साड़ी जो दो साल में तैयार होती है...

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Image caption रिमझिम पारंपरिक भारतीय पहनावे को नया आउटलुक देने के लिए काम कर रही हैं.

क्या एक पारंपरिक भारतीय साड़ी को तैयार करने में दो साल का वक़्त लग सकता है?

ये लिबास भारत में महिलाओं के बीच सबसे लोकप्रिय पहनावा रहा है और लगभग पूरे भारत में छोटी-बड़ी दुकानों से इसे खरीदा जा सकता है.

लेकिन दिल्ली की डिजाइनर रिमझिम डाडु को अपनी सिलिकन जामदानी साड़ी तैयार करने में तकरीबन दो साल का समय लग गया.

ये भारत के पारंपरिक पहनावों को फिर से लोकप्रिय बनाने की उनकी कोशिश का हिस्सा है. पूर्वी भारत और बांग्लादेश के बुनकर जामदानी साड़ी तैयार करते रहे हैं.

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Image caption जामदानी साड़ी के लिए सिलिकन शीट से अच्छी क्वालिटी के धागे निकाले जाते हैं.

कहा जाता है कि हाथ से तैयार की जाने वाली जामदानी साड़ी को बनाने में कड़ी मेहनत और बहुत ज़्यादा समय लगता है.

साड़ी तैयार करने के दौरान करघे पर ख़ास तरह की डिजाइन उकेरी जाती हैं जो अमूमन भूरे और सफेद रंग में होती हैं.

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लेकिन डाडु इसके लिए सिलिकन शीट का इस्तेमाल करती हैं जिनसे वो अच्छी क्वालिटी के धागे तैयार करके जामदानी साड़ी बनाती हैं.

वह कहती हैं, "सिलिकन एक बेहद नाजुक और लचीली चीज होती है. मैंने अच्छी क्वालिटी के धागों के लिए सिलिकन की लंबी शीट ली थी."

उम्दा कारीगरी

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Image caption जामदानी साड़ी पूरी तरह से हाथ से तैयार की जाती है.

रिमझिम की ये जामदानी साड़ी दिल्ली में चल रही 'फ़्रैक्चरः इंडियन टेक्सटाइल्स, न्यू कन्वरसेशन' नाम की एक प्रदर्शनी में शामिल की गई है.

प्रदर्शनी का मक़सद भारतीय हथकरघा उत्पादों को दुनिया भर के शौकीनों के लिए पेश करना है.

भारतीय पहनावों को उनकी बारीक़ी और उम्दा कारीगरी के लिए दुनिया भर में पसंद किया जाता है.

प्रदर्शनी के आयोजकों का कहना है कि पारंपरिक भारतीय परिधानों की कोई तुलना ही नहीं हो सकती, क्योंकि ख़ूबसूरती और तकनीक के मामले में उनमें असाधारण विविधता है.

नई नज़र

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Image caption ये साड़ी पूरे दो साल की मेहनत के बाद तैयार की गई है.

ये साड़ियां कई तरह की कलाओं, डिजाइनों और तैयार करने के तौर-तरीकों पर रोशनी डालती हैं.

लेकिन सवाल उठता है कि इन्हें फिर से चलन में लाए जाने की ज़रूरत क्या है?

रिमझिम कहती हैं कि भारत में पहनावों की एक समृद्ध परंपरा रही है, लेकिन यही वक़्त है जब उन्हें नई नज़र से देखे जाने की ज़रूरत है.

उन्होंने बताया, "यह प्रदर्शनी हमारी अपनी ही संभावनाओं को नए सिरे से तलाशती हैं और उनकी सरहदों की ओर ले जाती हैं. हम कोशिश कर रहे हैं कि हम अपनी विरासत के साथ और क्या कर सकते हैं."

बड़े ब्रांड्स

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Image caption राहुल जैन की पारंपरिक बनारसी ब्रोकेड.

इस प्रदर्शनी के क्यूरेटर मयंक मानसिंह कौल रिमझिम से सहमत हैं.

वह कहते हैं, "भारतीय पहनावों को लेकर गज़ब का नॉस्टालजिया है. लेकिन हमें ये देखने की ज़रूरत है कि इन पारंपरिक चीज़ों से हमारा सिलसिला कहां टूट रहा है."

मयंक बताते हैं, "हम दुनिया को ये बताना चाहते हैं कि भारत बड़े ब्रांड्स के लिए उत्पादन का केंद्र ही नहीं है बल्कि अपनी चीज़ों के साथ उभर सकता है और सारी दुनिया के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकता है."

इस प्रदर्शनी में भाग ले रही स्वाति कलसी कई सालों से सुजनी कला पर काम कर रही हैं. बिहार में सुजनी बेहद लोकप्रिय मानी जाती है.

सुजनी आर्ट

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Image caption डिजाइनर स्वाति ने सुजनी आर्ट को नया आउटलुक दिया है.

सुजनी पुराने कपड़ों को कई परतों में बिछाने के बाद सिलकर तैयार की जाती है. प्रदर्शनी में स्वाति पारंपरिक सुजनी को पेश कर रही हैं.

इसी साल के आख़िर में लंदन के 'विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम' में 'फ़्रैब्रिक ऑफ़ इंडिया' नाम से आयोजित होने वाली दो प्रदर्शनियों में इन दो डिज़ाइनरों के काम को पेश किया जाएगा.

मनीष अरोड़ा और राजेश प्रताप सिंह जैसे डिज़ाइनर और राहुल मिश्र, अनीत अरोड़ा और रिमझिम डाडु जैसी उभरती प्रतिभाएं लंदन की इस प्रदर्शनी का हिस्सा बनने जा रही हैं.

मॉडर्न आउटलुक

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Image caption पटोला ड्रेस

लंदन की प्रदर्शनी की क्यूरेटर दिव्या पटेल कहती हैं, "अगर आप आज़ादी के बाद के दौर को देखें तो पुपुल जयकर और मुल्कराज आनंद भी नए शहरी बाज़ारों के लिए भारतीय पहनावे को नया आउटलुक दिए जाने की बात कर रहे थे."

दिव्या कहती हैं, "आज के डिजाइनरों का काम भी यकीनन बेहद महत्वपूर्ण है. रिमझिम और दूसरे डिजाइनर भारतीय पहनावों को नया नज़रिया दे रहे हैं."

वे बताती हैं कि इन पहनावों का मॉडर्न आउटलुक पुरानी तकनीक से नई चीज़ें तैयार करने पर ज़ोर देता है.

वह कहती हैं, "ये हमें यह सोचने पर भी ज़ोर देते हैं कि चमड़े जैसी लोकप्रिय चीज़ों का नए तरीके से और क्या इस्तेमाल हो सकता है जबकि हम पटोला साड़ियों का मर्सिया पढ़ रहे हैं."

बुनकरों का सवाल

Image caption बनारस के बुनकर

दिव्या पटेल इस बात से सहमत हैं कि भारतीय डिजाइनर दुनिया भर में इन इवेंट्स के जरिए मशहूर हो रहे हैं. लेकिन इन सबके बीच बुनकर कहां खड़े हैं.

हालाँकि पहनावों के इस प्रयोग में केवल डिजाइनर ही नहीं लगे हैं. कई कलाकार और डिजाइनर दूर-दराज की जगहों पर जाकर बुनकरों के साथ काम कर रहे हैं.

रिमझिम और दिव्या को उम्मीद है कि इन कोशिशों से ज़मीनी स्तर पर काम करने वालों को मदद मिलेगी.

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