जिसने सलमान रश्दी बनकर मचा दिया तहलका

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आम चुनाव के परिणाम आने को थे और लगभग तय हो चुका था कि नरेंद्र मोदी अगले प्रधानमंत्री होंगे.

लेखक और विश्लेषक पंकज मिश्रा ने उनकी राजनीति पर 'द गार्डियन' अख़बार में एक लंबा-चौड़ा लेख लिखा था और लोगों ने उसे अपनी-अपनी राजनीतिक सोच के हिसाब से पसंद या नापसंद किया था.

उस लेख को पढ़ने वालों में से थे कैलिफ़ोर्निया की सैंटा क्लारा यूनिवर्सिटी में मीडिया स्टडीज़ पढ़ाने वाले रोहित चोपड़ा भी, और उनके शब्दों में "‏शायद वो अब तक का सबसे लंबा लेख था और उस लेख में पंकज मिश्रा ने लगभग उन सभी किताबों और फ़िल्मों का ज़िक्र कर दिया जो उन्होंने पढ़ रखी थीं या देख रखी थीं!"

उनका कहना है कि लेख को पढ़ने के फ़ौरन बाद उनके मन में एक ख़्याल आया कि सलमान रुश्दी इस राजनीतिक बदलाव पर क्या कहते.

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और फिर कुछ दोस्तों के साथ सलाह मशविरा के बाद शुरू हुआ ट्विटर पर एक पैरोडी एकाउंट @RushdieexplainsIndia यानी 140 अक्षरों या कैरेक्टर्स में अगर सलमान रुश्दी भारतीय राजनीति पर कटाक्ष करते तो क्या कहते.

पहले तो चोपड़ा ने ख़ुद को गुमनाम रखा लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि रुश्दी के नाम से वो ट्वीट कर रहे हैं.

आज मीडिया की बड़ी-बड़ी हस्तियां, राजनीति में रुचि रखने वाले लोग, फ़िल्म स्टार इस ट्विटर हैंडल को फ़ोलो और री-ट्वीट तो करते ही हैं, ख़ुद सलमान रुश्दी ने पहले एक ट्वीट के ज़रिए और फिर एक ईमेल लिखकर चोपड़ा के इस व्यंग्यात्मक प्रयोग को सराहा.

मैंने रोहित चोपड़ा से इस पूरे प्रयोग पर विस्तार से बात की.

रुश्दी को चुनने की कोई ख़ास वजह?

ये एक तरह से पश्चिमी मीडिया पर भी टिप्पणी थी क्योंकि भारत में जब भी कोई बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल मचती है तो पश्चिमी मीडिया अक्सर तीन नामों का सहारा लेती है: सलमान रुश्दी, अरुंधति रॉय और पंकज मिश्रा.

दूसरा, मैं रुश्दी का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं और रुश्दी ने विभाजन के बाद के भारत और दक्षिण एशिया को अपनी किताबों में बहुत अच्छी तरह चित्रित किया है.

मिसाल के तौर पर उनके लेखों का संग्रह 'इमैजिनरी होमलैंड्स' अगर आप पढ़ें तो उसमें एक चैप्टर है कि किस तरह राजीव गांधी न चाहते हुए भी राजनीति में आए.

आज अगर आप उस चैप्टर में से राजीव की जगह राहुल कर दें तो लगेगा कि बिल्कुल आज की राजनीति पर टिप्पणी है.

क्या रुश्दी ने कभी अपने नाम के प्रयोग पर आपत्ति जताई?

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बिल्कुल नहीं बल्कि उन्होंने इस ट्विटर हैंडल के सामने आने के एक हफ़्ते बाद ट्वीट करके मुझे कहा "क्या आप किम किर्केगा--र्दाशियां के रिश्तेदार हैं? अगर नहीं तो उनसे मिलिए, आप दोनों की अच्छी जमेगी."

(किम किर्केगार्दाशियां @KimKierkegaard एक बेहद लोकप्रिय ट्वीटर हैंडल है जिसमें जानी मानी मॉडल किम कारदाशियां और डेनमार्क के दार्शनिक सोरेन किर्केगार्द के विचारों को एक साथ जोड़कर व्यंग्यात्मक लहजे में पेश किया जाता है).

और फिर जब कुछ दिनों के लिए मैंने ये एकाउंट बंद कर दिया तो उन्होंने ईमेल के ज़रिए मेरे काम की काफ़ी तारीफ़ की.

जब रुश्दी का ई-मेल मिला तो आपकी क्या प्रतिक्रिया थी?

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अद्भुत. मैंने कॉलेज में उनकी किताबें पढ़ी थीं फिर कई बार उनके लेक्चर सुने थे.

लेकिन जिस दिन वो ईमेल आया वो क्षण हमेशा याद रहेगा क्योंकि मैं और मेरी पत्नी एक हिंदी फ़िल्म "हंपटी शर्मा की दुल्हनिया" देख कर बाहर निकले थे, सोच रहे थे कि क्या सचमुच ये एक घंटे ड्राइव करके देखने आने वाली फ़िल्म थी और तभी मैंने वो ईमेल देखा.

अपने देश से हज़ारों मील दूर, बॉलीवुड मूवी देखकर निकलते हुए रुश्दी का ईमेल मिले तो वो अहसास हमेशा याद रहता है.

तो @rushdieexplainsindia पर आपकी सबसे पसंदीदा ट्वीट क्या रही है?

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एक बार दो या तीन दिनों के ही अंदर ऐसा हुआ कि शिवसेना ने बंबई, या फिर मुंबई कह देता हूं, में चौबीसों घंटे नाइट लाइफ़ के हक़ में बयान दिया, उसी दौरान मोदी ने सेक्यूलरिज़्म के समर्थन में भाषण दिया तो मैंने ट्वीट किया "मोदी सेक्यूलर बने, शिवसेना नाइट क्लबों के समर्थन में और प्रकाश करात ने वृंदा से पूछा--क्या मैं कोका कोला पी सकता हूं."

इस ट्वीट को शबाना आज़मी ने रीट्वीट किया था. आम आदमी पार्टी, केजरीवाल, राहुल गांधी ये सब मेरे ट्वीट्स के लिए बेहद अच्छी सामग्री देते हैं.

क्या भारतीय राजनेता व्यंग्य बर्दाश्त करने की क्षमता रखते हैं?

कायदे से तो उन्हें बर्दाश्त करना चाहिए क्योंकि वो ख़ुद ऐसे-ऐसे अभद्र बयान देकर भी उम्मीद करते हैं कि वो बिना माफ़ी मांगे या कभी-कभी कामचलाऊ माफ़ीनामा देकर बच निकलें.

लेकिन दूसरी सच्चाई ये भी है कि नाराज़गी ज़ाहिर करना एक उ्दयोग बना हुआ है हमारे यहां जिसका कई लोग भारी फ़ायदा उठाते हैं.

क्या आपकी किसी ट्वीट पर कोई राजनेता नाराज़ भी हुआ है?

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राजनेता तो नहीं लेकिन उनके कुछ समर्थकों की सेना ने सोशल मीडिया पर मुझ पर हमला किया है, ख़ासतौर से कुछ दक्षिणपंथी पत्रकारों ने.

उनका कहना था कि अमरीका में बैठे हुए कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी इस सरकार को नीचा दिखाने की कोशिशों में लगे हैं. लेकिन इतना तो चलता है, क्योंकि अगर आप एक व्यंग्यात्मक प्रयोग कर रहे हों और कुछ लोग तिलमिलाएँ नहीं ये तो संभव नहीं है.

आप मीडिया स्टडीज़ के जानकार हैं. क्या भारत में सोशल मीडिया आम आदमी का हथियार बन सकता है?

मुझे भारत में विरोधाभासी ट्रेंड नज़र आते हैं. एक तरफ़ तो ये एक लोकतांत्रिक मंच बना है लेकिन दूसरी तरफ़ ये एक अलोकतांत्रिक रवैए को भी हवा देता है ख़ासकर जब आप देखते हैं कि सोशल मीडिया पर ट्रोल्स कहलाने वाले लोगों की एक सेना किसी अन्य विचारधारा का मुंह बंद कर उन्हें दबा देती है.

दक्षिणपंथी ताक़तें ख़ास तौर से हिंदू दक्षिणपंथी ताक़तें बेहद कारगर तरीके से सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रही हैं.

मोबाइल क्रांति की वजह से राजनीति में लोगों की भागीदारी बढ़ रही है लेकिन साथ ही लोगों का मुंह भी बंद किया जा रहा है, ख़ासतौर से महिलाएं सोशल मीडिया पर ज़्यादा निशाना बनती हैं इस तरह के बर्ताव का.

इसके अलावा भारत में अभी भी एक डिजिटल डिवाइड है और सही मायने में इसे आम आदमी की आवाज़ बनाने के लिए कई बुनियादी बदलाव करने होंगे.

वो सभी वायदे जिनके बूते पर मोदी ये चुनाव जीत कर आए हैं उन्हें सही मायने में पूरा करने की ज़रूरत है.

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