अब यूरोप से क्या चाहते हैं मोदी?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गुरुवार से फ्रांस, जर्मनी और कनाडा का दौरा शुरू हो रहा है.

बीते 42 सालों में कनाडा के दौरे पर जाने वाले वो पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं.

फ्रांस और जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और मोदी कई मोर्चे पर संबंधों को सुधारने की कोशिश करेंगे.

मोदी के विदेश दौरों को लेकर देश के भीतर एक किस्म की आलोचना भी हो रही है कि जब देश के अंदर किसानों की हालत नाज़ुक है तो प्रधानमंत्री विदेश दौरा कर रहे हैं.

हालांकि जेएनयू के प्रोफ़ेसर आरके जैन का मानना है कि जब तक विदेशी निवेश और टेक्नोलॉजी का प्रवाह दुरुस्त नहीं होता, घरेलू मोर्चे पर भी मुश्किलें बनी रहेंगी.

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नरेंद्र मोदी ने इस साल सबसे अधिक महत्व एशिया और अफ़्रीका को दिया. उनकी विदेश नीति में यूरोप अभी तक प्राथमिकता में नहीं रहा है.

लेकिन अब इस इलाक़े पर मोदी ध्यान दे रहे हैं तो इसके पीछे कुछ कारण हैं.

फ्रांस जाने के पीछे प्रधानमंत्री के कई मक़सद हैं.

पहला, जैतापुर में परमाणु संयंत्र को लेकर बातचीत को वो अंतिम रूप देने की कोशिश करेंगे. एक अरसे से इस बात पर गतिरोध बना हुआ है कि किस दर पर भारत को बिजली दी जाए.

दूसरा, लड़ाकू विमान राफ़ाल सौदे को लेकर जो ठहराव आया है, उस पर भी इस दौरे के दौरान समाधान की संभावना है.

हालांकि कहा जा रहा है कि इस दौरे की सफ़लता को राफ़ाल सौदे से नहीं आंका नहीं जाना चाहिए.

राफ़ेल सौदा

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लेकिन मुझे लगता है कि अगर यह सौदा नहीं हो पाता है तो फ़्रांसीसी कंपनी डेसॉल्ट के लिए यह बड़ा झटका होगा.

तीसरा, इस दौरे में प्रधामंत्री टूलूज़ जा रहे हैं, जहां वो स्मार्ट सिटी को लेकर कोई समझौता कर सकते हैं.

चौथा, अंतरिक्ष कार्यक्रमों को लेकर भी कहा जा रहा है कि कुछ समझौते होने की संभावना है.

और पांचवा, रक्षा क्षेत्र में फ्रांस के साथ भारत की भागीदारी हाल के दिनों में बढ़ी है. हिंद महासागर में रडार शेयरिंग हो या संयुक्त सैन्य अभ्यास का मामला हो, इसमें कुछ प्रगति देखने को मिल सकती है.

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जहां तक जर्मनी की बात है, वहां मेक इन इंडिया को भारी प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद की जा रही है.

क्योंकि भारत इस साल हैनोवर इंडस्ट्रियल फ़ेयर का साझीदार है. यह दुनिया का सबसे बड़ा इंडस्ट्रियल फ़ेयर है.

इसमें छोटी बड़ी 400 कंपनियां हिस्सा ले रही हैं.

इसके अलावा, जर्मनी को वोकेशनल ट्रेनिंग में महारत हासिल है, इस क्षेत्र में भारत लाभ उठाने की कोशिश करेगा.

प्रधानमंत्री का ग्रीन एनर्जी की टेक्नोलॉजी पर भी फ़ोकस रहेगा. इसके अलावा ग्रिड मैनेजमेंट, ट्रांसमिशन लॉस आदि पर भी सहयोग मिलने की उम्मीद है.

परमाणु समझौता

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कनाडा के दौरे पर परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर होने की संभावना है.

घरेलू मोर्चे और विदेश नीति को अलग अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए, इन दोनों में गहरा संबंध है.

मोदी घरेलू मोर्चे प्रधानमंत्री कई सुधारों को आगे ले जाना चाहते हैं लेकिन राज्यसभा में बहुमत न होने की वजह से वो क़ामयाब नहीं हो पा रहे हैं.

लेकिन यदि विदेशों से निवेश नहीं आता है, टेक्नोलॉजी और ट्रेनिंग का दरवाज़ा नहीं खुलता है तो घरेलू एजेण्डा पूरा करने में काफ़ी मुश्किलें आएंगी.

(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे की सेंटर फ़ॉर यूरोपियन स्टडीज़, जेएनयू के प्रोफ़ेसर आरके जैन से बातचीत के आधार पर)

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