'ग़जल का मतलब शराब और बुलबुल ही नहीं'

शम्सुर रहमान फ़ारूकी की मशहूर किताब इमेज कॉपीरइट BBC RAVIPRAKASH

उर्दू साहित्य के बड़े उपन्यासकार और शायर शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी ने हिंदू-मुस्लिम तहज़ीब में बदलाव, उर्दू साहित्य पर औपनिवेशिक शासन के प्रभाव और कई मुद्दों पर बीबीसी हिंदी से बातचीत की.

बीबीसी हिंदी के रेडियो एडिटर राजेश जोशी को उन्होंने अपनी भाषा, अपने बचपन, अपनी परवरिश के बारे में भी बताया.

पेश हैं उनकी बातचीत के चुनिंदा हिस्से.

आप 1960 से ही लिखते रहे हैं, पर आपकी ख्याति ‘कई चांद थे सरे आसमां’ के हिंदी अनुवाद छपने के बाद ही फैली. ऐसा क्यों?

यह सच है कि यहां लोगों ने इस उपन्यास के हिंदी अनुवाद आने के बाद ही मुझे जाना.

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हिंदी जानने वालों की तादाद ज़्यादा है और वे कई देशों में फैले हुए हैं. इससे मुझे फ़ायदा यह हुआ कि लोग मुझे जानने लगे.

इसके आलावा, मुझे हिंदी वालों ने बहुत ही इज्जत दी. हिंदी आलोचक मेरे प्रति काफ़ी मेहरबान थे. केदार नाथ सिंह ने यहां तक कह दिया कि हिंदू-मुसलिम रिश्तों को समझने के लिए ‘कई चांद थे सरे आसमां’ पढ़ना ज़रूरी है.

इस उपन्यास के मुख्य चरित्रों की बात आपके मन में कैसे आई?

मुझे दाग की मां वज़ीरे खानम ने बहुत आकर्षित किया. उनकी जिंदगी की घटनाएं, उनके जीवन में आने वाले पुरुष, उनका संघर्ष, उनके मजबूत चरित्र से मैं काफ़ी प्रभावित हुआ.

फिर धीरे धीरे कहानी आगे बढ़ती गई और दूसरे लोग उसमें जुड़ते गए.

कई चांद थे सरे आसमां’ में इस्तेमाल की गई भाषा आपने कहीं से ली? आपने आखिर वह भाषा कैसे विकसित की, उसे कैसे मांजा?

मेरे माता-पिता अलग अलग पृष्ठभूमि के थे. मेरे पिता देवबंदी मुसलमान थे जबकि मां का घर काफी उदार था.

मेरी परवरिश उदार वातावरण में हुई, जहां मैं मुहर्रम और शबे बारात के साथ होली भी मना लिया करता था. मेरे वातावरण की तमाम बातें मेरे जेहन में जमा होती गईं.

मैंने जब लिखना शुरू किया तो सारी चीजें सामने आती गईं, मेरे लेखन में जुड़ती चली गईं. इसके लिए मैंने अलग से कोई शोध नहीं किया.

इस उपन्यास के बाद आपको लगा कि आपने अपना मुक़ाम हासिल कर लिया है या आपका बेहतर अभी आना बाकी है?

मुझे अपना कल का लिखा आज बुरा लगने लगता है. पर मुझे इतना संतोष है कि कोई मेरे लिखे को पढ़ कर यह नहीं कह सकता कि किसी अनाड़ी ने यह लिखा है.

मैं जिस वातावरण में रहा वहां हाफिज़, ग़ालिब, सादी के शेर या खय्याम की रुबाइयां लोग आसानी से पढ़ लेते थे. मुझे इसका फ़ायदा हुआ, मेरे लेखन पर इसका असर पड़ा.

ये चीजें मेरे लेखन में आती गईं. पर आज के लोगों के साथ ऐसा नहीं है. आज के लोगों को पढ़ने की आदत ही नहीं है.

हमारी तहज़ीब में बदलाव आने की क्या वजह है. औपनिवेशिक अतीत के अलावा क्या अपनी ज़ुबान, अपनी समझदारी को कमतर आंकना भी एक वजह है?

यह सच है. लोग यह समझने लगे थे कि जिस समय अंग्रेज आए मुल्क तबाह हो चुका था. लोग कबूतरबाजी, लड़कीबाजी में ही लगे रहते थे. पर ऐसा नहीं था.

अठाहरवीं सदी तक भारत एक निर्माता देश था. बाद में सारा सब कुछ विदेशों से आने लगा.

ग़लत प्रचार का असर यह हुआ कि लोगों को अपनी चीज ही बुरी लगने लगी थी. इससे लोग अपनी ज़ुबान, अपनी तहज़ीब को भी बुरा समझने लगे थे.

आपने इसे पलटने की कोशिश की?

नहीं ऐसा नहीं है, मैंने कुछ खास नहीं किया है. पर लोग अब समझने लगे हैं हमारा भी गौरवशाली अतीत था, जिसे गंवा कर हमने काफ़ी कुछ खोया है.

हमारी तहजीब, हमारी जुबान अच्छी थी. बस इतनी सी बात है.

आप मौलाना हसरत नोमानी को खारिज करते हैं?

हां, बिल्कुल करता हूं. कुछ लोगों ने ग़जल पर हमले किए, उसकी बुनियाद उखाड़ फेंकने की कोशिश की. लोग कहने लगे कि ग़जल मे बुलबुल और सय्याद के अलावा कुछ नहीं है.

इस झूठ को सच की तरह पेश किया गया. इसकी वजह है कि ऐसा कहने वाले शायर स्वयं शराब और औरतबाजी में लगे रहते थे, उन्हें बाकी दुनिया से कोई मतलब नहीं था.

इसका असर यह हुआ कि इनके ग़जल में भी यही सब दिखने लगा. बाकी तमाम चीजें पीछे छूट गईं. पर सच तो यह नहीं है.

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