क्यों ख़ास है रक्षामंत्री की जापान यात्रा

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रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर का पहली विदेश यात्रा के रूप में जापान और दक्षिण कोरिया को चुनने का राजनीतिक, सामरिक और प्रतीकात्मक महत्व है.

भारत और जापान के बीच पिछले 10-15 साल से रिश्तों को मज़बूत बनाने की कोशिशें चल रही है.

संभावनाएं

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जापान में प्रधानमंत्री शिंजो आबे और भारत में नरेंद्र मोदी के आने के बाद कई संभावनाएं बनी है.

मनोहर पर्रिकर की यह जापान यात्रा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मई में होने वाली यात्रा से पहले हो रही है तो हो सकता है कि सुरक्षा से जुड़े कुछ बड़े मुद्दों पर सहमति बने.

इसमें से जिस एक मुद्दे का ज़िक्र जापान ने किया है वो है हिंद और प्रशांत महासागर में दोनों देश के जुड़े अपने-अपने राष्ट्रीय हित.

भारत में पानी में उतरने वाले हवाई जहाज बनाने की दिशा में बात हो सकती है.

'मेक इन इंडिया' की दिशा में कुछ बढ़ोत्तरी हो सकती है क्योंकि जापान के पास काफी आधुनिक तकनीक है.

जापान के पास सैन्य क्षेत्र में फ़ाइटर एयरक्राफ्ट बनाने की क्षमता काफी विकसित है. नेवी के क्षेत्र में निगरानी करने के मामले में जापान आगे हैं.

तो इन क्षेत्रों में भारत के साथ भागीदारी बनने की संभावना है.

तकनीकी क्षमता

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भारत अभी तक आर्टिलरी गन का कोई विकल्प नहीं बना पाया है जबकि जापान साल 1930 में ही इस तरह की आर्टिलरी गन बना चुका है.

इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जापान सैन्य तकनीक के मामले में कितना शक्तिशाली और विकसित देश है.

भारत की तीनों सेनाओं को एक खास प्लेटफॉर्म की ज़रूरत है. भारत में 10 लाख की क्षमता वाली थल सेना है. लेकिन हथियारों के लिए उसे दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है.

वायु सेना में लड़ाकू विमानों की संख्या सिकुड़ रही है. पिछले 70 सालों में भारत ने काफ़ी तरक्की की है लेकिन अभी भी हम छोटे हवाई जहाज नहीं बना सकते हैं.

नौसेना के मामले में भी भारत जापान से जहाज निर्माण के क्षेत्र में काफी कुछ प्राप्त कर सकता है.

(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन से बातचीत पर आधारित)

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