महाराष्ट्र में पैर फैलाती ओवैसी की पार्टी

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ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुसलमीन (एआईएमआईएम) पार्टी पिछले चार वर्षों से महाराष्ट्र की चुनावी राजनीति में शामिल है और उसकी मौजूदगी लगातार बढ़ती जा रही है.

लेकिन हाल में संपन्न औरंगाबाद नगर निगम के चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन ने समर्थकों के अलावा उनकी विरोधी पार्टियों को भी चौंका दिया है.

भाजपा-शिवसेना का एक लंबे अर्से से औरंगाबाद नगर निगम पर क़ब्ज़ा रहा है और इस चुनाव में भी उनकी जीत बरक़रार रही. लेकिन दूसरे स्थान पर रही एमआईएम.

औरंगाबाद की 113 सीटों वाली म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन में एमआईएम ने कुल 54 उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें 26 ने जीत दर्ज की.

जबकि कांग्रेस सिमट कर 10 सीटों पर आ गई और एनसीपी तो केवल 3 सीट ही जीत सकी.

लेकिन एमआईएम के इस प्रदर्शन के और भी बहुत कुछ मायने हैं.

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Image caption असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम ने दलितों-मुस्लिमों को जोड़ने में कुछ हद तक सफलता पाई है.

एमआईएम ने 54 उम्मीदवारों में से 12 दलितों को टिकट दिया था जिनमें से पांच दलित जीतकर आए हैं, जबकि उनके एक हिंदू ओबीसी उम्मीदवार ने भी जीत हासिल की है.

औरंगाबाद को दलित आंदोलन का गढ़ माना जाता है और स्वयं डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर से इस शहर का जुड़ाव रहा है, इसलिए इसे महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है.

औरंगाबाद नगर निगम के चुनावी नतीजे के बाद जो एक सवाल उभर कर सामने आया है, वो ये कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के मुस्लिमों की पार्टी समझे जाने वाली एमआईएम महाराष्ट्र में अपने पैर कैसे पसारने में सफल होती जा रही है?

और क्या वो महाराष्ट्र में दलित-मुस्लिम गठबंधन की नई राजनीति शुरू करने का प्रयास कर रही है?

सफलता

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एक अंग्रेज़ी चैनल के पूर्व पत्रकार और औरंगाबाद से पार्टी के विधायक इम्तियाज़ जलील कहते हैं कि एमआईएम ने हैदराबाद में भी दलितों को उचित सम्मान दिया है.

इम्तियाज़ कहते हैं, “हमने केवल विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ा है और जो भी भावनात्मक मुद्दे उठाए गए वे सेना-भाजपा की ओर से उठाए गए. यह हमारे ख़िलाफ़ झूठा प्रचार है, कि हम केवल मुस्लिमों की पार्टी हैं. विधानसभा चुनाव में भी हमने कई ग़ैर-मुस्लिमों को उम्मीदवार बनाया था. आगे भी हम दलितों को साथ लेकर चलेंगे.”

चार साल पहले एमआईएम ने नांदेड़ नगर निगम चुनाव में नौ पार्षदों के साथ धमाकेदार एंट्री की थी. तत्कालीन मुख्यमंत्री और अब कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष तथा सांसद अशोक चव्हाण के इस शहर में एमआईएम की यह अप्रत्याशित सफलता थी.

इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में जहां एमआईएम के दो विधायक बने, वहीं कई स्थानों पर पार्टी दूसरे नंबर पर रही.

पहला दलित मेयर!

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पिछले सप्ताह बांद्रा पूर्व के लिए हुए उपचुनाव में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के क़द्दावर नेता नारायण राणे के होते हुए भी एमआईएम के उम्मीदवार को 15 हज़ार वोट मिले थे.

फ़िलहाल औरंगाबाद के मेयर पद के लिए सेना-भाजपा तथा एमआईएम दोनों ने ही दलित उम्मीदवार दिए हैं. यानी, शहर का यह प्रथम दलित मेयर होगा.

ज़ाहिर है एमआईएम इसका राजनीतिक लाभ लेने की पूरी कोशिश करेगी.

महाराष्ट्र की 288 विधान सभा सीटों में से 150 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका निर्णायक बताई जाती है.

अगर मुसलमानों ने कांग्रेस-एनसीपी को छोड़कर एमआईएम के साथ जाने का फ़ैसला कर लिया और कुछ दलितों ने भी उनका हाथ थाम लिया तो क्या राज्य में एक नए राजनीतिक समीकरण की शुरुआत हो सकती है?

लेकिन कुछ दलित चिंतक ऐसा नहीं मानते.

दलित वोटों पर असर

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डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के डॉ. जयदेव डोले के अनुसार, “शिवसेना और एमआईएम एक दूसरे का डर दिखाकर सफल हो रहे हैं. महाराष्ट्र में युवा मतदाताओं की संख्या अधिक है, इसलिए आगे भी एमआईएम को अधिक सीटें मिलेगी. ख़ासकर मराठवाड़ा व विदर्भ में यह स्थिति हो सकती है. लेकिन एमआईएम में वर्ग संघर्ष शुरू होने के बाद उनका मोहभंग होगा.”

दलित लेखक प्रो. अविनाश डोलस कहते हैं, “कुछ दलित पहले कांग्रेस व अन्य पार्टियों से चुनकर आते थे. अब वे एमआईएम की ओर जा रहे हैं. इन लोगों को सिर्फ़ अपने स्वार्थ की पड़ी होती है. उनका आंबेडकर की विचारधारा से कोई लेना देना नहीं होता. कुल मिलाकर इससे दलित राजनीति पर कोई असर नहीं होगा.”

कांग्रेस के अशोक चव्हाण के अनुसार एमआईएम और सेना-भाजपा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.

साज़िश?

अशोक चव्हाण कहते हैं, “शिवसेना और भाजपा को मदद करने की एमआईएम की भूमिका है. अपने उम्मीदवारों को जिताने की बजाय उन्हें हमारे उम्मीदवारों को हराने में अधिक रुचि है. सेक्युलर मतों का विभाजन करने के लिए भाजपा द्वारा रची हुई यह साज़िश है.”

अशोक चव्हाण के आरोपों में कितनी सच्चाई है ये कहना तो मुश्किल है, लेकिन इतना ज़रूर है कि एक तरफ़ एमआईएम और दूसरी तरफ़ शिव सेना और भाजपा जैसी पार्टियां दोनों को फ़िलहाल एक दूसरे से राजनैतिक लाभ हो रहा है. और अगर फ़िलहाल किसी के लिए चिंता का विषय है, तो वो है कांग्रेस-एनसीपी.

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