मोदी सरकार के ख़िलाफ़ एकजुट हुए कई संगठन

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देश के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न मुद्दों को लेकर संघर्षरत छोटे-छोटे सामाजिक-राजनैतिक और मानवाधिकार संगठनों ने आज दिल्ली में एक साझा मंच के गठन की घोषणा की.

आल इंडिया पीपुल्स फोरम (एआईपीएफ) यानी अखिल भारतीय लोक मंच के नाम से गठित इस संयुक्त मोर्चे में कुछ छोटे वामपंथी और समाजवादी दलों के साथ-साथ पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (पीयूसीएल) और रिहाई मंच जैसे संगठन भी शामिल हैं.

'सांप्रदायिकता और कॉर्पोरेट लूट'

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स्थापना समारोह की अध्यक्षता कर रही भाकपा-माले की पोलित ब्यूरो सदस्य कविता कृष्णन का कहना था कि अपनी बात मज़बूती से रखने के लिए कई सारे संगठन एकजुट होने की ज़रूरत महसूस कर रहे हैं और एआईपीएफ उसी जद्दोज़हद का नतीजा है.

इस मंच के उदेश्यों को लेकर उनका कहना था, "नई सरकार के सत्ता में आने के बाद सांप्रदायिक हमले और कॉर्पोरेट लूट तेज़ हुई हैं, ऐसे में ये बहुत ज़रूरी हैं कि देश के अलग-अलग हिस्सों में आम लोगों के हित में काम काम करने वाले अमन पसंद लोग साथ आएं और प्रतिरोध की आवाज़ भी तेज़ हो".

'स्वास्थ और शिक्षा'

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वहीं अपनी बात रखते हुए पीयूसीएल से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. विनायक सेन ने कहा कि वे इस मोर्चे में किसी संगठन के प्रतिनिधि के बतौर नहीं बल्कि देश की खस्ताहाल जनस्वास्थ्य प्रणाली, स्तरहीन शिक्षा व्यवस्था और भूखमरी जैसे मुद्दों के साथ शामिल हैं.

मंच से अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा, "भूख, स्वास्थ्य और शिक्षा के मुद्दे पर हमलोग बहुत सालों से काम कर रहे हैं, लेकिन जब तक इन मुद्दों को लेकर बड़ा जनांदोलन नहीं खड़ा होता हैं, हमारी चर्चाओं का कोई महत्व नहीं."

जाने माने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ ने इस पहल का समर्थन करते हुए कहा कि आज के माहौल में अगर मिलजुल कर प्रयास नहीं किया गया तो जो कुछ भी पिछले दिनों में हासिल हुआ है बहुत जल्द ख़त्म हो जाएगा.

रोज़गार और भूख

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द्रेज़ ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार योजना (मनरेगा) को एक उदाहरण के बतौर पेश करते हुए पिछली यूपीए सरकार और वर्तमान में मोदी सरकार द्वारा इसके प्रावधानों में बदलाव को लेकर गंभीर चिंता ज़ाहिर की.

'आजीविका का अधिकार' को एक महवपूर्ण मुद्दा बनाने के लिए ज्यां द्रेज़ ने एक साझा प्रयास की ज़रूरत पर बल दिया.

दो दिनों तक चलने वाले इस स्थापना समारोह के बाद 16 मार्च को इस मंच में शामिल देश भर के लगभग 20 से ज़्यादा संगठन दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपनी सामूहिक मांगों के साथ एक जनसंसद का आयोजन भी करने वाले हैं.

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