राहुल समस्या हैं या समाधान?

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Image caption राहुल गांधी और सोनिया गांधी फ़रवरी, 1998 में अमेठी के दौर पर.

सन साठ के दशक में यह सवाल अख़बार पूछने लगे थे कि ‘नेहरू के बाद कौन?’ किताबें छपी थीं. गली-नुक्कड़ पर बहसें थीं.

पूछा जाता था कि इंदिरा गांधी ज़िम्मेदारी संभाल पाएंगी या नहीं? अनुभव की कमी की दलीलें थीं और विपक्षी नेता उन्हें ‘गूंगी गुड़िया’ कहते थे.

इंदिरा पर सवाल

इंदिरा गांधी की सार्वजनीनता सवाल के घेरे में थी. आरोप थे कि वे एक चौकड़ी की गिरफ़्त में हैं. आम कार्यकर्ताओं की उन तक पहुंच नहीं है. पार्टी विभाजन की ख़बरें आम थीं और ‘इंडीकेट-सिंडीकेट’ बन गए थे.

लेकिन जब चुनाव के नतीजे निकले तो सबके सुर बदल गए. एक अख़बार ने लिखा- ‘इंडीकेट विंडीकेट.’ यानी इंदिरा गांधी की कांग्रेस पास हो गई और सिंडीकेट ने वहीं दम तोड़ दिया.

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Image caption इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ललित कला अकादमी में.

जवाहरलाल नेहरू के बाद ‘आफ़्टर नेहरू हू’ जैसा सवाल न पूछा गया न उसकी नौबत आई. कांग्रेस की राजनीति की दिशा दो दु:खद घटनाओं ने तय की. इंदिरा और राजीव गांधी की हत्या ने यह सवाल पूछने का अवसर नहीं छोड़ा.

पीवी नरसिम्हाराव के बाद इस सवाल का वजूद क़रीब-क़रीब मिट गया और उस शून्य को, बिना सवाल-जवाब, सोनिया गांधी ने भरा.

तब इसे त्याग और बलिदान की परंपरा का मुद्दा बना दिया गया. पहले पार्टी और फिर देश के एक बड़े तबक़े ने मान लिया कि इंदिरा और राजीव के बाद त्याग की त्रिमूर्ति सोनिया गांधी से पूरी होती है. दस साल इसी में निकल गए.

राजनीति में आगमन

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Image caption राजीव गांधी, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दाह संस्कार के समय.

सोनिया और राहुल गांधी कुछ ही फ़ासले से राजनीति में आए. एक त्रिमूर्ति का हिस्सा बन गईं लेकिन दूसरे की जगह आम जनमानस में 11 साल बाद भी तय नहीं हो पाई. लोकतांत्रिक शिक्षा प्रणाली ने राहुल गांधी को भरपूर अवसर दिए और वह हर बार एक और मौक़ा पाते रहे.

रोज़ की किचकिच वाले घरों से अक्सर कुछ विद्यार्थी पढ़ाई के लिए कहीं चले जाते हैं. छिपकर तैयारी करते हैं. बताया जाता है कि राहुल भी कांग्रेस के दैनिक प्रपंच से दूर ‘अज्ञातवास’ में आने वाले समय के लिए तैयारी कर रहे हैं.

इसके बावजूद सवाल वही बना हुआ है. लोकतंत्र के इम्तहान में राहुल परचा बाद में जब लिखेंगे तब लिखेंगे, पार्टी का एक ख़ेमा आश्वस्त नहीं है कि वे सही जवाब लिख पाएंगे.

कांग्रेस में दो ख़ेमे साफ़ दिखते हैं. कई लोगों के मन में हिचक बाक़ी है. कैप्टेन अमरिंदर सिंह, शीला दीक्षित और संदीप दीक्षित को छोड़ दें तो कई दूसरे कहने लगे हैं कि आख़िरी मिनट की तैयारी से इम्तहान में बहुत फ़ायदा नहीं होता.

पार्ट टाइम राजनीति

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दस जनपथ के क़रीबी, दिग्विजय सिंह जैसे मुरीद भी मानते हैं कि राजनीति ‘हफ़्ते के सातों दिन, दिन के चौबीसों घंटे’ चलने वाला काम है. राजनीति में ‘पार्ट-टाइम’ जैसी कोई चीज़ नहीं होती.

दूसरी ओर पार्टी की युवा ब्रिगेड है, जिसे राहुल गांधी में अवसर और संभावना नज़र आती है. उनका तर्क है कि हाथ पीछे बांधकर जंग नहीं जीती जाती.

पार्टी तय नहीं कर पा रही है कि उसके ‘स्थापित, सर्वस्वीकार्य, प्रतिभा-संपन्न’ नेता राहुल गांधी प्रश्न हैं या उत्तर. अवसर इसी बात पर निर्भर करेगा. नतीजे की बहुत परवाह उसे नहीं है क्योंकि वह उसके हाथ में नहीं है.

रिज़ल्ट तो दस जनपथ से आना है.

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