'मेक इन इंडिया' या इंडिया का मेक-अप

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अतीत की डाल पर बैठी 'सोने की चिड़िया' को भविष्य का 'दहाड़ता शेर' बनाने की कोशिशों में सबसे बड़ी है 'मेक इन इंडिया' मुहिम.

'मेक इन इंडिया' का शेर 'अंधों का हाथी' न बन जाए कि उसका ओर-छोर ही समझ में न आए, ऐसा 'डिजिटल इंडिया' में क़तई नहीं होना चाहिए.

सरकारी प्रचार अभियान के घटाटोप से आगे जाकर, निष्पक्ष जानकारों की मदद लेकर, आंकड़ों की परतें उधेड़कर ही 'मेक इन इंडिया' को उसके मेक-अप से परे समझा जा सकता है.

'मेक इन इंडिया' को समझकर ही जाना जा सकेगा कि मोदी सरकार कैसा इंडिया गढ़ना चाहती है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीधी-सरल भाषा में कहा था, "आइए, भारत में बनाइए और दुनिया भर में बेचिए."

इस मुहिम का मक़सद है भारत को औद्योगिक उत्पादन का प्रमुख केंद्र बनाना.

मगर इतनी बड़ी मुहिम सरल-सहज कब होती है? मोदी का ये मंसूबा भारत के कई सवालों का जवाब हो सकता है, लेकिन ख़ुद भी पचासों सवाल खड़े करता है, मसलन, औद्योगिक विकास के लिए ज़मीन कहाँ से आएगी? भ्रष्टाचार और लालफ़ीताशाही कहाँ ख़त्म होने वाली है? या तैयार माल कैसे और कहाँ बिकेगा? वग़ैरह-वग़ैरह...

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विशेष कवरेज 'बनेगा इंडिया?' में आपको मिलेगी पूरी जानकारी और समझदारी, 'मेक इन इंडिया' पर हिंदी में जानिए वो सब कुछ जो जानना-समझना ज़रूरी है.

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