और इसके साथ ही 'आप' बन गई 'आम' पार्टी

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आम आदमी पार्टी (आप) के दो गुटों के बीच एक महीने से चली आ रही आपसी खींचतान आज अपने चरम पर पहुँच गई.

शनिवार को पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में पार्टी के दो संस्थापक सदस्यों योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर कर दिया गया.

अब इन दोनों के पास कोई अहम पद नहीं है. अब इनकी अहमियत आम कार्यकर्ता से अधिक नहीं.

आज की हंगामापूर्ण बैठक के पहले, इसके दौरान और इसके बाद जो कुछ भी हुआ उसे योगेंद्र यादव ने एक शब्द में समेट दिया: 'शेमफ़ुल' यानी 'शर्मनाक'.

उन्होंने आज की बैठक की कार्रवाई को 'स्क्रिप्टेड' यानी पहले से तयशुदा बताया. मज़ेदार बात ये है कि इसी जुमले का इस्तेमाल केजरीवाल के खेमे के लोगों ने भी किया.

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बैठक के बाद योगेंद्र यादव ने 'शर्मनाक' शब्द का इस्तेमाल, खुद को एक पीड़ित रूप में पेश करते हुए किया.

अपना-अपना सच

बैठक में हुई बातों पर दोनों खेमे अपनी अलग-अलग राय मीडिया के सामने रख रहे हैं. सच दोनों खेमों का अलग-अलग है.

क्या योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण बैठक में हुई बातों को सार्वजनिक कर लोगों की सहानुभूति हासिल करने की कोशिश कर रहे थे?

अगर केजरीवाल खेमे ने उच्च नैतिकता का सबूत नहीं दिया तो यादव और भूषण भी बचकाना दिखे.

इस पूरे राजनीतिक ड्रामे से एक बात साफ़ है की एक हमाम में सभी नंगे हैं. पार्टी की जगहंसाई कराने और इसके समर्थकों में मायूसी फैलाने में दोनों खेमों का हाथ बराबर का है.

गंभीर सवाल ये है कि इस अव्वल दर्जे की सियासी नादानी से पार्टी के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा?

केजरीवाल की लोकप्रियता

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कुछ लोग कह रहे हैं कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में ज़बरदस्त कामयाबी हासिल करने के बाद दिल्ली सरकार चलाने वाली ये पार्टी अपना अस्तित्व खोने के कगार पर खड़ी है.

आम धारणा ये है कि पार्टी में 'स्प्लिट' हो गया है, यानी कि पार्टी टूट गई है, लेकिन ये ग़लत है.

पार्टी के 67 विधायकों और चार सांसदों में से किसी ने भी अब तक योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को गले नहीं लगाया है.

और आम कार्यकर्ताओं में अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता अभी तक कम होती दिखाई नहीं देती.

योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण पार्टी के दो वरिष्ठ नेता माने जाते हैं और उनके विचारों की आम तौर से पार्टी में सराहना होती थी, लेकिन अब वो अलग-थलग हो चुके हैं.

आम पार्टियों जैसी बनी 'आप'

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योगेंद्र और प्रशांत को हटाए जाने और इस पूरे विवाद से पार्टी को एक बड़ा झटका ज़रूर लगा है, लेकिन तीन साल पुरानी ये पार्टी कमज़ोर नहीं होगी.

कांग्रेस में 1969 में जब फूट पड़ी तो कहा गया कि अब कांग्रेस का सफाया हो जाएगा, लेकिन 1971 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में पार्टी ने आम चुनाव में भारी विजय हासिल की.

वर्तमान भारत में राज ठाकरे ने शिव सेना से अलग होकर एक नई पार्टी बनाई, लेकिन शिव सेना की सेहत पर कोई अधिक फ़र्क़ नहीं पड़ा और ये अब भी महाराष्ट्र की एक बड़ी पार्टी है.

राजनीतिक पार्टियों से नेताओं का निकलना या निकाला जाना कोई नई बात नहीं.

आम आदमी पार्टी में भी वही हो रहा है जो दूसरी पार्टियों में दशकों से होता आया है.

या कहें कि पार्टी अब देश के सियासी माहौल में ढलती जा रही है और केजरीवाल के खेमे पर की जाने वाली ये आलोचना सही है कि पार्टी अलग पहचान बनाए रखने में अपनी क्षमता भी खोती जा रही है.

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केजरीवाल पार्टी को इस संकट से निकाल सकते हैं. उन्हें पार्टी की छवि बहाल करनी होगी.

इसे दूसरी पार्टियों की तरह एक व्यक्ति वाली पार्टी बनने से बचाना होगा, लेकिन सबसे ज़रूरी उन्हें दिल्ली सरकार का कामयाब नेतृत्व करना होगा.

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