इंटरनेट पर अब कुछ भी लिख सकते हैं आप?

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सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट में सैक्शन 66ए को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया है, लेकिन धारा 69ए का समर्थन किया है.

साल 2009 में सैक्शन 66ए को भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी क़ानून 2000 में एक संशोधन के जरिए जोड़ा गया था.

अभिव्यक्ति की आज़ादी के पैरोकार इस धारा के बिल्कुल ख़िलाफ़ रहे. आख़िर ऐसा क्या था इसमें और इसे ख़त्म होने में इतना वक्त क्यों लगा?

कितना फ़्री हुआ सोशल मीडिया?

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धारा 66ए के ख़त्म होने के बाद कथित आपत्तिजनक टिप्पणी लिखने पर होने वाली ग़िरफ़्तारियां बहुत कम हो जाएंगी.

ऑनलाइन पर खुलकर विचार व्यक्त करना आसान हो जाएगा.

लेकिन दूसरे क़ानूनों में 'हेट स्पीच' को नियंत्रित करने के प्रावधान हैं.

भारतीय दंड संहिता की धारा 295ए के मुताबिक़ दूसरों की धार्मिक भावनाएं आहत करने पर जेल का प्रावधान है.

लेकिन 66ए की तरह ये अस्पष्ट और अनियंत्रित नहीं हैं.

साथ ही धारा 69ए तो है ही जिसके तहत किसी वेबसाइट के वेबपेज को सरकार या अदालत के आदेश पर ब्लॉक किया जा सकता है.

धारा 69ए क्या है?

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धारा 69ए के तहत सरकार ऐसी किसी भी ऑनलाइन सामग्री पर पाबंदी लगा सकती है, जिससे देश की सुरक्षा को ख़तरा हो.

इसके अलावा कई दूसरे प्रावधान भी हैं जिनके तहत पाबंदी लगाई जा सकती है.

अभिव्यक्ति की आज़ादी के समर्थक इस बात से असंतुष्ट हैं कि धारा 66ए को रद्द करने के लिए 24 मार्च को जारी किया गया सुप्रीम कोर्ट का आदेश धारा 69ए का समर्थन करता है.

धारा 66ए क्या है?

धारा 66ए के मुताबिक़, यदि कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर 'आक्रामक' या 'आपत्तिजनक' पोस्ट डालता है या इसे ई-मेल के जरिए भेजता है तो उसे तीन साल क़ैद की सज़ा हो सकती है.

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धारा 66ए एक सख़्त क़ानून था और इसका पूरे देश में लगातार ग़लत इस्तेमाल हो रहा था.

जब भी, जिसको भी कोई पोस्ट आक्रामक लगती वो इसके ख़िलाफ़ धारा 66ए का इस्तेमाल करता.

पुलिस अधिकारी या अन्य अपनी मर्जी से किसी पोस्ट का मतलब लगाने के लिए आज़ाद थे.

किसी भी मैसेज से कोई भी चिढ़ सकता था.

राजनेता अपने बारे में लिखे गए पोस्ट को लेकर 66ए का लगातार इस्तेमाल कर रहे थे.

कैसे हुआ ग़लत इस्तेमाल?

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धारा 66ए के ग़लत इस्तेमाल के कई उदाहरण हैं.

इसी महीने मार्च में बरेली के 12वीं कक्षा के एक छात्र ने उत्तर प्रदेश के मंत्री आज़म ख़ान के नाम से फ़ेसबुक पर पोस्ट डाली.

इस कारण उसे गिरफ्तार कर दो दिनों के लिए जेल भेज दिया गया.

इसके अलावा ऐसी कई और घटनाएँ हुईं. साल 2012 में मुंबई की दो लड़कियां गिरफ्तार हुईं.

इनमें से एक लड़की ने शिवसेना नेता बाल ठाकरे की मौत के बाद फ़ेसबुक पर मुंबई के लगभग ठप्प हो जाने पर सवाल उठाया था, जबकि दूसरी लड़की ने इस कमेंट को लाइक किया था.

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पुडुचेरी में पुलिस ने एक 46 साल के कारोबारी रवि श्रीनिवासन को गिरफ़्तार किया क्योंकि उन्होंने तत्कालीन भारतीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम की उनकी संपत्ति को लेकर आलोचना करते हुए ट्वीट किया था.

कोलकाता के जादवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अम्बिकेश महापात्रा को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कथित आपत्तिजनक कार्टून बनाने और उन्हें सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट के जरिये सार्वजनिक करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था.

66ए के ख़िलाफ़ कौन लड़ा?

दिल्ली की एक छात्रा श्रेया सिंघल ने साल 2012 में इस धारा को चुनौती दी.

मुंबई में दो लड़कियों की गिरफ़्तारी के तुरंत बाद उन्होंने इसे रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की.

इसके बाद ऐसी ही तकरीबन दर्जनों याचिकाएं दायर की गईं.

वरिष्ठ वकील और भारत के पूर्व महाधिवक्ता सोली सोरबाजी ने श्रेया सिंघल की याचिका पर पूरी बहस की अगुआई की.

इसके अलावा कई और लोगों ने 66ए और इससे जुड़े क़ानून के ख़िलाफ़ याचिका दायर की.

क़ानून के पक्ष में कौन लड़ा?

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अदालत में मुक़दमा दायर करने के पहले दो सालों में यूपीए सरकार ने इसका बचाव किया.

साल 2009 में 66ए और इससे जुड़े दूसरे क़ानून यूपीए के शासन काल के दौरान तैयार किए गए.

कांग्रेस ने इसका जनता के सामने और मीडिया में बचाव किया.

सरकार के 300 वेबसाइटों पर पाबंदी लगाने के बाद, भाजपा के अरुण जेटली ने राज्य सभा में इस क़ानून पर सवाल उठाए.

दूसरी ओर साल 2014 में सत्ता में आने के बाद भाजपा ने भी अदालत में 66ए का पक्ष लिया और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखा.

इतना लंबा वक़्त क्यों लगा?

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एक कारण तो ये है कि भारत की न्याय व्यवस्था सुस्त है जिसकी वजह से बड़ी संख्या में मामलों को निपटाने में दशक लग जाते हैं.

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कारण है सुप्रीम कोर्ट में 66ए के पक्ष में सरकार का आक्रामक रुख़. पहले कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए, फिर भाजपा सरकार दोनों ने इस धारा का बचाव किया.

जो भी सरकार सत्ता में रही, उसी ने 66ए को बनाए रखने के पक्ष में रही. इससे इसके ख़िलाफ़ चल रहा संघर्ष अनावश्यक रूप से लंबा खिंच गया.

अभिव्यक्ति की आज़ादी के पैरोकार फिर भी ख़फ़ा क्यों हैं?

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याचिकाकर्ताओं ने न केवल 66ए बल्कि साल 2009 संशोधन के तहत दूसरे प्रावधानों, खासतौर से 69ए, को भी चुनौती दी है.

धारा 69ए वेबसाइटों को ब्लॉक करने की आज़ादी देता है.

इस धारा के तहत साल 2013 में एक सरकारी वेबसाइट सहित अब तक सैंकड़ों वेबसाइटों को बंद किया जा चुका है.

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