मेक इन इंडियाः कितनी हक़ीक़त, कितना फ़साना

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नरेंद्र मोदी भारत के शायद पहले प्रधानमंत्री हैं जो एक बेहतरीन सेल्समैन हैं.

वो इन दिनों, देश के भीतर या बाहर जहाँ भी जाते हैं, कहते हैं, “आइए, भारत में बनाइए और पूरी दुनिया में बेचिए. मेक इन इंडिया.”

भारत की माली हालत

जीडीपी- लगभग 2000 अरब डॉलर

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एशिया में अर्थव्यवस्था का स्थान

  • 195 अरब डॉलर पिछले 5 साल में विदेशी निवेश

  • 57% अर्थव्यवस्था में सर्विस सेक्टर की भागीदारी

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प्रधानमंत्री मोदी के इस विशेष अभियान का मक़सद भारत को चीन की तरह मैन्युफ़ैक्चरिंग हब बनाना है.

'मेक इन इंडिया' से चीन की होड़

लाल फ़ीताशाही और भ्रष्टाचार की वजह से भारत दुनिया भर में निवेश करने वालों के लिए पसंदीदा देशों की सूची में काफ़ी नीचे है.

मोदी के अभियान की वजह से इतना तो ज़रूर हुआ है कि देसी-विदेशी कारोबारियों की दिलचस्पी 'मेक इन इंडिया' में पैदा हुई है . वे जानना चाहते हैं कि नई कोशिश के तहत सचमुच कुछ करने की गुंजाइश कितनी है.

निवेशकों को 'फील गुड'

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भारत के उद्योगपतियों और कारोबारियों के प्रमुख संगठन फिक्की के प्रमुख दीदार सिंह कहते हैं कि प्रधानमंत्री के शब्द निवेशकों के कान में मिसरी घोल रहे हैं.

दीदार के मुताबिक़, “भारत में घरेलू बाज़ार में माँग है, देश में लोकतंत्र है और काम करने लायक़ बहुत बड़ी युवा आबादी है.”

विदेशी निवेश और विकास दर में लगातार गिरावट के दौर में विकास और बेहतर शासन के वादे के साथ मोदी भारी बहुमत से सत्ता में आए हैं.

और 'मेक इन इंडिया' के अलावा वो बड़े ज़ोर-शोर से ' डिज़िटल इंडिया' और 'स्किल्ड इंडिया' की बात कर रहे हैं. आगे चलकर ये तीनों अभियान एक दूसरे से जुड़कर चलेंगे.

'मेक इन इंडिया' का काम आगे बढ़ाने के लिए 25 ऐसे क्षेत्र चुने गए हैं, जिनमें बेहतर प्रदर्शन की संभावना है.

इनमें ऊर्जा, ऑटोमोबाइल, कंस्ट्रक्शन और फ़ार्मा जैसे क्षेत्र शामिल हैं.

आशंकाएँ और चुनौतियाँ

मेक इन इंडिया

मक़सद: भारत को मैन्युफ़ैक्चरिंग हब बनाना

25%

मैन्युफ़ैक्चरिंग का हिस्सा 15% से बढ़ाना

  • 25 चुनिंदा सेक्टरों पर ख़ास ध्यान

  • फ़ोकस निर्यात पर होगा

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लोग सबसे पहले तो यही समझना चाहते हैं कि 'मेक इन इंडिया' में प्रचार और विज्ञापन कितना है, और असली काम कितना होगा?

भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर डॉ. रघुराम राजन खुलकर सरकार को अगाह कर चुके हैं कि सिर्फ़ मैन्युफ़ैक्चरिंग पर ध्यान देने से बात नहीं बनेगी.

'मेक इन इंडिया' के आगे 5 चुनौतियां

Image caption भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन.

उनका मानना है कि 'मेक इन इंडिया' की निर्भरता निर्यात पर होगी, जबकि दुनिया भर में माँग में कमी की वजह से निर्यात घटा है.

अर्थशास्त्री मिहिर शर्मा कहते हैं कि 'मेक इन इंडिया' की सबसे बड़ी चुनौती कुशल कामगारों की कमी है.

उनका मानना है कि भारत में इंस्पेक्टर राज ख़त्म नहीं हुआ है और यह निवेशकों को चिंतित करता है.

भूमि अधिग्रहण की चुनौती

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औद्योगिक विकास के लिए ज़मीन चाहिए और भारत में ज़मीन का अधिग्रहण एक बड़ा मुद्दा है जिसका विरोध किसान और आदिवासी पुरज़ोर तरीक़े से कर रहे हैं.

इस समस्या का हल निकालना मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी.

इंडस्ट्रियल कॉरिडोर

5

औद्योगिक गलियारे बनेंगे

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औद्योगिक शहर गलियारे का हिस्सा

  • 5 शहरों में काम शुरू

  • दिल्ली-मुंबई गलियारा पहले फेज़ में

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'मेक इन इंडिया' के कर्ताधर्ता अमिताभ कंठ कहते हैं कि सरकार लाल फ़ीताशाही को ख़त्म करने और निवेशकों को सिंगल विंडो क्लियरेंस देने की दिशा में लगातार काम कर रही है, 'डिज़िटल इंडिया' और 'स्किल्ड इंडिया' की वजह से मौजूदा समस्याएँ दूर हो सकेंगी.

भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की नज़र इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर है, जिसमें संभावनाएँ और चुनौतियाँ दोनों एक जैसी बड़ी हैं.

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