इराक़ में लापता हुए पंजाब के बेटे

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इराक़ में पंजाब के कई नौजवान फंसे हुए हैं. इनके परिजनों के अनुसार एजेंटों ने इन युवकों को अफ़ग़ानिस्तान भेजने का झांसा देकर, इराक़ भेज दिया.

ज़्यादातर युवकों के परिजनों की आर्थिक हालत अच्छी नहीं है. पिछले साल जून के बाद से ज़्यादातर का संपर्क अपने परिवार से नहीं हुआ है.

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैय्यद अकबरूदीन का कहना है कि इन युवकों के मौजूदा ठिकाने के बारे में पुख़्ता जानकारी की कमी है लेकिन उनका पता लगाने की कोशिश की जा रही है.

बीबीसी ने ऐसे कुछ युवकों के परिजनों से बात की है:

जीतो, सोनू की माँ

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Image caption सोनू की माँ जीतो

मेरा बेटा सोनू ग़रीबी के कारण बाहर गया. हमने उसे बाहर भेजने के लिए एक लाख का लोन लिया था. वह फ़ोन करके बताता था कि लड़ाई चल रही है.

सरकार आश्वासन देती है कि हमारे बच्चे सुरक्षित हैं लेकिन उन्हें आने में वक़्त लगेगा. सरकारी आश्वासन से हमें कुछ राहत तो मिलती है लेकिन घर पहुंचते-पहुंचते हम निराशा में घिर जाते हैं.

सोनू को इस उम्मीद पर विदेश भेजा था कि वहां जाकर वह अपने पैरों पर खड़ा होगा और परिवार को ग़रीबी से बाहर निकालेगा लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंज़ूर था.

अब मैं पास-पड़ोस के घरों में घरेलू काम करके बड़ी मुश्किल से अपने और सोनू के परिवार को पाल रही हूं.

हरभजन कौर, हरसिमरजीत की मां

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मेरे बेटे हरसिमरजीत ने जीव विज्ञान से 12वीं पास की थी. उसने एक साल फ़ार्मेसी की पढ़ाई की लेकिन उसका मन नहीं लगा. उसके बाद हमने उसे बाहर भेजने का फ़ैसला किया.

हमने एक एजेंट से संपर्क किया. उसने कहा था कि वह उसे अफ़ग़ानिस्तान के इर्बिल में भेजेगा लेकिन साल 2013 में उसने हरसिमरजीत को इराक़ भेज दिया.

वह वहां ख़ुश था. उसे क़रीब 24,000 रुपये तनख़्वाह मिलती थी. आख़िरी बार हमने उससे 15 जून, 2014 को बात की थी. उसने कहा था - 'मैं ठीक हूं मेरी चिंता न करें.'

उसके बाद हम केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों से छह बार मिल चुके हैं. मैं पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से भी तीन बार मिल चुकी हूं. मैं सुषमा स्वराज से भी मिली हूं.

सभी ने कहा कि भरोसा रखें, बच्चे सुरक्षित हैं. उनके आश्वासनों में थोड़ी सच्चाई ज़रूर होगी.

नशे ने पंजाब को बर्बाद कर दिया है. लोग अपने बच्चों को नशे से बचाने के लिए विदेश भेज देना पसंद करते हैं. अगर इन बच्चों को यहां कोई काम मिल जाता तो हम उन्हें बाहर क्यों भेजते?

सुखविंदर कौर, मनजिंदर की माँ

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Image caption मनजिंदर की माँ सुखविंदर

मुझे अपने बेटे मनजिंदर से बहुत उम्मीदें थीं लेकिन कुछ नहीं हुआ. ग़रीबी और बेरोज़गारी के कारण उसे विदेश जाना पड़ा.

यहां के बहुत से लोग कमाने के लिए विदेश जाते हैं. वह बस कुछ साल विदेश में काम करना चाहता था.

हमें पता था कि वो अफ़ग़ानिस्तान जा रहा है, इराक़ नहीं. मैंने उससे पिछले साल 10 जून को बात की थी. तब उसने कहा था कि एजेंट से बात करके वापसी का टिकट भिजवाओ.

बाद में उसने हमें बताया कि इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने उन्हें अगवा कर लिया है. जब हमने पूछा कि उन्हें कहां ले जाया गया है तो उसने कहा कि कल बताऊंगा. 15 जून, 2014 को उसने कहा कि बांग्लादेशी नागरिकों को आईएस ने छोड़ दिया लेकिन उन्हें नहीं छोड़ा.

सरकार कहती है कि हमारे लोग सुरक्षित हैं. लेकिन मीडिया में ख़बरें आती हैं कि सरकार को भी इन बच्चों के हालात के बारे में नहीं पता. हमारे बच्चों के बारे में अभी तक कोई ठोस जानकारी नहीं मिली है.

गुरपिंदर कौर, मनजिंदर की बहन

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Image caption मनजिंदर सिंह की माँ सुखविंदर और बहन गुरपिंदर (दाएँ).

पिछले साल छह जून को मनजिंदर का फ़ोन आया था. उसने बताया कि उनकी कंपनी पर हमला हुआ था. उन सभी ने इराक़ स्थित भारतीय दूतावास से संपर्क किया लेकिन कुछ नहीं हुआ.

11 जून को इस्लामिक स्टेट ने उन्हें अगवा कर लिया लेकिन उन्हें पता नहीं था कि उन्हें किसने अगवा किया है.

अग़वा होने के बाद भी वो 15 जून तक हमसे बात करते रहे. मेरे भाई ने बताया था कि 15 जून तक उन लोगों को खाना-पानी मिल रहा था.

उसने हमें बताया था कि पंजाब के लगभग 30 लड़के वहाँ हैं.

मैं चाहती हूं कि इस मामले को लेकर प्रधानमंत्री से मिलूं. मुझे लगता है कि उन्हें इसका संज्ञान लेना चाहिए क्योंकि 10 महीने से ऊपर हो गए हैं और कम से कम एक बार मेरे भाई से बात तो हो जाए.

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