'हमारा पैसा, हमारा हिसाब'.. संघर्ष की अनोखी दास्तां

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आरटीआई आंदोलन की शुरुआत करने वाले मज़दूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) ने आज 1 मई को अपनी स्थापना के 25 साल पूरे कर लिए.

हालांकि मौजूदा दौर में मज़दूरों के संघर्ष का औचित्य साबित करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है.

दलित गायक मोहन जी के 1990 के दशक में लिखे एक गीत की पंक्ति है, "पहले वाले चोर भइया बंदूक़ों से मारते थे, आज कल के चोर कलमों से मारते हैं."

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वो गाँव जिसने रखी आरटीआई आंदोलन की नींव

मोहन जी कभी स्कूल नहीं गए थे, लेकिन उन्होंने पहचान लिया था कि काग़ज़, कलम और आधिकारिक दस्तावेज़ शोषण के हथियार हैं.

इसी चेतना के साथ सूचना के अधिकार (आरटीआई) का संघर्ष शुरू हुआ था. आम लोगों की इस माँग में विलक्षण सरलता थी.

सूचना पाने का अधिकार माँगकर आम लोगों ने ग़ैर-जवाबदेह सत्ता केंद्रों को हिला दिया.

पैसे का हिसाब

Image caption आरटीआई को लेकर बिहार में धरना.

आम लोगों ने स्कूलों, सड़कों, अस्पतालों पर ख़र्च हुए पैसे का हिसाब माँगना शुरू कर दिया. वो जानना चाहते थे कि राशन की दुकानों में कितना राशन है और कितना गायब है. वो अस्पताल में मिलने वाली जीवनरक्षक दवाओं के बारे में जानना चाहते थे.

ये सब कुछ शुरू हुआ पांच ऐतिहासिक जनसुनवाइयों की श्रृंखला के साथ. जिसमें से पहली जनसुनवाई राजस्थान के कोटकिराना में दो दिसंबर, 1994 को एक टेंट के अंदर हुई थी.

ये जनसुनवाइयाँ अनौपचारिक रूप से मिले दस्तावज़ों के प्रयोग के साथ शुरू हुई थीं. जिसके बाद आम जनता और सरकारी अधिकारी दो खेमों में बंट गए.

जब पंचायत के अधिकारी पूरे राज्य में पारदर्शिता और पब्लिक ऑडिट के ख़िलाफ़ हड़ताल पर चले गए तो ये साफ़ हो गया कि आम लोगों के नाम पर तैयार किए दस्तावेज़ों को पाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ेगा.

नई बहस की शुरुआत

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Image caption भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पत्नी जशोदाबेन ने भी आरटीआई से जानकारी माँगी थी.

इस अभियान से पूरी दुनिया में सूचना के अधिकार को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई.

अजमेर की सुशीला और उनके समूह ने इस अभियान के तहत एक नारा दिया जिसे भारत में चलने वाले सभी अभियानों ने अपनाया. वो नारा था, "हमारा पैसा, हमारा हिसाब."

स्वर्गीय प्रभाष जोशी ने भी एक नारा दिया था जिससे ये मुद्दा जनता के अस्तित्व की लड़ाई से जुड़ गया.

जोशी ने जनसत्ता अख़बार में अपने स्तम्भ 'कागद कारे' के एक लेख को शीर्षक दिया था, "हम जानेंगे, हम जिएंगे."

उन्होंने लेख में बहुत स्पष्टता से बताया था कि सूचना का अधिकार किस तरह से एक परिवर्तनकामी अधिकार है.

आरटीआई आम लोगों का अधिकार है और इसे समाज के हर तबके ने प्रयोग किया है. इसके तहत देश के सबसे उच्च स्तर से लेकर ज़मीनी स्तर तक सरकारी संस्थाओं से सवाल पूछे गए हैं.

देश के आम लोगों ने प्रधानमंत्री कार्यालय, सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति कार्यालय और राज्यपाल कार्यालय इत्यादि से सवाल पूछे.

सामने आए घोटाले

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भूमि समझौते (जैसे आदर्श घोटाला), खदान आवंटन (कोयला घोटाले सहित) और अनुचित नीलामी से हुआ नुकसान (जैसे 2जी घोटाला) इत्यादि आरटीआई से सामने आए.

यहाँ तक कि अपने जजों की संपत्ति का ब्यौरा देने से मना कर देने वाले सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो लोकतंत्र में ज़रूरी पारदर्शिता और जवाबदेही से संगति बनाने की कोशिश कर रहा है.

लेकिन इस समय विभिन्न 'अधिकारों' पर जिस तरह से हमले हो रहे हैं उसे देखते हुए आने वाला समय मुश्किल होगा.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि वो मनरेगा (राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना) को रोकेंगे नहीं, लेकिन इसे विफ़लता का एक उदाहरण बना देंगे.

पब्लिक ऑडिट का विरोध

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राष्ट्रीय सूचना आयोग के चीफ़ इनफॉर्मेशन कमिश्नर का पद आठ महीने से खाली है.

यहाँ तक कि कैग (सीएजी) ने भी सोशल ऑडिट को आधिकारिक ऑडिट प्रक्रिया का एक ज़रूरी अंग माना है.

लेकिन देश के चुने हुए जनप्रतिनिधि एक बार फिर एकजुट होकर पब्लिक ऑडिट का विरोध कर रहे हैं.

एक अनुमान के मुताबिक़, क़रीब 80 लाख लोग हर साल आरटीआई का प्रयोग करते हैं.

इस अधिकार से लोगों के निहित स्वार्थ कितने आहत होते हैं इसका पता इस बात से भी चलता है कि पिछले कुछ सालों में 40 से ज़्यादा आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी है.

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जब पीछे मुड़कर हम बीते हुए 25 सालों की तरफ़ देखते हैं तो हमें थोड़ा अचरज होता है कि कैसे कुछ साधारण लोगों ने अपनी असाधारण इच्छाशक्ति और अनुशासन से इतना लंबा सफ़र तय कर लिया.

(अरुणा रॉय, शंकर सिंह और निखिल डे सामाजिक कार्यकर्ता और मज़दूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) के संस्थापक सदस्य हैं.)

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