भारत के इंटरनेट क़ानून को चुनौती दी श्रेया ने

श्रेया

दिल्ली यूनिवर्सिटी में क़ानून की पढ़ाई कर रही 24 वर्षीय श्रेया सिंघल ने 2012 में सूचना प्रौद्योगिकी क़ानून के सैक्शन 66ए के ख़िलाफ़ याचिका दायर की थी.

उन्हीं की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने इससे असंवैधानिक ठहराया. इसके तहत सोशल मीडिया पोस्ट और पोस्ट को लाइक करने तक के मामलों में पिछले कुछ सालों में गिरफ़्तारियां तक हो चुकी हैं.

श्रेया सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से बहुत ख़ुश हैं. बीबीसी संवाददाता शालू यादव ने श्रेया सिंघल से बातचीत की.

श्रेया ने बताया कि कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को सुरक्षित रखा है और ये उनकी ही नहीं बल्कि इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले हर व्यक्ति की जीत है.

क्या कहती हैं श्रेया सिंघल

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आपने ये याचिका क्यों दायर की?

मैंने ये याचिका 2012 में दाख़िल की थी. महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में गिरफ़्तारियों से मुझे झटका लगा था.

मैं ख़ुद से सवाल पूछ रही थी कि ये गिरफ़्तारियों क्यों हुईं? उन लोगों ने जो पोस्ट किए थे उनसे किसी को कोई ख़तरा तो था नहीं.

पश्चिम बंगाल में तो मुख्यमंत्री के बारे में व्यंग्यात्मक कार्टून पोस्ट करने पर ही गिरफ़्तारी हो गई. जबकि पुडुचेरी में एक नेता पर टिप्पणी करने पर एक व्यापारी को गिरफ़्तार कर लिया गया.

जिन वजहों से उन लोगों को गिरफ़्तार किया गया, वही वजह बताकर किसी को भी गिरफ़्तार किया जा सकता था. मुझे या मेरे दोस्तों को भी गिरफ़्तार किया जा सकता था.

आप सोचिए कि सिर्फ़ फ़ेसबुक पर पोस्ट लाइक करने के लिए गिरफ़्तारियाँ हुई थीं.

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ऐसे चार मामले हुए थे जिनसे साफ़ था कि क़ानूनी प्रावधान का दुरुपयोग किया जा रहा था. मुझे लगा कि किसी को तो कुछ करना चाहिए.

सिर्फ़ ये कहना काफ़ी नहीं था कि बहुत बुरा हुआ. कुछ करने की ज़रूरत थी.

सूचना प्रौद्योगिकी क़ानून के ये प्रावधान बिलकुल अस्पष्ट है और इन्हें आधार बनाकर किसी को भी गिरफ़्तार किया जा सकता था.

यदि सोशल मीडिया पर आपकी टिप्पणी से किसी को नाराज़गी या कष्ट हुआ हो तो 66ए के तहत सिर्फ़ इसीलिए तीन साल तक की जेल हो सकती थी.

संविधान में अनुच्छेद 32 के तहत ये प्रावधान है कि यदि आपके मूल अधिकार का उल्लंघन किया जाता है तो भारत का कोई भी नागरिक सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सकता है. इसलिए मैंने सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की.

तीन साल सुनवाई के बाद इस याचिका पर फ़ैसला आया है. ये अनुभव कैसा था?

मेरे लिए यह अनुभव काफ़ी शिक्षाप्रद रहा. मैं वकीलों के परिवार से आती हूं. लेकिन मैंने पहली बार न्यायिक प्रक्रिया को इतनी नज़दीकी से देखा.

वरिष्ठ वकील और भारत के पूर्व महाधिवक्ता सोली सोराबजी ने हमारी ओर से पक्ष रखा.

66ए के पक्ष में सरकार ने क्या तर्क रखे और आपने इसका जबाव कैसे दिया?

हमने बहस में भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इतिहास रखा और हमने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित विदेशी मामलों का भी ज़िक्र किया.

हमने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंधों का भी ज़िक्र किया.

भारत का संविधान अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो देता है लेकिन 19(2) के तहत यह भी कहता है कि मूल अधिकारों पर भी उचित प्रतिबंध लागू होते हैं.

सरकार का कहना था कि भले ही 66ए का दुरुपयोग हुआ हो, लेकिन इसकी ज़रूरत है और यह उचित प्रतिबंधों के तहत ही आता है.

क्या आप गिरफ़्तार हुए लोगों को जानती थीं?

न मैं उन लोगों को जानती थी और ना ही उनसे कभी मिली थी. उन लोगों के साथ अन्याय हुआ था.

वे दुर्भाग्यशाली थे लेकिन उनकी जगह किसी और को भी गिरफ़्तार किया जा सकता था.

तो क्या आप दूसरों की लड़ाई लड़ रही थीं?

नहीं, ऐसा नहीं है. भले ही मैं इस क़ानून से व्यक्तिगत रूप से प्रभावित नहीं हुई थी, लेकिन ये सीधे-सीधे मेरे अधिकारों से जुड़ा था.

जिन लोगों को गिरफ़्तार किया गया था उनकी जगह कोई और भी हो सकता था.

आज का फ़ैसला हर उस व्यक्ति की जीत है जो इंटरनेट का इस्तेमाल करता है. सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा को असंवैधानिक क़रार दिया है.

आपको सरकार से क्या कहना है?

अदालत में सरकार की ओर से जजों को यह भरोसा दिलाया था कि सरकार इस धारा का सावधानीपूर्वक इस्तेमाल करेगी.

लेकिन अदालत का कहना था कि एक सरकार द्वारा दिया गया भरोसा ज़रूरी नहीं है कि अगली सरकार पर भी लागू हो, भले ही सरकार किसी भी पार्टी की बने.

क़ानून लोगों के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन ये प्रावधान तो नागरिकों को ही नुक़सान पहुँचा रही थी.

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ऐसे भी लोग है जो झूठी या नफ़रत फ़ैलाने वाली सामग्री पोस्ट करते हैं, तो फिर रेखा कहाँ खींची जाए?

हमने यह भी तर्क दिया था कि भारतीय दंड संहिता में ऐसे कई प्रावधान है जो मानहानि, भड़काऊ भाषण से संबंधित है.

सूचना प्रौद्योगिकी क़ानून में भी ऐसे प्रावधान हैं जो फ़र्ज़ीवाड़े और डाटा चोरी से जुड़े हैं.

इसलिए ऐसे किसी अस्पष्ट प्रावधान की ज़रूरत नहीं है जिसका दुरुपयोग किया जा सकता हो.

आपके लिए इंटरनेट स्वतंत्रता के क्या मायने हैं?

इंटरनेट स्वतंत्रता बेहद ज़रूरी है क्योंकि सिर्फ़ एक बटन दबाकर ही हम जानकारी लाखों लोगों के साथ शेयर कर सकते हैं. इंटरनेट युग में दुनिया सिकुड़ गई है.

इराक़ में क्या हो रहा है ये हमें पता चल रहा है.

हमें ये स्वीकार करना होगा कि इंटरनेट ऐसा माध्यम है जो हमें जोड़ता है और ये स्वतंत्र होना चाहिए क्योंकि बड़ी आबादी इसका इस्तेमाल करती है.

यहाँ उम्र, जेंडर या धर्म का बंधन नहीं है.

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