आपः जंग में जीता कोई नहीं, हार गया सपना

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राजनीतिक संघर्ष किसी घटना की तरह रोचक होते हैं तो कथा जैसे उबाऊ भी. इनकी पटकथा का अनुमान लगाना आसान होता है क्योंकि हारने वाला पक्ष धुंधलके में खो जाता है और जीतने वाला आधिकारिक इतिहास लिखता है.

अगर आप 'आप' (आम आदमी पार्टी) की जंग को देख रहे हैं तो बातों के स्तर में गिरावट नज़र आने लगी होगी. अब ऐसा लग रहा है कि लड़ाई अरविंद केजरीवाल और युवा दंभी साथियों बनाम समस्या पैदा करने वाले योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के बीच है.

इन दोनों के बाहर निकलने का अनुमान पहले से था और 'आप' के स्तर के गिरने का भी.

त्रासदी

मेरे लिए 'आप' की जंग इसके मुख्य प्रतिभागियों से शुरू नहीं होती बल्कि दर्शकों से होती है, जिनमें से बहुत सारे 'आप' के सपने में साझीदार थे और उसे टूटते हुए देख रहे हैं.

'आप' विविधता का एक सपना थी, मतभिन्नता का, अनोखेपन की उपलब्धि का. 'आप' एक सपना थी कि राजनीति भी पारदर्शी हो सकती है, कि यह लोगों को सशक्त कर सकती है.

आदर्शवादियों की एक पूरी पीढ़ी जो 'आप' में शामिल हुई थी उसने इसके 'महारथियों' को लड़ते देखा और किसी ने भी इसका इतिहास लिखने की कोशिश नहीं की.

क्या ये सभी युवा केजरीवाल या योगेंद्र से सहमत हैं या जो उन्होंने देखा उससे नाराज़ हैं? आप उनकी ख़ामोशी का कैसे पता लगाएंगे?

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आपने कमाल की पार्टी की प्रवक्ता आतिशि मार्लेना को उत्कंठा के साथ दोनों गुटों को पकड़ कर रखने की कोशिश करते और नाकाम होते देखा. मेरे पास युवा कार्यकर्ताओं के पत्र हैं जिनमें उन्होंने उम्मीद ज़ाहिर की है कि कोई दोनों गुटों को साथ बनाकर रख पाएगा.

'आप' की असली कहानी ऐसे गुटों की ख़ामोशी है जिन्हें उम्मीद थी कि 'आप' का कुछ अलग करने का रास्ता अलग था. 'आप' की त्रासदी यह है कि इस जंग के बाद हर व्यक्ति थोड़ा छोटा हो गया है.

एक पार्टी के रूप में यह 'आप' की नई त्रासदी यह है कि ऐसी पार्टी जिसमें इतने कमाल के लोग थे उसका कुल जमा उसके हिस्सों के जोड़ से कम हो गया है. 'आप' की जंग में कोई भी विजेता नहीं है क्योंकि जो हारा है वह 'आप' की परिकल्पना है.

विनम्रता का नाटक

इसका मतलब यह नहीं है कि जो 'आप' आज मौजूद है वह अच्छा काम नहीं करेगी. विभिन्न जगहों पर स्थानीय बजट के साथ इसके कुछ काम कमाल के हैं. इसने स्थानीय राजनीति में बमुश्किल ही दिखने वाला सशक्तिकरण का अहसास पैदा किया है.

लेकिन कहानी की तरह राजनीति भी कई बार भारी पड़ती है. जैसे-जैसे विचार धुंधले होते हैं, विकल्प कम होने लगते हैं, दुखद ढंग से और कई बार अनिवार्य रूप से यह सत्ता संघर्ष के स्तर पर गिर जाती है. कुछ जीत जाते हैं, कुछ हार जाते हैं.

दरअसल 'आप' का संकट जीत का संकट है. दिल्ली चुनाव में इसकी अभूतपूर्व उपलब्धि ने उल्लासोन्माद पैदा कर दिया था.

इसके नेताओं को लगा कि निर्णायक जीत को निर्णायक फ़ैसलों की ज़रूरत है और 'आप' में सफ़ाई की कोशिश शुरू हो गई. बहुत से 'आप' कार्यकर्ताओं को लगता है कि चुनाव के दौरान प्रशांत भूषण पार्टी की अनावश्यक आलोचना कर रहे थे जबकि तब ज़रूरत एकता दिखाने की थी.

एक सवाल स्टाइल का भी है. जहां शांति भूषण हमेशा की तरह कुकुरमाछी (gadfly) की तरह बर्ताव कर रहे थे, योगेंद्र यादव पैगंबर, विशेषज्ञ बने हुए थे और पार्टी के विनीत कार्यकर्ता बनने का दावा कर रहे थे.

लगता है कि 'आप' में बहुत से लोग विनम्रता के इस नाटक से ऊब गए थे, विनय को पाखंड मानने लगे थे और कहने लगे थे योगेंद्र के स्टाइल में गहरा आत्मप्रेम और अहंकार छुपा है.

बहुसंख्यावाद का लोकतंत्र

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एक चीज़ तो तय है कि प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव दोनों मीडिया के चहेते थे. उनके पास रोज़ नए रहस्योदघाटन और प्रवचन होते थे.

श्रम के प्रतीकात्मक विभाजन की वजह से भी दरार पैदा हुई.

अरविंद सक्रिय मुखिया के रूप में काम कर रहे थे जबकि योगेंद्र यादव पुजारी और ओझा की भूमिका निभाते हुए दावा कर रहे थे कि केजरीवाल ने लोकतंत्र के नियमों का उल्लंघन किया है और आंदोलन के विचारों को दूषित कर दिया है. वह शुद्धता के रखवाले बन गए जबकि केजरीवाल अमल में सिद्धहस्त हो गए.

यह करीब-करीब सिद्धांत और व्यवहार का अंतर था जिसने एक तरह से शिक्षण और व्यवहार की पारंपरिक दूरी पैदा कर दी.

यादव खेल के नियमों को बचाए रखने में करीब-करीब ब्राह्मणवादी हो गए. केजरीवाल और उनके युवा तुर्क जीत की दिशा में काम करना चाहते थे, जो चुनाव में उन्होंने हासिल भी की.

लेकिन संदेह बने रहे. क्योंकि जब केजरीवाल ने चुनावी जीत हासिल की तो बहुतों को लगा कि वह आंतरिक लोकतंत्र की लड़ाई हार गए हैं.

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इसके बदले केजरीवाल ने भूषण और यादव पर जंग के दौरान पार्टी को धोखा देने का आरोप लगाया.

इस पूरी प्रक्रिया के दौरान विश्वास, विविधता में भरोसा और वह मतभिन्नता नष्ट हो गई जिसके साथ पार्टी शुरू हुई थी. अंततः लोकतंत्र विविधता का महत्व समझने के बजाय सुविधानुसार बहुसंख्यावाद के साथ हो गया और बहुमत ने यादव, भूषण और आनंद कुमार को बाहर कर दिया.

राजनीतिक क्षुद्रता

विद्रोही शोर मचा सकते हैं लेकिन पार्टी केजरीवाल के साथ है. वह उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में काम करता देख रहे हैं और इंतज़ार कर रहे हैं कि वह क्या कर पाते हैं.

वह घुरघुराते हुए इतिहास में दर्ज हो रहे हैं तो असंतुष्ट महज़ टिप्पणीकार बनकर रह गए हैं, राजनीति के खेल में बस एक फुटनोट.

'आप' का दुख यह है कि इसने राजनीति के छोटेपन को स्वीकार कर लिया है.

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यादव और भूषण अभी तो सुर्खियों में हैं लेकिन तार्किक बात यह है कि अगर वह नई राजनीति ईजाद नहीं कर पाते तो धुंधलके में खो जाएंगे. यह दूर की कौड़ी लगती है क्योंकि 'आप' अगले चरण में प्रवेश कर रही है.

हमें यह समझना होगा कि इसमें दुख और अनिवार्यता दोनों है.

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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