'इंडियाज़ डॉटर' पर अलग अलग विचार

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साल 2012 के दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामले पर बनी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म इंडियाज़ डॉटर पर एक बहस छिड़ गई है.

डॉक्यूमेंट्री की निर्माता लेज़्ली उडविन ने फ़िल्म में बलात्कार के एक दोषी मुकेश सिंह के इंटरव्यू का भी प्रयोग किया है. 'इंजियाज़ डॉटर' को पिछले हफ़्ते ब्रिटेन में दिखाया गया.

इस फ़िल्म को भारत में एनडीटीवी पर दिखाया जाना था लेकिन पुलिस ने मंगलवार देर शाम कोर्ट से आदेश लेकर इस फ़िल्म के दिखाए जाने पर रोक लगा दी.

भारत के ज़्यादातर प्रमुख अख़बारों में सरकार के इस क़दम की आलोचना करते हुए इसे 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का हनन बताया.

डॉक्यूमेंट्री का समर्थन करने वाले संपादकीय और लेखों में प्रयोग किए गए प्रमुख शब्दों के विश्लेषण से पता चलता है कि ज़्यादातर लोग मानते हैं कि सरकार को इस फ़िल्म पर प्रतिबंध नहीं लगाना चाहिए था.

प्रयोग किए गए शब्द

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ज़्यादातर लेखकों ने प्रतिबंध की निंदा करने के लिए 'बलात्कार', 'महिलाओं के अधिकार', 'नाराज़गी' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है.

इन लेखकों का मानना है कि फ़िल्म पर 'दोष' लगाना भारत में पिछले कुछ सालों में तेज़ी से बढ़ी इस समस्या को नज़रअंदाज़ करना है.

कुछ समाचार पत्रों, टीवी चैनलों और एक्टविस्टों ने डॉक्यूमेंट्री पर प्रतिबंध का समर्थन किया है. हालांकि ऐसे लोगों की संख्या काफ़ी कम है.

प्रतिबंध का समर्थन करने वालों का मानना है कि इस फ़िल्म में भारत की एक 'रूढ़ छवि' पेश की गई है और ये फ़िल्म 'देश के लोगों को अपमानित भी करती है'.

एक चर्चित टीवी एंकर अर्णब गोस्वामी ने पिछले हफ़्ते कहा, "ये पत्रकारिकता को सिर के बल खड़ा करने जैसा है. ये अनैतिक है."

क़ानून की लक्ष्मणरेखा

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इन लोगों का मानना है कि फ़िल्म में भारत को एक 'हिंसक' देश की तरह दिखाया गया है जो 'बलात्कारियों का गढ़' है.

कुछ एक्टिविस्टों का कहना है कि फ़िल्म बनाने के लिए 'क़ानून' की लक्ष्मणरेखा का उल्लंघन किया गया है जिससे अदालती कार्रवाई पर असर पड़ेगा.

मामले के अभियुक्तों को भारत की निचली अदालत में सज़ा सुनाई गई जिसके ख़िलाफ़ उन्होंने ऊपरी अदालत में अपील की है.

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