छोटे शहरों के आधे-अधूरे ख़्वाब

अरविंद अडिगा, लेखक इमेज कॉपीरइट PA

बुकर पुरस्कार विजेता अरविंद अडिगा के उपन्यास ‘द व्हाइट टाइगर’ में एक आधे-अधूरे शहर के बारे में बताया गया है.

वास्तव में उपन्यास के नायक के जन्मस्थान गया में ही पले-पढ़े होने के नाते मैं उनके विचारों की सच्चाई को पहचानता हूँ.

आधे-अधूरे शहर से मतलब ऐसी जगहों से है जिनमें बड़े शहरों जैसा इतिहास, नियोजन और भव्यता तो नहीं होती, लेकिन प्रदूषण, शोर और यातायात वैसा ही होता है.

ये आधे-अधूरे शहर, आधे-अधूरे आदमियों के लिए ही बने हैं.

पढ़ें, विस्तार से

इमेज कॉपीरइट nobel.org

इन आधे-अधूरे शहरों में मुझे महान लेखक वीएस नायपॉल के औपनिवेशिक उपनगरों के बारे में महसूस किए अनुभव भी हुए.

मैं गया में बड़ा हुआ और यहां के स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में मेरी पढ़ाई हुई.

मैं तब 25 साल का रहा होउंगा, जब मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली संस्करण में ‘स्टाफ रिपोर्टर’ की नौकरी के लिए शहर छोड़ दिया.

मैं तब लगभग 30 बरस का था जब मैं पहली बार विदेश गया.

आधे अधूरे शहर

जब मैं पीछे मुड़कर अपने शुरुआती 24 सालों को देखता हूँ- तो मैं पाता हूँ गया का आधा-अधूरा शहर, जिसके विचार और अरमान भी आधे-अधूरे ही हैं. मैं उन्हें पहचानता हूँ.

नायपॉल और अडिगा- या सलमान रुश्दी जैसे लेखकों ने- इन जगहों के बारे में जो मान्यताएं गढ़ी हैं, वो सच हैं.

लेकिन मैं कुछ दूसरी चीजों और लोगों को भी देखता हूँ.

मसलन, मैं इस आधे-अधूरे शहर के उपनगरीय इलाके में काम कर रहे एक हिंदी के दाढ़ीवाले लेखक शैवालजी को देखता हूँ.

वो भारतीय साहित्य और राजनीति के एक चतुर पाठक हैं, और उनकी लिखी कहानियों में से एक पर बॉम्बे में फ़िल्म भी बनी, जिसे पुरस्कार भी मिला.

क़िताबें

इमेज कॉपीरइट BBC World Service

मैं कलाम हैदरी को देखता हूँ जिनका निकाह संयोग से मेरी चाची के साथ हुआ था.

उन्होंने कई दशकों तक एक उर्दू साप्ताहिक पत्रिका का संपादन किया और फ्रांसिसी साहित्य और मार्क्सवाद के बारे में जो कुछ भी पढ़ा जाना चाहिए, पढ़ा.

मैं देखता हूँ कि अपनी आधी-अधूरी सोच के बावजूद वे पुश्किन, शेक्सपीयर, ग़ालिब या कालीदास का उदाहरण देते हैं.

1970 के दशक में गया में किताबों की सिर्फ़ दो दुकानें थीं.

इनमें से एक गया के रेलवे स्टेशन के मुख्य प्लेटफॉर्म पर लगी रेहड़ी थी, यहीं मुझे आरके नारायण की 'दि गाइड' मिली थी.

और दूसरी ‘साहित्य सदन’ थी जहां कोर्स की किताबें मिलती थी, हालाँकि इसमें विज्ञान और साहित्य की पुस्तकों का ऑर्डर भी दिया जा सकता था.

पुस्तकों के बिना...

दुकान के अंदर घुसकर किताबें देखने का पहला मौका मुझे 17-18 साल की उम्र में पटना में मिला.

वहाँ हिंदी और उर्दू किताबों के ढेर लगे थे, लेकिन डेल कार्नेगी और रॉबर्ट लडलम जैसे लेखकों की किताबों का वहां होना किसी आश्चर्य से कम नहीं था.

वहां आर्ची कॉमिक्स, अल्फ्रेड हिचकॉक और एनिड ब्लाइटन की किताबों की भरमार थी, और मैं मानता हूँ कि इनके बिना मेरा बचपन कैसा होता?

इसके अलावा वहां प्रेमचंद, शेक्सपीयर, हार्डी, टैगोर, ग़ालिब, डिकेन्स की भारी-भरकम किताबें भी थीं.

बाद में वहां आरके नारायण, रस्किन बॉन्ड, सलमान रुश्दी और अनिता देसाई की किताबें भी आनें लगीं.

इसके अलावा कुछ पुस्तकालय भी थे. मेरे दादाजी के पुस्तकालय में मुझे निकोलाई गोगोल की डेड सोल्स मिली.

कमी

मैं उस समय हाईस्कूल में था और मुझे गोगोल के बारे में कुछ भी पता नहीं था. उन दिनों इंटरनेट नहीं हुआ करता था.

टीवी था पर ट्रांसमिशन नहीं के बराबर था और टीवी पर वीसीआर के माध्यम से फ़िल्में देखी जाती थी.

लेकिन वहाँ गोगोल था और जब मैंने इसे पढ़ा तो बिल्कुल नई तरह का साहित्य पाया.

मुझे लगता है कि आप अब समझ गए होंगे कि इन आधे-अधूरे शहरों में मुझे किस चीज़ की कमी खल रही थी.

मैं समझता हूँ कि अब आप समझ गए होंगे कि आधे-अधूरे शहरों की विविधता में मुझे क्या कमी लगती है.

रुश्दी और उनके बाद की पीढ़ी के लेखकों के उभरने से अब विविधताओं को बड़े शहरों से जोड़कर देखने की बात आम हो गई है.

इस बात में सच्चाई तो है तो कि गया में देसीपन है.

लेकिन मैं फिर कहूँगा कि ऐसा समझने वाले लोग इन छोटे शहरों और कस्बों की जटिलता को नहीं समझते.

बड़े-छोटे शहर का भेद

मैं महसूस करता हूँ कि मैं उन लोगों के बीच पला बढ़ा जो इस विविधता को उन लोगों से बेहतर समझते थे, जिन्हें मैं बाद में बड़े शहरों और महानगरों में मिला.

छोटे शहरों और कस्बों में पलने-बढ़ने से ही आप बाहरी दुनिया के बारे में सोचते-समझते हैं.

बड़े शहरों में जीवन अपने आप तक ही सिमटा होता है.

आधे-अधूरे शहरों में जीवन हर चीज़ के लिए खुला होता है. बड़े शहरों से ये छोटे शहरों की इस विविधता को नहीं देखा जा सकता.

मैं गया जैसे आधे-अधूरे शहर से होने के बावजूद इस विविधता को बेहतर तरीके से देखता समझता हूँ.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार