देखिए आदिवासी कलाकारों के हुनर...

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Image caption गोंड आदिवासी समुदाय से आए राम सिंह उर्वेती की यह गोंड पेंटिंग.

आदिवासी समुदायों में लोक कलाओं की एक शानदार परम्परा रही है. देश के विभिन्न क्षेत्रों की कलाएं अपने इलाक़े के नाम पर जानी जाती हैं.

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इस कला को और निखारने के लिए भोपाल में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में आदिवासी कलाकारों की एक वर्कशॉप आयोजित की गई.

ललित कला अकादमी, नई दिल्ली और भारत भवन, भोपाल के सहयोग से आयोजित इस वर्कशॉप में देश के कोने-कोने से आदिवासी कलाकारों ने हिस्सा लिया.

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वर्ली आर्ट महाराष्ट्र की एक ख़ूबसूरत पेंटिंग विधा है. शिविर के दौरान तैयार किया गया वर्ली आर्ट का एक नमूना.

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ये हैं पार्वती बाई. वो छत्तीसगढ़ के सरगुजा से आई हैं. इन कलाकृतियों में आदिवासी संस्कृति की झलक साफ देखी जा सकती है.

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शिविर में पेंटिंग बनाने वाले कलाकारों के अलावा मूर्तिकार, पॉटर और धातु की तरह-तरह की कलाकृतियां बनाने वाले कलाकार भी आए हुए थे.

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आदिवासी पेंटिंग की एक ख़ास बात होती है प्रकृति के साथ जुड़ाव. इसके अलावा पेंटिंग में डिटेलिंग पर बहुत बारीक़ काम किया जाता है.

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छत्तीसगढ़ के बस्तर से आए कलाकार लकड़ी पर आकृति उकेरते हुए.

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय मुख्य रूप से अदिवासी और लोक कलाओं के संरक्षण और प्रोत्साहन का काम करता है.

कभी-कभी इन कलाकारों का संग्रहालय तक पहुंचना मुश्किल होता है. ऐसी स्थिति में संग्रहालय के कर्मचारी कलाकार के घर जाकर ख़ास कला विधि को संरक्षित करने का प्रयास करते हैं.

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शंकर लाल एक कलाकृति को अंतिम रूप देते हुए. यह पारंपरिक ढोकरा आर्ट का एक नमूना है.

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इस वर्कशॉप में तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर, केरल, आंध्र प्रदेश, हिमांचल प्रदेश, कर्नाटक, मिज़ोरम, त्रिपुरा, मेघालय, सिक्किम, नई दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल और राजस्थान के कलाकार शामिल हुए.

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ये हैं मध्य प्रदेश की मशहूर आदिवासी पेंटर भूरी बाई वर्कशॉप में अपने सधे हाथों से कैनवस पर रंग भरती हुईं.

(सभी तस्वीरेंः फ़ोटो पत्रकार प्रकाश)

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