रंगों की पेंसिल से चटक हुआ 'रंगभेद'?

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यह मई 2012 की बात है. मैं बंगलौर एयरपोर्ट में था जहां एक स्टॉल पर यात्रियों को मुफ़्त क्रेयोन (मोमी रंग) और रंग करने के काग़ज़ यह कह बांटे जा रहे थे- 'अपने बचपन को याद करें.' मैंने तुरंत इस निमंत्रण को स्वीकार किया.

बचपन को याद करना तो मज़ेदार था लेकिन मुझे यह अहसास भी हो रहा था कि जिस क्रेयोन को मैं इंसान के शरीर पर रंग करने के लिए इस्तेमाल कर रहा था वह मेरी त्वचा के रंग का नहीं था और न ही आस-पास किसी और की त्वचा जैसा.

लेकिन इस पर चिप्पी लगी हुई थी, 'स्किन'.

लेकिन यह अहसास होने के बाद भी मैंने उस 'स्किन' रंग के क्रेयोन का इस्तेमाल शरीर के बाकी अंगों पर करना बंद नहीं किया. ऐसा नहीं था कि उस पैकेट में कोई और रंग नहीं था- 'भूरा' क्रेयोन वहीं रखा था.

लेकिन किसी चीज़ ने मुझे उसे लेने से रोक दिया. मेरे दिमाग में कोई लगातार मुझे कहता रहा कि 'भूरा' क्रेयोन सही नहीं है. कि यह सही रंग नहीं है. यह त्वचा का उचित रंग नहीं है.

वहां से दिल्ली की यात्रा के दौरान मैं लगातार सोचता रहा कि मेरे साथ गड़बड़ क्या है.

असली दुश्मन

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रंगों की सियासत की उस उधेड़बुन ने जन्म दिया ब्राउन एन प्राउड (www.brownandproud.org) को.

यह उस विचार को चीख-चिल्लाकर कहने की कोशिश थी कि काला रंग भी ख़ूबसूरत है. हमारी चमड़ी काले रंग की है और वो सुंदर है.

हमने बहुत सारा समय रंगभेद की वजहों को ढूंढने और उनसे निपटने के तरीकों पर लगा दिया. लेकिन मार्च 2013 में एक स्टेशनरी की दुकान में यूंही जाने पर हमें इस पहेली के खोए हुए टुकड़े का पता चला. असली दुश्मन गोरेपन की वह क्रीम नहीं थी जिसे क्रिकेटर और अभिनेता बेच रहे थे.

असली दुश्मन बहुत कलाकारी के साथ मासूम से दिखने वाले क्रेयोन पैकेट के अंदर बैठा हुआ था, जिस पर चिप्पी चिपकी हुई थी, 'इसमें विशेष स्किन क्रेयोन भी है'.

असली दुश्मन 'स्किन' क्रेयोन था.

'बचपन की मासूमियत' एक भ्रम है. असली दुनिया में यह होती ही नहीं है.

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एक बच्चा बिना जाने कि वह क्या कर रहा है बहुत सक्रियता के साथ सामाजिक मूल्यों के साथ ही पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों को भी आत्मसात कर लेता है. किसी बच्चे को मोटा या काला होने के लिए चिढ़ाया जाना, सुना तो होगा ही.

जैसे गुलाबी कपड़े और नीली निक्कर हमें लैंगिक भूमिकाओं के बारे में बताते हैं वैसे ही 'स्किन' रंग के क्रेयोन हमें कहता है कि दरअसल हमारी चमड़ी का रंग ऐसा होना चाहिए- दूधिया गुलाबी. अगर आप इस रंग के नहीं हैं तो कुछ गड़बड़ है.

'इसे ख़त्म होना ही होगा'

अपने इस छुपे हुए दुश्मन के ख़िलाफ़ हमने एक ऑनलाइन याचिका डाली जिसके पक्ष में 3,000 हस्ताक्षर आए. एक निर्माता नवनीत एजुकेशन लिमिटेड को यह चिप्पी बदलने के लिए पिछले हफ़्ते ही मना पाए.

यह समझना बहुत आसान है कि रंगो को लेकर हमारी समझ हमारे नज़रिए को कैसे प्रभावित करती है. सांवला या काला बदसूरत है - गोरे और गुलाबी के मुताबिक - ये सोच हमारे समाज का सच है जिसे गिरिराज सिंह जैसे राजनेता ने सोनिया गांधी पर दिए अपने हालिया बयान से साबित कर दिया है.

वैसे ही बॉलीवुड में हो या फिर सफेद होने के क्रीम के विज्ञापन में या फिर सुंदर लड़की की परिभाषा में- इस रंग की राजनीति से निपटना जरूरी है.

यह पूरा अभियान, 'असली ख़ूबसूरती अंदर होती है, बाहर नहीं', जैसे पलायनवादी रवैए के साथ नहीं रुक सकता.

हमें 'चमड़ी का सही रंग' के भाव को ख़त्म करना ही होगा, चाहे जो हो. रंगो की पेंसिल से इस चिप्पी को हटवाने की हमारी लड़ाई केवल एक छोटी सी शुरूआत है.

(चिरायु जैन बंगलौर लॉ स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं)

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