तेंदुओं के आतंक के साए में देहरादून!

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देहरादून में कथित आदमखोर मादा तेंदुआ को मार गिराने के बावजूद तेंदुओं का आतंक थम नहीं रहा है.

लोग दहशत में हैं और हर हाल में तेंदुओं को मार डालने के पक्ष में हैं. वहीं पशु प्रेमियों ने तेंदुओं के शिकार का कड़ा विरोध किया है.

कुछ दिन पहले देहरादून के सुरक्षित केंद्रीय वन अनुसंधान संस्थान (एफ़आरआई) के अहाते में एक लड़की को तेंदुए ने मार डाला था.

प्रशासन ने उसे आदमखोर घोषित कर दिया और उसे मारने के लिए पेशेवर शिकारी बुलवाए गए.

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छह शिकारियों की एक टीम ने मादा तेंदुए को मार डाला.

पोस्टमार्टम में पाया गया कि मादा तेंदुए के गर्भ में तीन बच्चे थे.

उस पर गोली चलाने वाले एक शिकारी को इस बात से इतना सदमा पहुंचा कि उसने भविष्य में शिकार नहीं करने की कसम खाई है.

नाम नहीं बताने की शर्त पर उसने कहा, “मैं अब शिकार करना छोड़ दूंगा और वन विभाग के ऐसे किसी टास्क में शामिल नहीं होऊंगा. मुझे इस बात का जरा भी भान नहीं था कि वो मादा तेंदुआ गर्भवती थी. मुझे अगर यह पता होता तो मैं उस पर कभी गोली नहीं चलाता. मुझे बहुत पछतावा हो रहा है. अब मैं शिकार करने की बजाय पशुओं को बेहोश करने की ट्रेनिंग लूंगा ताकि जंगली जानवरों की ग़ैर ज़रूरी हत्या रोकी जा सके.”

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इस मादा तेंदुए के शिकार के बाद तेंदुओं का रिहायशी इलाकों में आना और लोगों पर हमला करना थम नहीं गया है.

एफ़आरआई परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं. बताया जाता है कि यहां पांच तेंदुओं के होने का सबूत मिला है.

इसके अलावा टपकेश्वर के इलाके में भी लोगों ने तेंदुए देखे है. इसके बाद वहां तेंदुआ पकड़ने के लिये कुत्ते और बकरी बांधे गए हैं और पिंजरे लगाए गए हैं.

तेंदुए ने चकराता-लाखामंडल रास्ते पर ग्वांसापुल के नज़दीक एक मज़दूर पर हमला बोल दिया था.

हालांकि मजदूर ने तेंदुए का मुक़ाबला किया. उसके साथियों के शोर मचाने पर तेंदुआ जंगल में भाग गया.

इसी तरह डाकरा गांव में भी एक तेंदुए ने पिता और बेटे पर हमला कर दिया था. दोनों ने किसी तरह जान बचाई.

स्थानीय निवासी आनंद चौहान का कहना है कि “तेंदुए के डर से गांव के लोग घास काटने के लिए भी जंगल नहीं जा रहे है.”

मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस मामले में एक ऐसी बात कही है जिस पर शायद ही अमल हो पाए. उनका कहना है कि वो केंद्र से कहेंगे कि “उत्तराखंड से कुछ तेंदुओं को दूसरे राज्यों में शिफ्ट कर दिया जाए.” पशु प्रेमियों ने भी उन्हें आड़े हाथों लिया है.

पीपल फॉर एनीमल की गौरी मौलेखी का आरोप है कि “तेंदुओं की संख्या बढ़ी नहीं है बल्कि घटी है. पूरे प्रदेश में धड़ल्ले से छोटे जानवरों का शिकार किया जा रहा है और जिसमें वन विभाग, सरकारी अधिकारियों और दूसरों की साठगांठ है.”

उनका कहना है कि “पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के अनुसार किसी भी पशु को बाघ अथवा अन्य जंगली पशु के लिए शिकार के लिेए चारे के रूप में बांधना दंडनीय अपराध है.”

इस बात पर चर्चा होती रही है कि तेंदुओं का आहार बढाने के लिये शिकार प्रजनन केंद्र बनाए जाएं जहां हिरण, चीतल और जंगली सूअर जैसे जानवरों का प्रजनन किया जाए और जहां से उन्हें नियमित अंतराल पर जंगलों में छोंड़ दिया जाए.

अगर ऐसा हो तो तेंदुओं को जंगल में ही पर्याप्त आहार मिल जाएगा. उन्हें भोजन की तलाश में आबादी वाले इलाक़ों की ओर रुख नहीं करना पड़ेगा.

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