मोदी: धुआंधार विदेश यात्राओं से क्या हासिल?

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यूरोप और कनाडा दौरा भारत के लिए कितने काम का है?

फ्रांस में रफाएल डील और जैतापुर न्यूक्लियर पावर प्लांट की बात हो, जर्मनी में मेक इन इंडिया के नारे के साथ हनोवर व्यापार मेले का सहयोगी बनना या कनाडा से परमाणु ईंधन पर हुआ करार. क्या पिछले एक हफ़्ते में हुए इन दौरों ने प्रधानमंत्री के साथ सरकार की छवि पर भी असर डाला है?

विस्तार से पढ़िये

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अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने टाइम पत्रिका में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का परिचय लिखते हुए उन्हें सुधार का सेनापति बताया है. शायद पहली बार किसी अमरीकी राष्ट्रपति ने किसी भारतीय प्रधानमंत्री का ऐसा परिचय लिखा है.

विश्लेषकों के अनुसार मोदी ने अपने शपथ ग्रहण में पहली बार सार्क देशों के राष्ट्रप्रमुखों को न्यौता दे कर भारत की एक अलहदा विदेश नीति की बुनियाद रख दी थी.

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अपने 11 महीने के कार्यकाल में 15 देशों का दौरा कर के मोदी ने कम से कम इतना तो साबित कर ही दिया है कि उनकी सरकार अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत की जगह को लेकर काफी गंभीर है. लेकिन इन यात्राओं से आखिर भारत को हासिल क्या हुआ.

वरिष्ठ पत्रकार मधूसूदन आनंद कहते हैं, "इन दौरों से हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि हालांकि भारत एक विकासशील देश है लेकिन एक बड़ी क्षेत्रीय ताकत के रूप में उभर रहा है. इसलिए दुनिया का ध्यान भारत की तरफ जा रहा है और नरेंद्र मोदी ने अपने नेतृत्व और दूरदृष्टि से दुनिया का ध्यान भारत की ओर खींचा है.’’

दौरे पर चर्चा

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यूरोप और कनाडा के दौरे को लेकर पहले जितनी सरगर्मी नज़र नहीं आ रही थी लेकिन रफायल सौदे का एलान होने के साथ ही चर्चा गर्म हो गई.

जर्मनी में भारत के पूर्व राजदूत रहे सुधीर व्यास ने बीबीसी से कहा,’’इस संपूर्ण दौरे को देखा जाए तो एक तरफ रणनीतिक सहयोग है और दूसरी तरफ आर्थिक व सांस्कृतिक सहयोग. इन्हें प्रधानमंत्री के दौरे से जो बढ़ावा मिला है वो आपसी संबंधों को बहुत दूर तक ले जाएगा.’’

फ्रांस के साथ तो भारत के रणनीतिक संबंध रहे हैं लेकिन व्यापारिक संबंधों में बाज़ी जर्मनी ने मारी है. यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था तकनीक के मामले में भी भारत के साथ सहयोग करती रही है.

हनोवर व्यापार मेले में भारत को सहयोगी देश बनाकर जर्मनी ने आने वाले दिनों में दोनों देशों के संबंध के संकेत दे दिए हैं.

चीन का डर नहीं

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सुधीर व्यास ने इन आशंकाओं को भी खारिज किया है कि चीन के साथ काम कर रही जर्मन कंपनियां भारत का रुख़ नहीं करेंगी.

उनका कहना है, "भारत में जर्मनी की 600-700 कंपनियां मौजूद हैं. आईआईटी मद्रास में जर्मनी 1960 से ही शिक्षा और तकनीक के मामले में सहयोग करता आ रहा है. पुणे में कम से कम 200 जर्मन कंपनियां काम कर रही हैं. मैं नहीं समझता कि चीन में कंपनियों के काम करने का असर भारत में उनके काम पर पड़ेगा.’’

भारतीय प्रधानमंत्री यूरोप से चल कर जब कनाडा पहुंचे तो वहां दशकों से रह रहे प्रवासी भारतीयों का दल उनसे मिलने बड़ी उत्साह से सामने आया. वहां पर कनाडा के साथ अहम परमाणु ईंधन करार भी हुआ.

साथ घूमते रहे स्टीफन हार्पर

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प्रधानमंत्री के हालिया दौरे पर साथ गए वरिष्ठ पत्रकार अजय कौल बताते हैं कि कनाडा में प्रधानमंत्री के दौरे को लेकर आम लोगों के साथ राजनेताओं में भी खासी दिलचस्पी दिखी.

अजय कौल ने कहा, ’’ओटावा में प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद कनाडा के पीएम स्टीफन हार्पर उन्हीं के विमान में बैठ कर टोरंटो भी आ गए. ये एक नई बात थी.’’

अमरीका की राय नहीं बदलेगी

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यह महज संयोग ही है कि जिस वक्त प्रधानमंत्री अपने यूरोप और कनाडा दौरे पर हुए करारों का जश्न मना रहे हैं, अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने टाइम पत्रिका में उनका परिचय लिखते वक्त उनकी तारीफ की है.

ओबामा का लेख इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत यात्रा से वापस लौटने के बाद उन्होंने भारत सरकार को सांप्रदायिक सद्भाव बनाने और सभी धर्म के लोगों की सुरक्षा करने की सलाह दी थी. हालांकि विश्लेषक इस लेख को बहुत अहम नहीं मान रहे.

मधुसूदन आनंद का कहना है, ''सुधार का सेनापति कहने का मतलब मैं यह लूंगा कि आर्थिक क्षेत्रों में ही वो सुधार कर रहे हैं. यहां से जाने के बाद ओबामा ने जो कहा था वो बात इस नए लेख से खत्म नहीं हो गई है. दूसरी बात यह कि एक जाते हुए राष्ट्रपति का उनको पीठ थपथपाना नरेंद्र मोदी के लिए बड़ी बात हो सकती है लेकिन अमरीका में इससे प्रधानमंत्री को लेकर राय रातोंरात बदल जाएगी ऐसा मैं नहीं मानता.’’

भारतीय प्रधानमंत्री के अंतरराष्ट्रीय दौरे दुनिया भर में लोगों का ध्यान खींच रहे है इसमें कोई संदेह नहीं लेकिन इन दौरों के आधार पर सरकार की सफलता का दावा करना अभी शायद जल्दबाज़ी होगी.

11 महीनों में 15 देशों का चक्कर लगा चुके प्रधानमंत्री के सामने अभी 49 महीनों का कार्यकाल बाकी है.

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