बिहार, 5 कारण जिसके कारण हुई मौतें

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Image caption कटिहार ज़िले में तूफ़ान के कारण हुआ नुकसान

बिहार में बीते मंगलवार रात आए तूफ़ान में मरने वालों की संख्या 60 के पार पहुंच चुकी है. केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह दूसरे केंद्रीय मंत्रियों के साथ शुक्रवार को प्रभावित इलाके का हवाई सर्वेक्षण करेंगे.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी उनके साथ रहेंगे.

बिहारी सांसदों ने मंगलवार की तबाही को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग की है.

पढ़िए वो 5 बातें जिनके कारण लगभग डेढ़ घंटे के अंदर ही बिहार के दस से अधिक ज़िले बुरी तरह प्रभावित हुए और 60 से अधिक लोगों की मौत हुई.

अलर्ट पर नहीं चेती सरकार!

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तूफ़ान के बाद से ही सरकार का यह कहना रहा है कि उसे इस आपदा के बारे में कोई पूर्व सूचना नहीं थी. लेकिन पटना स्थित भारतीय मौसम विज्ञान विभाग का कहना है कि उसने शुरुआती अलर्ट जारी किए थे.

केंद्र के निदेशक आशीष कुमार सेन कहते हैं, ‘‘हमने दरभंगा के ऊपर तूफ़ान दिखाई देते ही वहां के लिए अलर्ट जारी किया था.’’

आशीष के मुताबिक मंगलवार क़रीब सात बजे तूफ़ान संबंधी ‘नाऊकास्टिंग’ यानी की एक तरह का अलर्ट वेबसाइट पर जारी कर दिया गया था. और ऐसे में आपदा प्रबंधन विभाग को इस वेबसाइट से सूचना लेकर सभी मुमकिन तैयारियां करनी चाहिए थीं.

जबकि दूसरी ओर विभाग के प्रधान सचिव व्यासजी के अनुसार विभाग को इस तरह का कोई अलर्ट नहीं आया था.

ताल-मेल नहीं

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जानकारों का मानना है कि तूफ़ान की पूर्व चेतावनी नहीं दे पाना सरकारी एजेंसियों की नाक़ामयाबी और उनके बीच ताल-मेल की कमी की ओर साफ़ इशारा करता है.

पर्यावरणविद् दिनेश कुमार मिश्रा कहते हैं, ‘‘पटना में यह सूचना अगर मिलती है कि कहीं ख़तरा होने वाला है तो यह सूचना संबंधित क्षेत्र तक पहुंचाई जानी चाहिए थी.’’

दिनेश के मुताबिक हर ज़िले में मौजूद जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकार इसमें सहायक हो सकते थे.

रडार की पहुंच से दूर इलाक़े

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पटना स्थित भारतीय मौसम विज्ञान केंद्र के रडार का रेंज 200 किलोमीटर है. ऐसे में बिहार के कोसी और सीमांचल के इलाक़े रडार की पहुंच से दूर है.

जानकारों के अनुसार यह बहुत चिंता की बात है कि जिस कोसी और सीमांचल के इलाके में सबसे अधिक आपदाएं आती हैं वही रडार की पहुंच से बाहर है.

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में एक और रडार लगाने की योजना पर काम चल रहा है जो 2017 से काम करने लगेगा.

कोसी और सीमांचल के इलाके इस रडार की पहुंच में रहेंगे.

तबाही मचाने वाले बादल

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जानकारों के मुताबिक अप्रैल-मई के महीने में पछुआ और पुरबिया हवा ज़मीन पर टकराने से बादल बनते हैं. ऐसा ख़ासकर बिहार के कोसी और सीमांचल इलाक़े में होता है.

ऐसे बादल बनने में दो से तीन घंटे का समय लगता है. इस ख़ास तरह के बादल में गरज होती है और इसमें पैदा हुई उर्जा बहुत तबाही मचाने वाली होती है. ये बादल छोटे-छोटे इलाकों में बनते हैं और इनका अनुमान लगाना बहुत मुश्किल भी होता है.

ऐसे बादलों का ‘बेस’ जब 300 मीटर से भी नीचे पहुंच जाता है तो ये कम समय में एक छोटे से क्षेत्र में बहुत तबाही मचाते हैं. पूर्णिया और इसके आस-पास के इलाकों में ऐसे ही बादलों ने तबाही मचाई.

जागरुकता नहीं

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Image caption खेत में खड़ी मक्के की फ़सल तूफ़ान की चपेट में आकर तबाह हो गई.

ऐसे बादल क़रीब 15 मिनट के अंदर ही तबाही मचाकर शांत हो जाते हैं. ऐसे में तूफ़ान की आशंकाओं वाले इलाकों में इतनी जागरुकता होनी चाहिए कि लोग ऐसे बादलों को भांपकर इस दौरान किसी सुरक्षित जगह की शरण लें.

हरेक इलाके में, ख़ासकर गांवों में ऐसे सुरक्षित शरणस्थल बनाए जाने चाहिए.

प्रभावित क्षेत्रों में जागरुकता और ऐसे शरणस्थलियों की कमी के कारण भी इतने बड़े पैमाने पर लोग हताहत हुए.

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