विदेशी चंदा: क्या, कब, क्यों, कैसे?

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Image caption भारत ने फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन को भी वॉच लिस्ट में रखा है

भारत सरकार ने लगभग नौ हज़ार ऐसे ग़ैर सरकारी संगठनों का लाइसेंस रद्द कर दिया है जिन्होंने पिछले तीन वर्षों में अपने वार्षिक वित्तीय रिटर्न नहीं दाखिल किए.

इस पूरे मामले पर बीबीसी हिंदी ने बात की कंपनी सचिव ऐश्वर्य मोहन गहराना से, जो कॉर्पोरेट लॉ ब्लॉगर भी हैं.

क्या है वो क़ानून या नियम जिसके तहत ये कार्रवाई हुई है?

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गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 8975 संगठनों के विरुद्ध विदेशी चंदा (विनियम) अधिनियम (एफ़सीआरए) 2010 और उसके अधीन बने विदेशी चंदा (विनियम) नियम 2011 के अंतर्गत यह कार्रवाई की गई है.

क्या अब से पहले इतने बड़े पैमाने पर विदेशी चंदा लेने वाले संगठनों को इस नियम के तहत दंडित किया गया है?

नहीं, एक साथ इतनी बड़ी संख्या में संगठनों के विरुद्ध इस प्रकार की सख्त कार्रवाई नहीं की गई है.

कहां ग़लती?

विदेशी चंदा लेने से संबंधित नियम क़ानून क्या हैं, और इन संस्थाओं ने कहाँ ग़लती की?

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यह क़ानून मूलतः विदेशी चंदा और विदेशी खातिरदारी को नियंत्रित करता है. जिसमें चंदा और खातिरदारी स्वीकार करने संबंधी पात्रता और अनुमति संबंधी नियम बनाए गए हैं. कुछ विशेष सामाजिक कार्य में लगे हुए संगठन पंजीकरण के बाद चंदा ले सकते हैं.

यह क़ानून विदेशी चंदा लेने लेने के इच्छुक संगठनों को भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा पंजीकरण करने के बाद विदेशी चंदा लेने की अनुमति देता है.

पंजीकृत संगठनों को स्वीकार किए गए विदेशी चंदे का ब्यौरा प्रति वर्ष गृह मंत्रालय को देना होता है. अगर किसी वर्ष कोई विदेशी चंदा न लिया गया हो तो उस स्थिति में 'शून्य' रिपोर्ट देनी होती है.

बहुत के संगठन कई कारणों से विदेशी चंदे के बारे में यह वार्षिक ब्यौरा नहीं देते. जिनमें निष्क्रिय हो जाना, किसी वर्ष में चंदा न लिया जाना, क़ानूनी जानकारी का अभाव समेत अन्य कारण भी हो सकते हैं.

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वर्तमान मामले में इन संगठनों ने कई वर्षों (2009–10, 2010-11, 2011-12) का विदेशी चंदे की प्राप्ति का वार्षिक ब्यौरा भारत सरकार को नहीं भेजा था.

इसके बाद भारत सरकार ने 10343 संगठनों को कारण बताओ नोटिस दिया था. कारण बताओ नोटिस का उत्तर 15 नवंबर 2014 तक दिया जाना था.

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8975 संगठनों ने नोटिस का उत्तर नहीं दिया या समय पर नहीं दिया या उनको भेजे गए नोटिस वापस लौट आए. इस कारण गृह मंत्रालय भारत सरकार ने 6 अप्रैल 2015 के आदेश से उनके पंजीकरण को अपने यहाँ से रद्द कर दिया.

क्या हैं विकल्प?

अब इन संस्थाओं के पास क्या विकल्प हैं, क्या उन्हें जुर्माना भरना पड़ेगा, या नए सिरे से लाइसेंस लेना होगा, उनके कामकाज पर पूरी रोक होगी या वे अब भी सक्रिय रह सकते हैं?

गृह मंत्रालय ने अपने आदेश में इस क़ानून की धारा 14 के अंतर्गत कार्रवाई की है, लेकिन इस धारा में दिए गए विशेष कारणों में से किसी का सीधा उल्लेख नहीं किया है. प्रतीत होता है कि कार्रवाई धारा 14 की उपधारा (1) के बिंदु (डी) के अंतर्गत हुई है.

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यह संगठन अब किसी भी प्रकार का विदेशी चंदा स्वीकार नहीं कर पाएंगे. इस कार्रवाई के बाद इन संगठनों को अगले तीन वर्ष तक दोबारा पंजीकरण कराने कि अनुमति नहीं होगी.

कानूनन, यदि यह संगठन चाहें तो 60 दिन के भीतर अपने स्थानीय उच्च न्यायलय में अपील कर सकते हैं. साथ ही, यह संगठन भारत सरकार से पुनर्विचार की अपील भी कर सकते हैं.

इन संगठनों के कामकाज पर कोई रोक नहीं है. यह संगठन अपना कार्य पूर्ववत कर सकते है और स्थानीय चंदा भी ले सकते हैं. यह संगठन अब केवल विदेशी चंदा नहीं ले सकते.

क्या सरकार ने जिस तरह इस नियम पर अमल किया है उसे ज़रूरत से अधिक सख़्त कहा जा सकता है?

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कुछ हद तक, हाँ. क्योंकि इस क़ानून में सरकार के पास कार्रवाई के अन्य विकल्प उपलब्ध थे, इसलिए कार्रवाई को सख्त कहा जा सकता है, विशेष कर जिन संगठनों ने समय पर या देर सबेर उत्तर दिए.

लेकिन समय पर कारण बताओ नोटिस का उत्तर न देकर इन संगठनों ने अपनी समस्या को खुद भी बढाया है.

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