'क्या सरकार शाकाहारी ब्राह्मण हो गई है?'

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महाराष्ट्र में गाय की हत्या और गो मांस की खरीद बिक्री पर लगाया गया प्रतिबंध राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था को एक बड़े संकट में डालने जा रहा है.

अगर ऐसे ही कदम अन्य सभी राज्यों में भी उठाए जाने लगे तो इस तरह की नीति पूरे भारत की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है.

महाराष्ट्र हो या फिर कोई दूसरा राज्य, कई आदिवासी जनजातियां, दलित जातियां और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग भी गो मांस खाते हैं.

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भारत में सबसे पहले जिन लोगों ने गो मांस खाना शुरू किया था, वे न तो ईसाई थे और न ही मुसलमान. वे आम लोग थे जिनमें सभी जातियों के लोग शामिल थे.

मांस खाने के खिलाफ आदि शंकराचार्य की मुहिम शुरू होने तक जैन बनियों को छोड़कर द्विज भी गो मांस खाते थे.

इसी के बाद से ब्राह्मणों और अन्य बनियों ने गो मांस खाना छोड़ा.

हालांकि कई दलित जातियां, आदिवासी समुदाय और कई अन्य पिछड़ी जातियां अभी भी गो मांस खाती हैं. इसके अलावा वे भेड़ का मांस, चिकन और मछली आदि भी खाते हैं.

खान-पान की संस्कृति

कश्मीरी पंडित आज भी मांसाहारी हैं. बंगाली ब्राह्मण मछली भी खाते हैं और मांस भी.

क्या बीजेपी इन सभी चीजों पर रोक लगाएगी जिनमें भेड़, बकरियां, मुर्गे-मुर्गियां और मछलियों का जीवन शामिल हैं?

मनुष्यों के खान-पान की संस्कृति के संबंध में वे हिंसा और अहिंसा के बीच की लकीर कहां खींचेंगे?

एक तरह से देखा जाए तो वे जो कुछ कर रहे हैं मानो सरकार ने एक शाकाहारी ब्राह्मण की जिम्मेदारी ले ली हो और वह अपने खान-पान की संस्कृति पूरे समाज पर थोप रही हो.

भैंस की स्थिति

गाय को संरक्षण देने के उनके विचार ने कई मुश्किलें पैदा कर दी हैं. उन्होंने बैलों को मारे जाने पर भी रोक लगा दी है.

हालांकि भैंस या भैंसे को मारने को लेकर भी अस्पष्टता की स्थिति है.

निजी तौर पर मेरा मानना है कि वे भैंस या भैंसे को मारने की इजाजत देंगे जैसा कि गुजरात सरकार फिलहाल कर रही है.

सज़ा देने के सवाल पर बेशक महाराष्ट्र में लाया गया कानून कहीं कठोर और अजीबोगरीब है.

यहां तक कि जो गो मांस अपने घर में भी रखेंगे, वे भी इसके दायरे में आएंगे.

भारतीय अर्थव्यवस्था

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जो बात संघ परिवार नहीं समझ पा रहा है, वो यह है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गाय और बैलों की भूमिका तेजी से कम हुई है.

गांव के किसान अब गाय को बछड़े के स्रोत के तौर पर नहीं देखते हैं.

वो बछड़ा जिससे बैल तैयार किए जाता है, अब भारतीय अर्थव्यवस्था में किसी काम का नहीं रहा.

भारत में दूध उत्पादन में भी गाय का योगदान कोई बहुत ज्यादा नहीं है. भारत में होने वाले दूध के उत्पादन का तकरीबन 75 फीसदी भैंसों से प्राप्त होता है.

जानवरों का श्रम

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गाय और बैलों को बचाने और बढ़ाने का एक मात्र तरीका ये है कि गाय से बछड़े हों और उन बछड़ों से बैल तैयार किए जाएं.

और उन बैलों का इस्तेमाल खाना, चमड़ा और हड्डियों से बनने वाले दूसरे उत्पाद तैयार करने के लिए किया जाए.

जानवरों को बड़े पैमाने पर बचाना उनके आर्थिक इस्तेमाल के बगैर संभव नहीं है.

किसान गाय और बैलों को इसलिए नहीं पालते कि वे उन्हें अपने घरों के आगे सजाने के लिए खड़ा कर दें. उनका एक आर्थिक मक़सद भी होता है.

खेती के मशीनीकरण के बाद जब एक बार इन जानवरों का श्रम काम का नहीं रह जाता है, तो फिर उनकी उपयोगिता केवल मांस और चमड़ा देने वाले जानवर के तौर पर रह जाती है.

राष्ट्रीय कानून

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कुछ कल्याणकारी संस्थाएं भले ही गोशाला चला रही हैं लेकिन गाय और बैल वहां पैदा नहीं किए जा सकते हैं.

पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में गो मांस को एक प्रमुख भोजन के तौर पर देखा जाता है.

अगर महाराष्ट्र की तर्ज पर एक राष्ट्रीय कानून बना दिया जाए तो कई राज्यों को भारत में बने रहने में मुश्किल आ सकती है.

आखिरकार इस देश में खान-पान की संस्कृति अलग अलग राज्यों और क्षेत्रों में भिन्न है. यहां तक कि अलग अलग लोगों की खान-पान की आदतें अलग हैं.

शाकाहार

कोई भी सरकार अगर लोगों की खान-पान की आदतों पर प्रतिबंध लगाती है तो उसे न केवल एक मजहबी सरकार के तौर पर देखा जाएगा बल्कि उसे फासीवादी भी करार दिया जाएगा.

हिंदुत्व की ताकतें खान-पान की संस्कृति को नहीं समझती हैं जो मानव सभ्यताओं से होकर पनपी हैं.

वे खान-पान की संस्कृति के धार्मिक पहलू को भी नहीं समझते हैं. अगर कोई ब्राह्मण या बनिया शाकाहारी है तो उसे ऐसा होने का पूरा अधिकार है.

और अगर उन्हें लगता है कि ईश्वर ने उन्हें ऐसा करने के लिए आदेश दिया है तो उन्हें इसके लिए भी पूरा हक है.

दलित आदिवासी

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लेकिन वे सभी धर्मों, राज्यों और पूरे देश के लोगों से ऐसा कैसे कह सकते हैं कि वे उनकी संस्कृति और उनके हिंदू ईश्वरों के आदेश का पालन करें जिन्होंने उन्हें शाकाहारी होने के लिए कहा है?

किसी ईश्वर या अल्लाह ने लोगों से केवल शाकाहारी हो जाने के लिए नहीं कहा है.

बौद्ध, क्रिश्चियन और मुसलमान मांस खाते हैं और शाकाहारी खाना भी. भारत के दलित बहुजन और आदिवासी भी इन्हीं की तरह खान-पान की आदतें रखते हैं.

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सत्तारूढ़ बीजेपी इस तरह की नीतियों के रास्ते देश को खाद्य संकट और ऊर्जा की कमी की ओर धकेल रही है.

क्योंकि दूध और मांस के उत्पाद बच्चों को उनके शारीरिक और मानसिक विकास के लिए दिए जाने चाहिए.

बीफ़ पर प्रतिबंध लगाकार बीजेपी भारतीयों के मानसिक और शारीरिक विकास पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश कर रही है.

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