क्या बदल पाएगी गांधी की खादी?

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जब 1920 के दशक में भारत में हाथ से बने खादी वस्त्रों की शुरुआत हुई तो यह केवल एक ढर्रा नहीं था, यह एक विचारधारा के रूप में सामने आया था.

इसके सबसे बड़े प्रशंसक महात्मा गांधी थे और सूती भारत की आत्मनिर्भरता, ब्रितानी कंपनियों द्वारा बेचे जाने वाले कपड़ों से आज़ादी का प्रतीक बन गया था.

आज भी यह अधिकांश राजनेताओं की पहली पसंद है, लेकिन क्या इसे और फ़ैशनेबल बनाने की कोशिशें, इसे और लोकप्रिय बना पाएगा?

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भारतीय मौसम के लिए यह सबसे दुरुस्त पहनावा है, जो आपको पसीने और गर्मी से राहत देता है.

खादी पहनने वालों की संख्या बहुत कम है, लेकिन जो थोड़े लोग इसे पंसद करते हैं, वो इसके पक्के प्रशंसक होते हैं.

अक्सर अपने ट्रेडमार्क मोदी जैकेट में दिखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह जैकेट भी सूती का बना होता है.

मोदी ने हाल ही में भारत की यात्रा पर आए चीनी राषट्रपति शी जिनपिंग को भी खादी पहनने का सुझाव दिया था.

सूती वस्त्र बनाने का काम बहुत मेहनत का होता है. दिल्ली के सटे इलाक़ों में खादी के धागे बनाने का काम होता है.

भारत के खादी उद्योग के मुताबिक़, “पूरे देश में इस उद्योग में 10 लाख से ज़्यादा लोग लगे हुए हैं.”

इस उद्योग को आधुनिक बनाया जा सकता था लेकिन इसे लेकर बहुत सारे लोग समहत नहीं.

आधुनिक लुक

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Image caption खादी को लेकर फ़ैशन डिज़ाइनरों का भी रुझान बढ़ा है.

खादी ग्राम उद्योग आयोग से जुड़े अनिल कुमार कहते हैं, “दुविधा इस बात की है कि क्या खादी उत्पादन में अत्याधुनिक मशीनों का इस्तेमाल हो या नहीं. हम समझते हैं कि खादी की खास पहचान को बनाए रखने के लिए इसे हाथ से ही किया जाना चाहिए.”

खादी को लोकप्रिय बनाने में महात्मा गांधी का बहुत बड़ा योगदान रहा है. लेकिन तबसे लेकर अबतक खादी बनाने की प्रक्रिया में बहुत कम ही बदलाव हुआ है.

हालांकि अब इसे गुजरे जमाने के फ़ैशन के रूप में देखा जाता है लेकिन भारतीय फ़ैशन उद्योग इसे थोड़ा आधुनिक लुक देने की कोशिश कर रही है.

इसीलिए हाल के दिनों में देश के शीर्ष फ़ैशन डिज़ाइनर खादी वस्त्रों को आकर्षक बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

फ़ैशनल डिज़ाइन काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने हाल ही में खादी का एक फ़ैशन शो आयोजित किया.

लोकप्रियता

फ़ैशनल डिज़ाइनर राजेश प्रताप सिंह अपने बेहतरीन डिज़ाइन के लिए जाने जाते हैं. उनके पास खादी वस्त्रों का एक बड़ा कलेक्शन है.

उन्होंने डेनिम में सूती वस्त्रों को मिलाने का भी प्रयोग किया है.

राजेश प्रताप सिंह कहते हैं, “डिज़ाइनर्स को खादी के लोकप्रियता और इसकी विशेषता पर ध्यान देना चाहिए. गुणवत्ता में थोड़ा बदलाव करिए और इसे कुछ नए तरीक़े से पेश करिए.”

'हिस्सेदारी बढ़ाने की ज़रूरत'

Image caption फ़ैशन डिज़ाइन काउंसिल ऑफ़ इंडिया के सुनील सेठी खादी को बढ़ावा देने की ज़रूरत पर जोर देते हैं.

चूंकि खादी की मांग अभी बहुत कम है इसलिए विशेषज्ञ इसे प्रमोट करने के लिहाज से बहुत सही समय मानते हैं.

फैशन डिज़ाइन काउंसिल ऑफ़ इंडिया के सुनील सेठी का कहना है, “यह बहुत ज़्यादा संभावना वाला बाज़ार है, खादी के कपड़े सस्ते हैं. भारतीय डिज़ाइनर जनता के साथ काम करना चाहते हैं, न कि कुछ खास लोगों के लिए. इस समय भारतीय कपड़ा बाज़ार में इसकी महज एक या दो फ़ीसदी हिस्सेदारी है.”

यह अभी भी एक सवाल है कि खादी की छवि को बदलने की ये कोशिशें क्या वाक़ई कोई बदलाव ला सकेंगी.

हालांकि, इसकी व्यापक लोकप्रियता में समय लग सकता है लेकिन ख़ादी में बदलाव इससे जुड़े लाखों कारीगरों की ज़िंदगी को बदल सकता है.

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