीए सरकार की विदेश नीति में इससे निपटने के लिए कोई ठोस रणनीति नज़र नहीं आई.

चीन के इस असर ने चारों तरफ से भारत को घेर रखा है. भारत के पश्चिम में पाकिस्तान चीन का घनिष्ठ मित्र है. उत्तर में नेपाल है जहाँ चीन कई परियोजनाएं तैयार कर रहा है.

उत्तर-पूर्व में म्यांमार है जिसके गहरे समुद्र में चीन की मदद से बने बंदरगाह से तेल और गैस वाली दोहरी पाइपलाइन चीन को जाती है. पूर्व में, श्रीलंका में मागमपुरा महिंदा राजपक्षे बंदरगाह भी चीन की मदद से बनाया गया है.

चीन का दबदबा

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हिन्द महासागर में चीन के आर्थिक और सैन्य इरादों को 'स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्ज़' या 'मोतियों की माला' या केवल 'सागर माला' के नाम से जाना जाता है.

चीन ने इस योजना से मिलती-जुलती विशाल परियोजना वर्ष 2013 में 'समुद्री सिल्क रोड' नाम से शुरू की थी जिस पर वो 40 अरब डॉलर खर्च करने का इरादा रखता है.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली चीन मामलों के विशेषज्ञ हैं.

वो कहते हैं, "समुद्री सिल्क रोड चीन के फूचियांग सूबे से होते हुए हिन्द महासागर में हमनटोटा और ग्वादर बंदरगाह से निकलकर अफ्रीका के तंज़ानिया तक जाएगा. चीन अफ़्रीका में कुल नौ बंदरगाह बनाने वाला है."

श्रीकांत के अनुसार, "इनमें से कुछ को सैन्य कामों के लिए भी इस्तेमाल किया जाएगा. इसके बाद यूनान में एक बंदरगाह बनाकर ये सड़क यूरोप जाकर ख़त्म होगी."

मोदी की रणनीति

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इस विशाल परियोजना का भारत मुक़ाबला नहीं कर सकता, लेकिन अपने पड़ोसियों और सार्क देशों से संबंध बनाकर चीन के हिन्द महासागर में बढ़ते असर को कम ज़रूर कर सकता है.

प्रधानमंत्री मोदी के दौरे को इस संदर्भ में देखना अधिक मुनासिब होगा. उनकी सरकार के इरादे शुरू से साफ़ हैं.

पिछले साल शपथ ग्रहण समारोह में उन्होंने सार्क देशों के नेताओं को न्योता दिया था.

मोदी ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भूटान को चुना और अब तक उनके विदेशी दौरों में नेपाल, भूटान और श्रीलंका शामिल हैं.

इसी तरह से मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से लगातार पड़ोसी देशों के राजनेता भारत के दौरे पर आते रहे हैं.

कड़वा सच

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मोदी सरकार की हिन्द महासागर की नीतियां अब भी बहुत साफ़ नहीं हैं, लेकिन प्रधानमंत्री शायद इस कड़वे सच का सामना करने को तैयार नज़र आते हैं कि वो चीन की महत्वाकांक्षी योजना का मुक़ाबला नहीं कर सकते.

हाँ वो अपने पड़ोसी देशों को अपने असर के दायरे में लाने में सफल हो सकते हैं.

लेकिन इसके लिए इन देशों में भारत की आर्थिक, सैन्य और राजनयिक प्रतिबद्धता एक लंबे अरसे के लिए होना चाहिए.

क्या भारत इसके लिए तैयार है? अगर नरेंद्र मोदी, डॉक्टर मनमोहन सिंह की तरह एक लम्बे अरसे तक प्रधानमंत्री पद पर बने रहें तो शायद ये संभव है.

कम से कम प्रधानमंत्री के अब तक के ट्रैक रिकॉर्ड से ऐसा ही लगता है.

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