भारत-चीन के बीच कहाँ खड़ा है श्रीलंका ?

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीलंका यात्रा के दौरान संसद में जो कुछ कहा, क्या उससे दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार होगा? ये सवाल बड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि बीते दो महीने में दोनों देशों के बीच ये चौथी उच्च स्तरीय मुलाक़ात है.

श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में इस इलाक़े में चीन की मौजूदगी और मछुआरों समेत कई मुद्दों पर दोनों देशों के बीच तनाव था. लेकिन अब लगता है कि दोनों देशों की सरकारें संबंधों को यहां से आगे ले जाना चाहती हैं.

श्रीलंका के विदेश मंत्री मंगला समरवीरा का हाल ही में बयान आया था कि चीन के साथ दोस्ती बरकरार रहेगी, लेकिन दोनों देशों के बीच संबंध राजपक्षे के ज़माने जैसे नहीं रहेंगे. लेकिन ये कहना ज़ल्दबाज़ी होगी कि श्रीलंका चीन के प्रभाव से पूरी तरह निकल सकता है.

चीन का प्रभाव

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अभी भी यहां जितनी बड़ी-बड़ी परियोजनाएं हैं वो या तो चीन की कंपनियां बना रही हैं या चीन द्वारा दिए गए कर्ज़ से चल रही हैं.

यहां चीन का आर्थिक रूप से जिनता प्रभाव है, उसकी जगह भारत ले पाएगा, ऐसा नहीं लगता है.

लेकिन इतना ज़रूर है कि श्रीलंका के नए राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना की सरकार रणनीतिक रूप से चीन की वरीयता को अब कम करना चाहती है.

समरवीरा ने अपने बयान में ये भी कहा था कि अब कोई चीनी पनडुब्बी यहां लंगर नहीं डाल पाएगी. यह भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय था.

इससे पता चलता है कि श्रीलंकाई सरकार को इस बात का इल्म है कि रणनीतिक मामले को लेकर उसके प्रति भारत में काफ़ी नाराज़गी है.

संघीय प्रणाली की सलाह

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श्रीलंका में सिरिसेना सरकार अभी नई चुनकर आई है और उसका 'हनीमून पीरियड' है.

इसलिए जब प्रधानमंत्री ने श्रीलंकाई तमिलों का मुद्दा उठाया और प्रांतों को अधिकार देने वाले संविधान के 13वें संशोधन को लागू करने की बात उठाई तो सिरिसेना को शायद ये बात बुरी ना लगी हो.

लेकिन श्रीलंका की घरेलू राजनीति में ये काफी संवेदनशील मुद्दा है.

भारत और श्रीलंका के बीच शांति समझौते के तहत यह संशोधन किया गया था ताकि सिंघला और तमिल के बीच का विवाद शांत हो जाए.

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प्रधानमंत्री ने यहां तक कहा कि 13वें संशोधन से भी आगे बढ़कर सत्ता विकेंद्रित करनी चाहिए.

मोदी ने यह भी कहा कि वो सहकारी संघीय प्रणाली के पक्ष में हैं.

उनका इशारा इसी तरफ था कि श्रीलंका में प्रांतों में संघीय तंत्र को अपनाएं तो शायद 13वें संशोधन जैसे विवादास्पद मुद्दों का भी हल निकल आए.

(बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद से बातचीत पर आधारित)

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