सरहद ने जिनके खेतों में बोई है समस्याएँ..

पंजाब, भारत पाकिस्तान सीमा पर बाड़ के पार किसान इमेज कॉपीरइट RAVINDER SINGH ROBIN

सीमा पर किसानों की ज़िंदगी आसान नहीं होती ख़ासकर उनकी, जिनके खेत पाकिस्तान के साथ लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा पर हैं और उन्हें वहां तक पहुंचने के लिए सीमा पर लगी बाड़ पार करनी पड़ती है.

नब्बे के दशक की शुरुआत में पाकिस्तान से घुसपैठ रोकने के लिए सीमा पर बाड़ लगाई गई थी.

लेकिन कभी अपने खेतों को आज़ादी से जोतने वाले किसानों को अपने खेतों तक जाने के लए भारी भरकम औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती हैं.

सिर्फ़ यही नहीं, ये किसान सिर्फ़ कम ऊंचाई वाली फ़सलें ही उगा सकते हैं ताकि सीमा सुरक्षा बल के जवानों को दूर तक दिखाई देने में कोई समस्या न हो.

आते-जाते तलाशी

सीमा के कुछ गांवों- दाओके, नौशेरा ढल्ला, चिन्ना बिधि चांद, हवेलिना, कक्कड़ की तो 2,000 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन बाड़ के उस पार है.

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तरसेम सिंह की 10 एकड़ ज़मीन बाड़ के पार है, वे अफ़सोस के साथ कहते हैं कि बाड़ के पार खेत में काम करने को लेकर समय की पाबंदी है, जिसके चलते वह फ़सल की पूरी देख-रेख नहीं कर पाते और वह उतनी अच्छी नहीं हो पाती.

बाड़ के बाहर जाने वाले किसानों को अपने साथ ही अपने सहायता कर्मियों के पहचान पत्र भी साथ ले जाने पड़ते हैं. यह पहचान पत्र बीएसएफ़ जारी करता है जिसने किसानों के बाड़ के पार जाने का समय निश्चित किया हुआ है.

बाड़ के आर-पार जाते हुए दोनों समय उनकी अच्छी तरह तलाशी ली जाती है. ट्रैक्टर समेत उनके खेती के उपकरणों की अच्छी तरह जांच की जाती है.

बीएसफ़ के जवान न सिर्फ़ सीमा के उस पार से किसी आशंकित ख़तरे से उनकी रक्षा करते हैं बल्कि खेती के दौरान उनकी हर गतिविधि पर नज़र रखते हैं.

विभाजन न होता तो

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किसानों को अपना खाना साथ ही ले जाना पड़ता है क्योंकि उन्हें खाना खाने के लिए वापस आने की अनुमति नहीं होती.

जैसे ही सूर्यास्त होता है प्रशासन बाड़ के 500 मीटर के दायरे में कर्फ़्यू लागू कर देता है और किसी को बाड़ के नज़दीक जाने की भी इजाज़त नहीं होती.

भारत-पाकिस्तान की 553 किलोमीटर लंबी सीमा पर सिर्फ़ पंजाब में ही 300 गेट हैं.

हरदेव सिंह, जिनकी बाड़ के पार 20 एकड़ ज़मीन है, कहते हैं कि इन प्रतिबंधों के चलते फ़सल इतनी कम होती है कि उससे रोज़मर्रा के ख़र्चे पूरे कर पाना भी असंभव होता है.

समय सीमा के कारण वह साल में तीन के बजाय सिर्फ़ एक ही फ़सल पैदा कर पाते हैं.

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वह कहते हैं, "भारत की सीमा के अंदर जिस किसान के पास पांच एकड़ ज़मीन है वह भी मुझसे अच्छी स्थिति में है."

बताया गया कि बाड़ के पार ज़मीन की कीमत 50,000 से तीन लाख रुपये प्रति एकड़ है जबकि भारतीय सीमा के अंदर ज़मीन की कीमत 15 लाख प्रति एकड़ से शुरू होती है.

इन लोगों का मानना है कि अगर 1947 में भारत-पाकिस्तान का विभाजन नहीं हुआ होता तो उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी होती लेकिन भावनात्मक लगाव के चलते वह इस ज़मीन को बेचना भी नहीं चाहते.

सुरक्षा से समझौता नहीं

वाजपेयी सरकार के दौरान जिन किसानों की ज़मीन बाड़ के पार होती थी उन्हें 2,500 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवज़ा दिया जाता था लेकिन यह योजना बहुत लंबी नहीं चली. लेकिन ये किसान 10,000 रुपये प्रति एकड़ असुविधा मुआवज़े की मांग कर रहे हैं.

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तरसेम सिंह कहते हैं कि जुताई के समय उन्हें भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है क्योंकि उन्हें तड़के ही खेतों पर पहुंचना होता है.

बीएसएफ़ के महानिरीक्षक, फ़्रंटियर, अनिल पालीवाल कहते हैं कि जुताई के मौसम में बीएसएफ़ किसानों के प्रति लोचशील रवैया अपनाता है और उनकी ज़रूरत के मुताबिक उन्हें बाड़ पार करने की अनुमति दी जाती है.

हालांकि उन्होंने कहा कि बीएसएफ़ सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करता और इसके लिए सैनिकों की संख्या बढ़ाई गई है.

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