भारत में जजों की नियुक्ति अब कैसे होगी?

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भारत सरकार ने उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग क़ानून को एक अधिसूचना के ज़रिए लागू कर दिया गया है.

इसका मतलब ये हुआ कि भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति अब पहले की तरह नहीं होगी.

हालांकि भाजपा सरकार के इस फ़ैसले को चुनौती देने वाली कई याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन हैं और संभवत: कल इस मामले में सुनवाई होगी.

इस मुद्दे से जुड़े कुछ अहम सवालों पर नज़र डाले:

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग क्या है?

न्यायिक नियुक्ति आयोग को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हो चुका है और अब छह सदस्यों वाले इस आयोग की बैठक होनी है.

जजों की नियुक्ति करने वाले इस आयोग की अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश करेंगे.

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ न्यायाधीश, क़ानून मंत्री और दो जानी-मानी हस्तियां भी इस आयोग में रहेंगी.

रहा सवाल इन दो हस्तियों का, तो उनका चयन एक तीन सदस्यीय समिति करेगी जिसमें प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और लोक सभा में नेता विपक्ष या सबसे बड़े विपक्षी दाल के नेता होंगे.

दिलचस्प बात ये भी है कि इस कानून की एक धारा के तहत अगर आयोग के दो सदस्य किसी नियुक्ति पर सहमत नहीं हुए तो आयोग उस व्यक्ति की नियुक्ति की सिफ़ारिश नहीं करेगा.

ख़ास बात ये है कि इस आयोग का काम सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट और सभी 24 उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति रहेगा.

अभी तक जजों की नियुक्ति कैसे होती है?

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पिछले लगभग 20 वर्षों से भी ज़्यादा से भारत में जजों की नियुक्ति में एक कोलीजियम सिस्टम चल रहा था.

ये कोलिजियम सिस्टम (जजों की एक पीठ) खुद सुप्रीम कोर्ट के उन तीन अहम फैसलों के बाद आया था जिन्हे 'थ्री जजेज़ केस' भी कहा जाता है.

वर्ष 1993 में सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ, एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड मामले में, कह चुकी है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश की राय नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती.

सीधा इशारा कानून बनाने वालों पर था, मतलब सरकार की भूमिका ख़त्म सी हो गई.

लेकिन केंद्र में आसीन भाजपा सरकार ने सरकार बनाते ही राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग पर मुहिम तेज़ कर दी और इसे कानून में तब्दील कर दिया गया.

हालांकि इस फ़ैसले को चुनौती दी गई है और सुप्रीम कोर्ट में जल्द ही मामले की सुनवाई होने वाली है.

भारतीय व्यवस्था की विदेशों से तुलना

भारत के संविधान में अनुच्छेद 124 के मुताबिक़ भारत के राष्ट्रपति द्वारा जजों की नियुक्ति होनी है और वे इसे सुप्रीम कोर्ट के जजों से राय लेने के बाद कर सकते थे.

ये तरीका वर्षों तक चलता रहा. हालांकि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति पर यदा कदा सवाल भी उठते रहे हैं.

कुछ विश्लेषकों की राय है कि कोलीजियम सिस्टम के पहले वाले नियुक्ति के तरीके में केंद्र सरकार अपनी पसंद की कथित नियुक्तियां कर सकती थी जबकि दूसरों का मत है कि स्वयं जजों को अपने साथी जजों का चयन नहीं करना चाहिए.

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप बताते हैं कि भारत एकमात्र ऐसा लोकतंत्र था जहाँ जज ही साथी जजों की नियुक्तियां कर रहे थे. अमरीका में भी जजों की नियुक्ति को सीनेट से पारित कराना पड़ता है.

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