'अरविंद को इंसान रहने दें, देवता न बनाएं'

आम आदमी पार्टी के समर्थक इमेज कॉपीरइट EPA

आम आदमी पार्टी की आपसी खींचतान मीडिया की सुर्खियों में रही है. पार्टी के एक के बाद एक कई नेता पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप लगा चुके हैं.

योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, आनन्द कुमार और अजित झा को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर कर दिया गया. वहीं एडमिरल रामदास को पार्टी के लोकपाल के पद से हटा दिया गया.

इन्हीं मुद्दों पर पार्टी के नेता आशुतोष से बीबीसी के राजेश जोशी ने बातचीत की है.

आशुतोष के साथ इंटरव्यू

इमेज कॉपीरइट AFP

क्या आम आदमी पार्टी अंदरूनी टूट की तरफ़ बढ़ रही है?

बहुत सारे लोग आम आदमी पार्टी की ऑबिच्यूरी लिखने की फिराक में रहते हैं. मुझे लगता है कि ये तीसरी या चौथी बार है जब आम आदमी पार्टी की ऑबिच्यूरी लिखने की कोशिश की गई है. हमने हर बार ऐसे लोगों को ग़लत साबित किया है.

पार्टी के अंदर टूट जैसी कोई बात नहीं थी. पार्टी के अंदर अनुशासनहीनता की बातें थीं. कोई भी पार्टी न्यूनतम अनुशासन लागू किए बिना आगे नहीं बढ़ सकती. उसी अनुशासन लागू करने की प्रक्रिया के तहत हालिया फ़ैसले लिए गए हैं.

पार्टी की ऑबिच्यूरी लिखने की किसने कोशिश की, क्या बाहर के लोगों ने ऐसी कोशिश की या पार्टी के ही बड़े नेताओं ने ऐसी कोशिश की थी?

इस देश में एक ऐसा बडा़ बौद्धिक वर्ग है जिसने आम आदमी पार्टी या अन्ना के आंदोलन को उस तरीके से नहीं देखा जैसे उसे देखा जाना चाहिए था. पार्टी बनाने के बाद जब हम पहली बार चुनाव लड़ रहे थे तो किसी ने कहा था कि हमें 28 सीटें आएँगी? सब लोगों ने हमें दफन कर दिया था. जब 28 सीटें आईं तो अख़बारों ने कहा ये क्रांति से कम नहीं है.

जब हमें लोकसभा में हार मिली तो हमें जमानत जब्त पार्टी कहा गया. एक बार फिर हमारी ऑबिच्यूरी लिखी गई. यहाँ तक कि अरविंद केजरीवाल के अपार्टमेंट के गॉर्ड तक ने ताना मारा कि चले थे बड़े हीरो बनने...चले थे प्रधानमंत्री बनने. उसके बाद हमें दिल्ली में 67 सीटों पर जीत मिली जिसके बारे में कभी किसी ने सोचा न था.

इमेज कॉपीरइट PTI

67 सीटें मिलने के बाद क्या अरविंद केजरीवाल तानाशाह में बदल गए हैं, जैसा प्रशांत भूषण ने उनपर आरोप लगाया है?

मुझे लगता है कि मज़बूत नेतृत्व के बिना पार्टी की दिशा वैसी नहीं हो सकती है जैसी होनी चाहिए. अरविंद पर पहली बार ऐसे आरोप नहीं लगे हैं. ऐसे आरोप उनपर अन्ना हज़ारे के आंदोलन के वक़्त भी लगे थे. जब वो पहली बार चुनाव लड़ रहे थे तब भी ऐसे आरोप लगे थे.

मैं उनके साथ तीन-साढ़े तीन साल से जुड़ा हुआ हूँ. मैं पूरी जिम्मेदारी से कहना चाहता हूँ कि अरविंद अपने आप में बहुत लोकतांत्रिक हैं.

मैं कुछ उदाहरण देना चाहूँगा, जैसे शाज़िया इल्मी ने ऐसे ही आरोप लगाए थे, फिर योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, आनंद कुमार जैसे बुद्धिजीवियों ने उनपर ऐसे आरोप लगाए हैं.

हमारे ऊपर जब भी ऐसे आरोप लगते हैं हम उन्हें गंभीरता से लेते हैं कि कहीं हमारे अंदर कोई गड़बड़ी तो नहीं है. लेकिन एक बात आप भी मानेंगे कि जिनके ख़िलाफ़ अनुशासनहीनता की कार्रवाई होती है वो इसी तरह के आरोप लगाते हैं. और ये केवल आम आदमी पार्टी की बात नहीं है, सारी पार्टियों में यही होता है.

इमेज कॉपीरइट PTI

अरविंद केजरीवाल पर दोहरी बात करने के आरोप लगते हैं. अरविंद केजरीवाल ने अपने साथियों के लिए जैसी ज़बान का प्रयोग किया है, जिसे यहाँ नहीं कहा जा सकता...क्या इससे उनका क़द कम नहीं होता?

पहली बात ये है कि जब आप निजी ज़िंदगी में होते हैं तो क्या आप ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते. मैंने अरविंद से कहा कि आपको तो गाली देने भी नहीं आती...ख़ुदा न खास्ता अगर किसी दिन मेरी कोई रिकॉर्डिंग हो जाए तो तब तो बहुत दिक्कत हो जाएगी.

आपकी रिकॉर्डिंग हो जाए तो किस तरह की दिक्कत होगी...आप अपने विरोधियों को क्या कहेंगे?

बात विरोधियों की नहीं है...हम सब नितांत निजी क्षणों में ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं...दुनिया का हर आदमी करता है. अरविंद भी इंसान हैं, उन्हें इंसान ही रहने दें देवता न बनाएं.

इमेज कॉपीरइट AP

लोकपाल आपके लिए जीवन-मरण का मुद्दा था, लेकिन आपने पार्टी के लोकपाल एडमिरल रामदास को कार्यकाल पूरा होने से पहले ही हटा दिया, क्यों?

देखिए, अंपायर अंपायरिंग करे तो अच्छा लगता है लेकिन वो बैटिंग, बॉलिंग, फ़ील्डिंग करने लगे तो सही नहीं लगता. अंपायर का दोनों टीमों से मतलब नहीं होता. वो निष्पक्ष होता है. एडमिरल रामदास ने चिट्ठी लिखकर निष्पक्षता का उल्लंघन किया जो उन्हें नहीं करना चाहिए था.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार