जनता परिवार की गाड़ी मंडल से आगे बढ़ेगी?

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एक बार फिर से पुराने जनता परिवार के विलय की कवायद शुरू हो गई है.

और ये भी दिलचस्प है कि कभी राजनीति के विपरीत ध्रुवों की तरह रहे लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव के ज़रिए ये पहल हुई है.

राजद ने औपचारिक तौर पर घोषणा भी कर दी है और मुलायम सिंह के नेतृत्व पर भी आम राय बनती हुई दिख रही है.

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निश्चित तौर पर ये एक समाप्त हो चुके विपक्ष की एक नई उम्मीद को जगाता है.

संभावना!

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और नई उम्मीद इस अर्थ में, कि अगर राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल युनाइटेड का विलय हुआ और इसमें मुलायम सिंह की पार्टी भी शामिल रहेगी जिससे चीजें बदल सकती हैं.

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लेकिन बिहार में आरजेडी और जेडीयू के विलय का विशेष महत्व है क्योंकि साल के अंत में राज्य में चुनाव होने हैं और इसमें अगर दोनों ही राजनीतिक पार्टियों के वोट एकजुट हुए तो भारतीय जनता पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है.

हालांकि अभी हालात ऐसे हैं कि विपक्षी पार्टियां सत्तारूढ़ बीजेपी को रोकना चाहती हैं पर ये सवाल बना हुआ है कि इन पार्टियों में कल जब नेतृत्व अगली पीढ़ी के हाथ में आएगा तो इस गठजोड़ के बने रहने की कितनी संभावना रहेगी.

मंडल की विरासत

जनता परिवार की पार्टियों में इस बात पर सहमति है कि सिर्फ मंडल से काम नहीं चल सकता. यदि इस राजनीतिक प्रयोग में बसपा भी जुड़ पाती तो नई संभावनाएं हो सकती थीं पर फिलहाल इसके कोई आसार नहीं हैं.

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मंडल की राजनीति की सारी ताकत को बीजेपी ने काफी हद तक सोख लिया है और कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि मोदी को नेता बनाकर ये पार्टी मंडल की विरासत पर भी दावेदार की हक़दार हो गई है.

जनता परिवार की पार्टियां जो मंडल की विरासत की पहली नंबर की दावेदार हुआ करती थीं, अब पीछे खिसकती नज़र आ रही हैं.

अतीत के अनुभव

Image caption कहा जाता है कि मोरारजी देसाई की सरकार भी जनता पार्टी के अंतर्विरोधों के कारण गिर गई थी.

इस विलय के बाद वे अगर दूसरे नंबर पर आ जाएं तो शायद बात बने लेकिन इनकी राजनीतिक गाड़ी मंडल से आगे बढ़नी चाहिए.

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जनता परिवार की पार्टियां मिलकर चुनाव लड़ भी लेती हैं, परिवार का विलय भी हो जाता है लेकिन राजनीतिक इतिहास इससे उलट संकेत करते हैं.

अतीत में जनता परिवार जब भी सत्ता में आया है, चाहे वह जनता पार्टी की सरकार हो या वीपी सिंह से लेकर संयुक्त मोर्चा की सरकार, महत्वाकांक्षाओं के चलते ये कुनबा बिखर गया.

जनता का भरोसा

जनता के विश्वास का सवाल तो है ही. हालांकि पिछले दिनों लालू यादव के परिवार और मुलायम सिंह के परिवार में पारिवारिक संबंध स्थापित हो गया है. इससे दोनों राजनीतिक पार्टियों के बीच करीबी बढ़ी है.

चूंकि सजा पाने के बाद लालू यादव चुनाव लड़ने के योग्य नहीं रहे और रही बात मुलायम सिंह यादव और नीतीश कुमार की, तो इनमें से मुलायम अधिक वरिष्ठ हैं.

उनको सभी लोग नेता के रूप में स्वीकार कर रहे हैं लेकिन आने वाले समय में यदि बाक़ी नेताओं की महत्वाकांक्षाएं सर न उठाएं तो हो सकता है कि ये जनता का भरोसा भी हासिल कर ले.

(बीबीसी हिंदी संवाददाता समीरात्मज मिश्र से वरिष्ठ पत्रकार अरुण त्रिपाठी की बातचीत पर आधारित.)

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