किसान देंगे राहुल को ज़मीन?

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अगले महीने मोदी सरकार के एक साल पूरे होने पर इसकी समीक्षा होगी. साथ ही विपक्ष की भूमिका पर भी नज़र डाली जायेगी.

पिछले साल नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की आम चुनाव में भारी जीत का सेहरा मोदी लहर को दिया गया.

क्या ये लहर अब कमज़ोर पड़ती जा रही है?

शायद हाँ. विपक्ष की भूमिका पर एक नज़र डालने से इसके संकेत मिलते हैं.

दिल्ली में हार

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पहला संकेत फ़रवरी में देखने को मिला जब दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी को करारी शिक़स्त दी.

इस हार से भाजपा से अधिक नरेंद्र मोदी को धक्का लगा क्योंकि उन्होंने खुद दिल्ली में कई चुनावी रैलियां की थीं.

इस हार का सीधा असर ये हुआ कि कई पार्टियों का खोया हुआ आत्मविश्वास वापस होता नज़र आया.

विरोधी दल

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जनता दल की सालों से बिखरी कई स्वतंत्र इकाइयां एक प्लेटफार्म पर इकट्ठा होना शुरू हो गईं जिसका नतीजा पिछले हफ़्ते जनता परिवार की शक्ल में देखने को मिला.

छह पार्टियों का जनता परिवार मिलकर एक हो गया जो इस साल बिहार और 2017 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए एक चुनौती बन सकता है.

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रविवार को भूमि अधिग्रहण बिल के ख़िलाफ़ कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की किसान रैली भी इस बात की तरफ इशारा करती है कि कांग्रेस का मनोबल और आत्म विश्वास वापस आ रहा है.

रविवार की किसान रैली सफल रही या नहीं? कांग्रेस और राहुल गांधी को इसका सियासी फ़ायदा होगा या नहीं?

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इन सवालों के जवाब के लिए कुछ समय तक इंतज़ार करना पड़ेगा. लेकिन शायद राहुल गांधी किसानों से जुड़ने में ज़रूर क़ामयाब रहे क्योंकि उन्होंने अपने असामान्य रूप से आक्रामक भाषण में वही बातें कही जो वहां आए किसान सुनना चाहते थे.

'वो हमारी भूल थी'

बिहार के मधुबनी ज़िले से आये एक किसान ने कहा कि पिछले साल वो और उसके कई किसान साथी मोदी की लहर में बह गए थे.

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"वो हमारी भूल थी. हम आज यहाँ आये हैं इस उम्मीद से कि कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी हमारी समस्याओं को समझेंगे और हमारे लिए संघर्ष करेंगे."

कांग्रेस की किसान रैली में कांग्रेस विरोधी बातें तो कोई नहीं करेगा लेकिन इस रैली में कई ऐसे लोग उपस्थित थे जो पिछले साल मोदी और भाजपा के साथ थे.

हरियाणा से आये किसानों के एक गुट ने भाजपा और नरेंद्र मोदी पर किसानों को गुमराह करने का इल्ज़ाम लगाया.

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ठीक उसी तरह से जैसे सोनिया गांधी ने अपने भाषण में लगाया.

'विदेश यात्रा से फ़ुर्सत मिले तब तो'

भूमि अधिग्रहण बिल पर चिंता जताते हुए पंजाब से आये किसानों ने कहा कि "मोदी को विदेश यात्रा करने से फ़ुर्सत मिले तब तो वो हमारी मुश्किलों पर ध्यान दे सकेंगे?"

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राहुल गांधी ने किसानों के मूड को समझते हुए कई बार प्रधानमंत्री पर सीधा प्रहार किया.

उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाते हुए कहा, "मोदी जी ने उद्योगपतियों से हज़ारों करोड़ का कर्ज लेकर चुनाव जीता है. अब ये कर्ज़ चुकाया जाएगा भारत की नींव को कमज़ोर कर के. इसीलिए यूपीए के भूमि क़ानून को कमज़ोर किया गया. और अन्य भी कई क़दम उठाए जाएँगे."

किसकी सुनेगा किसान?

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ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री बिल की मुखालफ़त को गंभीरता से ले रहे हैं.

जब किसानों की रैली हो रही थी ठीक उससे कुछ मिनट पहले वो भाजपा के सांसदों को सम्बोधित कर रहे थे.

इस बैठक में उन्होंने इलज़ाम लगाया कि भूमि अधिग्रहण बिल के बारे में विकृत लोग किसानों को गुमराह कर रहे हैं.

ये बिल प्रधानमंत्री के लिए प्रतिष्ठा की बात है.

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Image caption बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी

लेकिन साथ ही इस बिल से जुड़े किसानों के हित को राष्ट्रीय एजेंडे पर मज़बूती से रखना राहुल गांधी के सियासी करियर को दोबारा ज़िंदा करने के लिए ज़रूरी है.

दिलचस्प बात ये है कि दोनों नेताओं को किसानों का मसीहा नहीं समझा जाता लेकिन शायद दोनों को आज किसानों की बहुत याद आ रही है. किसान किसकी सुनेगा?

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