'ओपेरा करते ही दूर हो जाते हैं सब दर्द'

तिब्बती ओपेरा

"मैंने कसम खाई है कि जब तक मेरे हाथ-पैर चलेंगे, मैं ओपेरा करने की कोशिश करती रहूंगी."

यह कहना है भारत में तिब्बती ओपेरा सिखाने वाली 60 साल की नांगा ल्हामू का.

इन दिनों नांगा ल्हामू हिमाचल प्रदेश के धर्मकोट में चल रहे "शोतोन" तिब्बती उत्सव में हिस्सा लेने आई हैं. इसे मनाया जा रहा है निर्वासन में तिब्बती ओपेरा के 20 साल पर. इस मौके पर भारत के कोने-कोने से तिब्बती कलाकार और दर्शक आए हुए हैं.

उनके लिए यह साल और भी ख़ास इसलिए है क्योंकि इस साल तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा 80 साल के हो जाएंगे. नांगा इससे खुश हैं क्योंकि ऐसा हर साल नहीं होता कि भारत के कोने-कोने से तिब्बती आएं और एक दूसरे से मिलें.

'पढ़ाई में ज़ीरो, वैसे हीरो'

दलाई लामा की उपस्थिति में धर्मकोट के टिब्बतन इंस्टीट्यूट ऑफ़ परफ़ार्मिंग आर्ट्स में इस उत्सव का उद्घाटन हुआ.

यहां चारों ओर रंग बिरंगी परंपरागत पोशाकें पहने, बूढ़े और जवान नज़र आ रहे थे. कोई नगाड़ा बजा रहा था, कोई नाच रहा था, कोई गा रहा था. तिब्बती ओपेरा में पुरानी लोक कथाओं को बेहद मनोरंजक रूप से दर्शाया जाता है. यह फेस्टिवल पांच अप्रैल तक चला.

नांगा ल्हामू बताती हैं "जब चीन ने 1959 में तिब्बत पर क़ब्ज़ा किया था तब मैं पांच साल की थी. मैं अपने पूरे परिवार के साथ भारत आ गई और कॅलिम्पोंग में रहने लगी. पिताजी को हिन्दी नहीं आती थी तो काम मिलने में मुश्किल हुई. उनको आखिर मज़दूरी का काम मिला. वह दिन आसान नहीं थे."

वह बताती हैं, "पिताजी को नौकरी तो मिल गई, लेकिन इससे हमारी आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं हुई और मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी. घर में मैं अपने पिताजी से ओपेरा सीखने लगी. पढ़ाई में 'ज़ीरो' थी पर वैसे 'हीरो' थी."

"निर्वासन में रहने से पहले मेरे पिताजी तिब्बत में ओपेरा सिखाते थे. आज मैं तिब्बती ओपेरा सिखाती हूँ, खुद भी ओपेरा करती हूं. अब मैं करीब 60 साल की हो गई हूं. टांगों में, हाथों में, उंगलियों में दर्द होता रहता है. अब ज़्यादा काम भी नहीं कर पाती. लेकिन जब भी ओपेरा करती हूं, नाचती हूं- तब सब दर्द दूर."

'मैं हूं खलनाइका'

नांगा ल्हामू ओपेरा में गाती हैं, नगाड़ा बजाती हैं और नाचती भी हैं. नांगा ल्हामू जो ओपेरा करने कॅलिम्पोंग से धर्मकोट आई हैं उसका नाम है 'सूकी नीमा'.

वह बताती हैं, "मेरा किरदार हैं 'सूकी नीमा' का जो एक खलनायिका है. वह राजा की दूसरी रानी को मारना चाहती है."

वह कहती हैं असल ज़िंदगी में भी कभी कभी खलनायिका बनना पड़ता है, "बच्चे मुझसे कभी कभी पूछते हैं कि क्या ज़रूरत है ओपेरा सीखने की? तो मैं उन्हें कैसे समझाऊँ? इसलिए कभी कभी सख़्त हो जाना पड़ता है. इसकी वजह से मुझे उनकी नफ़रत भी सहनी पड़ती है."

'तिब्बत वापस जा पाऊंगी?'

नांगा ल्हामू कहती हैं, "तिब्बती ओपेरा सीखना और सिखाना ज़रूरी है. इन कहानियों से अच्छे और बुरे का पता लगता है. बहुत सीख हैं इन कहानियों में.

"एक दिन मैं वापस तिब्बत जाकर लोगों को सिखाना चाहती हूँ तिब्बती ओपेरा. पर जब तक यह राजनीतिक मसला हल होगा, तब तक मुझे नहीं पता कि मैं ज़िंदा रहूंगी भी या नहीं."

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