बुद्धिमत्ता के घमंड से हुआ आप में विद्रोह?

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चेक गणराज्य में साम्यवादी शासन के ख़िलाफ़ वेलवेट क्रांति के बाद बनने वाले पहले राष्ट्रपति वकलाव हावेल ने लिखा था कि राजनीति में ज़्यादा बुद्धिजीवी होने चाहिए.

इस पूर्व असंतुष्ट नाटककार ने लिखा, "नेताओं को तो चुना ही जाना चाहिए. लेकिन लोग उन्हें वोट देते हैं जो उनकी तरह ही सोचते हैं."

वो तर्क देते थे कि एक नेता को "अलोकप्रिय होने के बावजूद लोगों को अपने विचारों से जीतना चाहिए."

"राजनीति लोगों को यह यकीन दिलाने वाली होनी चाहिए कि नेता कुछ चीज़ें उनसे बेहतर जानता है या कर सकता है. और यही वजह है कि उसके लिए वोट देना चाहिए."

'आंदोलन का सपना'

मुझे पता नहीं कि भारत की भ्रष्टाचार विरोधी पार्टी 'आप' के नेता हावेल की बात से सहमत होंगे या नहीं.

लेकिन कई विश्लेषक मानते हैं कि सोमवार की रात पार्टी के संस्थापक सदस्यों योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण समेत चार वरिष्ठ नेताओं को निकालने को 'बुद्धिजीवी राजनीति' और पार्टी में असहमति को दरकिनार करने के रूप में देखा जा सकता है.

यह वही पार्टी है जो भ्रष्टाचार विरोध और सबको मिलाकर चलने वाली राजनीति के नारे के साथ दिल्ली में सत्ता में आई थी.

योगेंद्र यादव एक जाने-माने सेफ़ोलॉजिस्ट और राजनीति विज्ञानी हैं, जबकि प्रशांत भूषण प्रतिष्ठित वकील हैं. आनंद कुमार एक समाजशास्त्री हैं.

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उन्हें लगता है कि केजरीवाल के इर्द-गिर्द व्यक्ति पूजा का चलन विकसित हो गया है. प्रशांत भूषण कहते हैं, "आंदोलन के सपने को एक छोटी सी मंडली और तानाशाह ने चूर-चूर कर दिया है."

दूसरी ओर विश्लेषक एजाज़ अशरफ़ को लगता है कि आप में विद्रोह की एक वजह विद्रोहियों का "बुद्धिमत्ता का घमंड और अपनी उच्च श्रेणी से पैदा अधिकार का भाव भी था."

वह कहते हैं कि यह इत्तेफ़ाक नहीं है कि विद्रोहियों में से तीन-चौथाई शिक्षण से जुड़े हुए हैं.

दिल्ली से काम करने वाले अर्थशास्त्री और पार्टी समर्थक अरुण कुमार दुख जताते हैं, "जिस बौद्धिक माहौल और लोकतांत्रिक संस्कृति में पार्टी का गठन हुआ था वह धीरे-धीरे नष्ट हो रही है. ऐसा लगता है कि वास्तविक बुद्धिजीवी अरविंद केजरीवाल में असुरक्षा का भाव पैदा कर रहे हैं."

आप की त्रासदी

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अब इस बात का फ़ैसला लोगों को करना है कि बुद्धिजीवी अच्छे राजनेता बनते हैं या नहीं.

नॉटर डेम विश्वविद्यालय में दर्शन शास्त्र के प्रोफ़ेसर गैरी गटिंग ने लिखा है, "अच्छे राजनेताओं का बुद्धिजीवी होना ज़रूरी नहीं है, लेकिन बौद्धिक चीज़ों से उनका सरोकार होना चाहिए."

भारत में उच्च कोटि के बुद्धिजीवी नेताओं का लंबा इतिहास हैः जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस, राम मनोहर लोहिया, सी राजगोपालचारी.

लेकिन समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन कहते हैं कि भारत और इसकी राजनीति सालों से 'गैर-बुद्धिमत्तापूर्ण' हो गई है.

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वह कहते हैं, "हमारे पास विशेषज्ञ हैं और हमारे पास नीति-निर्माता हैं. लेकिन एक अपवाद (समाजशास्त्री अशीष नंदी) के अलावा हमारे पास कोई लोक बुद्धिजीवी (पब्लिक इंटलेक्चुअल) नहीं बचा है. भारत में अब वास्तविक बौद्धिक असहमति नहीं बची है."

उनके अनुसार आपराधिक रिकॉर्ड के साथ चुने गए नेताओं ने राजनीति को और भ्रष्ट कर दिया है.

वह कहते हैं 'आप' के साथ जो हुआ वह "राजनीति का तुच्छ हो जाना" है.

जिस पार्टी ने इतने कुछ करने का वायदा किया था और विविध विचारों को शामिल करने की बात कही थी उसे अलग विचार वाले अपने सबसे अच्छे लोगों को बाहर करना पड़ा. यह सचमुच त्रासद है.

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