खुशनुमा यादों पर भारी तबाही का दर्द

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नेपाल में विनाशकारी भूकंप की वजह से पांच हज़ार से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है. इस त्रासदी की वजह से 10 हजार से ज्यादा लोग घायल हुए हैं.

ऐतिहासिक महत्व की कई इमारतों को काफी नुकसान हुआ है. देश के बड़े हिस्से में हर तरफ बर्बादी का मंज़र दिखाई देता है. नेपाल को दोबारा खड़ा करने के लिए भारत समेत कई देश आगे आए हैं. इस मुश्किल वक्त में हिंदी फिल्मों के दिग्गज भी नेपाल से अपने रिश्तों को याद कर रहे हैं. अमिताभ बच्चन भी इनमें शामिल हैं.

अमिताभ ने अपने ब्लॉग पर नेपाल के साथ पुरानी यादें साझा की हैं.

पढ़िए अमिताभ बच्चन का ब्लॉग

पहला दौरा

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मैंने 1954 में नेपाल का दौरा किया था. उस वक्त हम इलाहाबाद में रहते थे. हम परिवार के साथ पटना और फिर स्टीमर के जरिए मुज़फ्फरपुर गए. बाबूजी अपने करीबी समकालीन साहित्यकारों से मिलना चाहते थे.

उसके बाद हमने पटना एयरपोर्ट से नेपाल की राजधानी काठमांडू के लिए उड़ान भरी. ये मेरा विमान में बैठने का पहला अनुभव था और पहला विदेशी दौरा था. इसे लेकर जो उत्साह था, उसकी तुलना नहीं की जा सकती.

रास आया नेपाल

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साल 1954 में काठमांडू विकास के दौर से गुजर रहा था. एयरपोर्ट पर हवाई पट्टी तब तक मिट्टी की ही थी. मुझे याद है कि तब हमें बताया गया था कि काठमांडू में तब इकलौती पक्की सड़क भारतीय दूतावास से शाही महल तक थी.

राजपरिवार बाबूजी की कविताओं का प्रशंसक था. नेपाल के उस दौरे के दो पहलू अब तक मुझे याद हैं. चीन की पिंग पॉन्ग बॉल और बंद गले की जोधपुरी जैकेट. भारत का औपचारिक पहनावा. एक ऐसा शख्स जिसके पास कोई औपचारिक पहनावा ना हो, मेरे पास बामुश्किल एक जोड़ी पतलून और कमीज़ थी, ऐसे में इसे हासिल करना सबसे अहम था.

नेपाल में बाकी यादें अधिकारियों, राजनीतिकों और दूतावास के अहम लोगों के घर होने वाली कवि गोष्ठियों की है. उनमें से कुछ ऐसे लोग, जिन्होंने विद्रोह के दौरान जेल में वक्त बिताया था, अक्सर बातें करते थे कि जेल में रहते हुए मेरे पिता की रचनाओं ने उन्हें किस तरह प्रेरणा दी. मुझे शहर के बीचोबीच का बड़ा मैदान टुंडी खेल याद है.

रामरो लागो!

उस समय मैं जो नेपाली सीख पाया वो आज तक मुझे याद है. कान्कदो खायो ! काउस्तो लागो ? रामरो लागो रामरो लागो!!

क्या आपने खारा खाया. कैसा लगा ? अच्छा लगा. अच्छा लगा.

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और, मेरी फिल्म 'महान' , जिसमें मैने तीन किरदार निभाए थे, के एक सीन में मैंने इन शब्दों का इस्तेमाल उस किरदार में किया, जो मैने जीतन अमान के साथ निभाया था. उस सीन में महान अशोक कुमार भी हमारे साथ थे. मैंने सफेद सूट पहना था और लाल चश्मा लगाया था.

बाद मैंने 'खुदा गवाह' और 'महान' फिल्मों की शूटिंग के लिए नेपाल का दौरा किया. वो दौरे बहुत ही आनंददायक थे. तब नेपाल 1954 के दिनों से बिल्कुल अलग था. विकसित और अपनी आधुनिकता पर मुग्ध. साथ ही अपने इतिहास, परंपराओं और संस्कृति का संरक्षण करता हुआ. लोगों का प्यार, सत्कार, जिस दीवानगी के साथ वो हमें देखने आए और हमारी फिल्मों के लिए उनका लगाव देखने लायक था.

दर्द और निराशा

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अब ये देखना बड़ा दुखद है कि वो उत्कृष्ट पुरातात्विक अजूबे जिनके इर्दगिर्द हमने अपने सीन और गानों की शूटिंग की थी, हालिया त्रासदी की वजह से मलबे में तब्दील हो गए हैं. ये दर्दनाक और निराश करने वाला है.

मेरी प्रार्थनाएं उनके साथ हैं. मदद से भी मेरा सरोकार जुड़ा है. मैंने इसके लिए सहयोग किया है. किसी एक का सहयोग कभी काफी साबित नहीं हो सकता. इसके लिए सामूहिक प्रयास होना चाहिए. हर बूंद की अपनी कीमत है.

ईश्वर की कृपा

काठमांडू का पवित्र पशुपति नाथ मंदिर दैवीय शक्ति से सुरक्षित बच गया. ये एक नायाब घटना है. इस मंदिर का महान इतिहास है और मैं कई बार यहां गया हूं.

इसके बाहरी हिस्से में 'महान' के लिए शूटिंग की है. अंदर के हिस्से की शूटिंग की इजाज़त नहीं मिलती. और ईश्वर के अजूबे देखने के बाद कोई प्रकृति की कृपा को खारिज नहीं कर सकता.

उत्तराखंड और केदारनाथ क्षेत्र में बादल फटने और बाढ़ के वक्त पानी के प्रवाह में सब कुछ बह गया था लेकिन केदारनाथ मंदिर अछूता रहा. 'शूबाइट/ जॉनी वॉकर' की शूटिंग के लिए कन्याकुमारी के अपने दौरे के दौरान हम जिस गांव में काम कर रहे थे, वो सूनामी के दौरान वो पूरा बह गया था, उस वक्त अगर कुछ अक्षत था तो वो थी एक चर्च.

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