'चुपके, चुपके...आँसू बहाना भी कोई ग़ज़ल है?'

जश्ने रेख्ता, दिल्ली इमेज कॉपीरइट BBC RAVI

‘चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है...’ एक ऐसी ग़ज़ल है जिसे आम तौर पर हिंदुस्तान-पाकिस्तान में हर आदमी सुनता है और तारीफ़ करता है. मगर शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी उनमें शरीक नहीं हैं. वो इसे फ़िज़ूल का आँसू बहाना कहते हैं.

‘कई चाँद थे सरे आसमाँ’ जैसे व्यापक फ़लक वाले उपन्यास के लेखक और उर्दू आलोचक फ़ारूक़ी ने दिल्ली के एक भरे ऑडिटोरियम में जब मौलाना हसरत मोहानी की लिखी ग़ज़ल ‘चुपके, चुपके रात दिन...’ को ख़ारिज करते हुए ग़ज़ल के सफ़र पर अपनी बात रखी तो सुनने वाले ख़ामोशी से सुनते रहे.

उन्होंने कहा कि उर्दू में शायरी तो सौ सवा सौ साल से हो रही थी लेकिन ग़ज़ल नहीं थी.

कहाँ से आई ग़ज़ल?

इमेज कॉपीरइट BBC RAVIPRAKASH

उर्दू साहित्य के बहुत से आलोचक ये कहकर ग़ज़ल की आलोचना करते हैं कि ये विधा विदेशी है.

लेकिन फ़ारूक़ी ने कहा, “ये बात ठीक है कि ग़ज़ल ईरान से आई. पर हमें अच्छी लगी तो हमने ले ली. ठीक वैसे ही जैसे अँग्रेज़ी साहित्य में नाटक और सॉनेट जैसी विधाएँ दूसरी भाषाओं से ली गईं.”

उन्होंने कहा कि दक्कन के शायरों, ख़ास तौर पर मोहम्मद अली क़ुतुबशाह और दूसरे लोगों ने हिंदुस्तान में ग़ज़ल की शुरुआत की. गुजरात में 15वी सदी में जो उर्दू शायरी हुई उसमें ग़ज़ल नहीं थी, मस्नवी ज़रूर थी. और ज़िक्री थी. जिन्हें रागों के आधार पर गाया जाता था.

ग़ालिब की ग़ज़ल

इमेज कॉपीरइट BBC RAVI

फ़ारूक़ी मानते हैं कि दिल्ली वालों यानी दिल्ली के मीर तक़ी मीर जैसे पुराने शायरों ने ये ग़लतफ़हमी को पैदा किया और बढ़ावा दिया कि ग़ज़ल दिल्ली की उपज है, जबकि ये ग़लत है.

सच तो ये है कि वली दक्कनी की ग़ज़ल पर दो सौ साल बाद सत्रह बरस के लड़के यानी मिर्ज़ा असदुल्ला खाँ ग़ालिब ने ग़ज़ल कही. “दक्कन के शायर न होते तो ग़ालिब भी न होते.”

उन्होंने कहा, “ये ज़रूरी है कि हम अपने इतिहास को सिर्फ़ देहली (दिल्ली) तक सीमित न रखें.” साथ ही ये भी कहा कि ग़ज़ल में अगर सीधे दिखने वाले भाव के अलावा कुछ और गूढ़ अर्थ छिपा न रहे तो उसे स्तरीय ग़ज़ल नहीं माना जा सकता.

ग़ज़ल के सफ़रनामे का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अगर ग़ज़ल आपके बौद्धिक विकास में मदद न करे तो कैसी ग़ज़ल?

यानी अगर आप ग़ज़ल को सिर्फ़ संगीत में ढाली गई इश्क, आँसू, गुल और बुलबुल की शायरी मानकर उसे अपने अकेलेपन या दोस्तों की महफ़िल को गुलज़ार करने का औज़ार मानते हैं तो शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की बात आप तक नहीं पहुँच पाई.

ग़ज़ल की गहराई

इमेज कॉपीरइट BBC RAVI

ग़ज़लगोई की बारीकियों की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया की वली दक्कनी, मीर तक़ी मीर, दाग़ देहलवी और इब्राहीम ज़ौक़ जैसे शायरों ने अपनी अपनी तरह से ग़ज़ल को परवान चढ़ाया.

मीर तक़ी मीर के योगदान का ज़िक्र करते हुए फ़ारूक़ी ने बताया कि “मीर ने ग़ज़ल में सादा ज़बान रखी लेकिन उसमें बौद्धिक गहराई थी.”

इसलिए अगर आप ग़ज़लें सुनने और पढ़ने के शौक़ीन हैं, तो अगली बार सिर्फ़ “गुलो बुलबुल” की शायरी नहीं बल्कि उसमें छिपे गूढ़ रहस्य पर नज़र डालें.

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के शब्दों में, “यही बौद्धिक तीखापन ग़ज़ल को ग़ज़ल बनाता है.”

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार