क्या केजरीवाल फिर सबको हैरान करेंगे?

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किसी व्यक्ति को उसके शब्दों के चुनाव के ज़रिए अच्छे से समझा जा सकता है.

जब हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में सोचते हैं तो डिज़ाइन, संगठन, राष्ट्र-राज्य की सामूहिकता, अनुशासन और विकास की छवि उभरती है.

मोदी एक प्रोजेक्ट की तरह ज़्यादा लगते हैं जबकि अरविंद केजरीवाल एक व्यक्ति की तरह दिखते हैं.

'क्या मैं केजरीवाल को संदेह का लाभ दूंगा?'

अरविंद का स्टाइल, उनका व्यवहार, संकट के समय उनकी प्रतिक्रिया एक लिटमस टेस्ट की तरह होगा कि क्या भारत एक नई किस्म की राजनीति पैदा कर सकता है या नहीं, वो राजनीति जो ज़्यादा संभावनाओं वाली है, नागरिकों के प्रति बेहद संवेदनशील और ज़्यादा समावेशी है.

अभी केजरीवाल का आंदोलन परिकल्पना ज़्यादा है. यह ऐसा लगता है जो स्थापित तथ्य की तरह दिखने की बजाय, ऐसा प्रयोग जिसे और स्वीकृति मिलना बाकी है.

इसके मद्देनज़र नेतृत्व के दायित्व का भार चौतरफ़ा है.

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कोई पूछ सकता है कि इस आदमी की प्रकृति क्या है. पहली नज़र में वो चार्ली चैप्लिन के व्यक्तित्व जैसा अनाकर्षक सा लगता है.

हालांकि वो एक ऐसा चुंबक है जो आपको अपनी ओर खींचता है. वो दयालु इंसान जैसा दिखता है और ऐसा दिखता है कि जैसे अभी अभी बीमारी से उठकर आया हो.

वो एक ऐसे स्कूली बच्चे की तरह नाक सुड़कता है, जो हमेशा अपने शर्ट की काल्पनिक बांह को तलाशता रहता है.

पार्टी नेतृत्व पूरी तरह नाकाम रहा: मेधा पाटकर

पिछले कुछ साल अपना असर दिखा चुके केजरीवाल अभी-अभी बंगलुरू में नैचरोपैथी सेंटर से लौट आए हैं.

असल में अगर मोदी की राजनीति डिज़ाइनर ड्रेस से संचालित है, तो कहा जा सकता है कि राजनीति के प्रति केजरीवाल का नज़रिया नैचरोपैथी वाला है.

वो बीमारी के मूल का इलाज करते हैं जबकि वो महसूस करते हैं कि समाज अक्सर प्रकृति की ओर जाने की बजाय बड़ी हड़बड़ी में है.

केजरीवाल की टाइमिंग

एक स्तर पर उनकी राजनीति, सच्चे होने के लिहाज़ से बहुत अच्छी है. यह एक बच्चे के धर्मयुद्ध जैसा ज़्यादा दिखता है. एक ऐसे युवा स्काउट जैसा, जिसने अन्ना हजारे की पुरानी स्टाइल और किरण बेदी के सख़्त और स्थापित व्यक्तित्व से ख़ुद को अलग कर लिया है.

लेकिन केजरीवाल को टाइमिंग की समझ थी. उन्होंने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन को पूरी तरह एक पार्टी में तब्दील कर दिया. एक व्यक्ति केंद्रित जुनून को उन्होंने कई एजेंडों वाले संगठन में तब्दील कर दिया.

यह ऐसे ही था जैसे हैरी पॉटर ने मुख्य धारा की राजनीति को बदल डाला और इसका भारत ने बड़े उत्साह से स्वागत किया.

यह तरीक़ा कम स्वार्थीपन वाला और अधिक आसान शिकार बन जाने वाला था, थोड़ा बहुत वैसा ही जैसे वो व्यक्ति के रूप में ख़ुद हैं.

लेकिन इस तरह की राजनीति की खूबियों में भी कई कमियां हैं. केजरीवाल पारदर्शिता, वैचारिकता और वफ़ादारी से लेकर विविधता पर जोर देते हैं.

पारदर्शिता ईमानदारी की गारंटी हो सकती है, लेकिन यह आपको आसान शिकार भी बनाती है.

हरेक संदेह, मतभेद और झगड़ा साफ़ दिखाई देता है और हर बहस ऐसे दिखती है जैसे आप सार्वजनिक रूप से गंदा कपड़ा धोते हैं.

'आप' यानी राजनीतिक धारावाहिक?

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आम आदमी पार्टी के झगड़े भारत का लोकप्रिय राजनीतिक धारावाहिक बन गए हैं.

एक राजनेता के रूप में केजरीवाल को नेतृत्व और स्थानीयतावाद के बीच संतुलन बिठाना था. उन्होंने अक्सर ऐसे फैसले लिए जो कुछ ख़ास मुद्दों को लेकर थे.

लेकिन जिस चीज़ ने उन फ़ैसलों को मान्यता दिलाई वो स्थापित मानदंड नहीं थे, बल्कि उस समय के घटनाक्रम थे.

लोगों को लगा कि वो असंभव चीज़ों के बीच संतुलन स्थापित करने वाले व्यक्ति हैं.

उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के इलेक्शन मैन अमित शाह की छवि को रौंदते हुए दिल्ली का चुनाव जीत कर करिश्मा कर दिया.

लेकिन अभी जीत का जश्न समाप्त भी नहीं हुआ था कि पार्टी में दरारें और गुट सामने आ गए और 'आप' दाग़दार हीरे की तरह दिखने लगी.

केजरीवाल और चुप्पी

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चुनावी युद्ध ने अपना असर दिखा दिया था. जीत के दिन जैसे ही केजरीवाल ने अपनी पत्नी को गले लगाया, उससे लगा कि दोनों ने बहुत झेला है.

इधर वो नैचरोपैथी क्लीनिक गए जहां प्रकृति अपने तरीक़े से चलती है. उधर बहुत सुर्ख़ियां पा चुके भूषण और योगेंद्र यादव ने उनके नेतृत्व और उनकी राजनीतिक सूझबूझ पर सवाल खड़ा कर दिया.

केजरीवाल पर चुप्पी शोभा नहीं देती. शुद्धिकरण की घोषणा के साथ उन्होंने चुप्पी तोड़ी और इस बात का संकेत दिया कि उनके साथ विश्वासघात हुआ है.

और इसके साथ ही 'आप' बन गई 'आम' पार्टी

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उन्होंने यादव को खलनायक के रूप में दिखाने की कोशिश की लेकिन यह तरीक़ा बहुत असरदार नहीं रहा.

ऐसा करते हुए वो शिकायती व्यक्तित्व वाले लगे, उनके भाषणों में नाराज़ व्यक्ति का पुट था. वो और उनकी पार्टी अपनी चमक खोती दिखी.

अचानक केजरीवाल घिसे पिटे दिखते हैं. उनके विरोधी अपनी वैधानिकता को सिद्ध करते हैं लेकिन उनकी महत्वाकांक्षाएं भी बेहद साफ़ दिखती हैं.

ऐसा लगता है कि 'आप' को भोथरा बना दिया गया है लेकिन जो चीज़ आज दांव पर है वो है एक ख़ास किस्म की राजनीति की उम्मीद.

एक और करिश्मे का इंतज़ार?

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केजरीवाल की एक सामान्य विलक्षणता ने एक पार्टी बनाई थी और नौजवानों, ग़रीबों और अल्पसंख्यकों ने उसमें रुचि दिखाई थी.

यह समावेशी लेकिन खाते पीते मध्यमवर्गीय व्यक्ति की स्टाइल थी. एक हीरो के रूप में केजरीवाल को हीरो बने रहना था और इसके लिए उन्हें कुछ करिश्माई काम करना है.

उन्हें फिर से अपना जादू हासिल करने की ज़रूरत है क्योंकि केजरीवाल ने एक ऐसी दुनिया बनाई है जहां जादू और करिश्मा संभव दिखता है.

अगर कोई इस बात का इंतज़ार करता है कि वो पार्टी बॉस की अपेक्षा ज़्यादा कुछ साबित होंगे तो उसे दुख ही होगा.

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पहले वाला जज़्बा हासिल करने के लिए उन्हें एक और आंदोलन की ज़रूरत है. लेकिन अब चुनौती नौकरशाही की दुनिया में है. क्या केजरीवाल अपना करिश्मा जारी रख पाएंगे?

क्या वो एक ऐसी स्टाइल ईजाद कर पाएंगे जो हज़ारों वॉलंटियरों के उत्साह को बनाए रख सके, जिन्होंने 'आप' के लिए संघर्ष किया?

भारत इंतज़ार कर रहा है और उम्मीद कर रहा है कि क्या केजरीवाल एक बार फिर सबको हैरान कर देंगे.

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