मज़दूरी में पैसे के बदले लाल मिर्ची

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Image caption मिर्ची तोड़ने के बाद घर जाने से पहले मजदूर अपना हिसाब का पर्चा लेते हुए.

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से सुकमा की ओर आने वाली बसों में कुछ यात्री ऐसे भी हैं जो लाल मिर्ची की एक दो बोरियाँ लेकर वापस लौट रहे हैं.

इसमें अचरज की नहीं बल्कि एक बात खास है. और वो ये है कि लोग लाल मिर्ची ख़रीदकर नहीं बल्कि मिर्ची तोड़ने की मज़दूरी के एवज़ में लेकर आ रहे हैं.

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Image caption खेतों से होकर गुजरने वाली सड़क के किनारे लाल मिर्टी का ढेर.

दरअसल हर साल धान की कटाई के बाद छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों से खेतिहर मज़दूर और छोटे किसान दूसरे राज्यों में मज़दूरी करने निकल जाते हैं.

वहीं छत्तीसगढ़ और ओडिशा के कई आदिवासी मज़दूर पड़ोसी राज्य आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में मजदूरी करने जाते हैं.

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एक मजदूर एलमा देवा के अनुसार, “धान का काम खत्म होने के तुरंत बाद हमारे लोग (छत्तीसगढ़ के आदिवासी) यहाँ आते हैं, मिर्ची तोड़ने का काम करते हैं और महुआ गिरना शुरू होते ही, महुआ बीनने वापस गाँव चले जाते हैं.”

लेकिन सवाल तो यह है कि आखिर ये लोग मज़दूरी के तौर पर पैसे नहीं लेकर मिर्ची क्यों लेते हैं ?

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छत्तीसगढ़ के टेकालगुड़ा से मिर्ची तोड़ने के लिए आई मजदूरों की एक टोली के एक सदस्य देवा कोसा का कहना है कि, “मिर्ची तो हमारी ज़रूरत की चीजों में से एक है, जो हमारे खाने में रोज़ चाहिए. इसलिए यहाँ से मिर्ची लेकर जाने से हमारी साल भर की ज़रूरत पूरी हो जाती है."

वो बताते हैं, "हम मिर्च की इस कमाई में से कुछ मिर्च अपने रिश्तेदारों में भी बांट देते हैं.”

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Image caption खलिहान तक ले जाने के लिए बोरियों में मिर्ची भरते किसान और मज़दूर.

ओडिशा के मालकानगिरि ज़िले से आए उमाशंकर पोडियामी कहते हैं, “मैं पिछ्ले 3 साल से यहाँ आ रहा हूँ और घर के लिए मिर्ची लेकर जाता हूँ. इस बार हमारे गाँव से मिर्ची तोड़ने के काम के लिए हम बीस लोग आए हैं. हम पिछले हफ्ते आए हैं और तीन हफ्ते करीब यहाँ और रहेंगे और मिर्ची लेकर जाएँगे."

पोडियामी बताते हैं, “मज़दूरी तो 120 रुपये है पर हम लोग इसके बदले मिर्ची लेना पसंद करते हैं. दरअसल हम जितना मिर्ची तोड़ते हैं उसका तेरहवाँ हिस्सा हमें मज़दूरी के तौर पर मिलता है.”

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आदिवासी संस्कृति के शोधकर्ता और पत्रकार परेश रथ का कहना है कि “नमक, मिर्च, हल्दी और इमली, ये चार चीज़ें हैं या मसाले हैं जो हर एक आदिवासी परिवार के खाना बनाने में आमतौर पर शामिल होता है.”

मार्च महीने के शुरू में जब हम तेलंगाना गए थे तो वह मिर्ची तोड़ने का ही समय था. सड़क के दोनों ओर लाल मिर्च की ढेरियां हर पचास से सौ मीटर की दूरी पर लगी थीं.

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शाम का समय था और काम खत्म कर मज़दूरों का अपने डेरों की ओर जाने का सिलसिला भी शुरू हो गया था, यह देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वहाँ मिर्ची की मंडी लगी हो.

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Image caption छत्तीसगढ़ से आई आदिवासी युवा मजदूरों की टोली.

हमने देखा कि मिर्ची तोड़ने के लिए छत्तीसगढ़ से भारी तादाद में आदिवासी जिनमें युवा, बच्चे और महिलाएं शामिल हैं, गए हुए थे और उनमें से ज़्यादातर उन मिर्ची की खेती करने वाले सेठों या किसानों के यहाँ ठहरे हुए थे.

श्रम के बदले अनाज ग्रामीण पारंपरिक संस्कृति का हिस्सा रहा है और आदिवासियों में यह आज भी प्रचलन में है.

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