भला मंत्री जी की कौन सी मजबूरी थी?

क़िस्सा मशहूर है कि जाने-माने शायर अकबर इलाहाबादी के घर एक सज्जन पहुंचे और उन्होंने अपना विज़िटिंग कार्ड भीतर भिजवाया जिस पर उनके छपे हुए नाम के नीचे क़लम से 'बीए पास' लिखा हुआ था.

अकबर इलाहाबादी ने बाहर एक रुक़्क़ा भिजवाया, जिस पर यह शेर लिखा था-

''शेख़ जी घर से न निकले और ये फ़रमा दिया, आप बीए पास हैं तो बंदा बीवी पास है.''

अकबर के लिहाज़ से इस शेर का एक संदर्भ यह भी था कि वे पश्चिमी आधुनिकता की पूरी परियोजना को ख़ारिज करते थे जिसमें उनके स्कूल-कॉलेजों वाली शिक्षा भी शामिल थी.

डिग्री का जलवा तो है

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बहरहाल, अकबर के परहेज़ और गांधी की आलोचना के बावजूद पश्चिमी शिक्षा पद्धति हमारे जीवन पर कुछ इस तरह हावी है कि हम उसके बाहर देख और सोच नहीं सकते.

इसका एक दिलचस्प पहलू यह है कि पढ़ाई-लिखाई में डिग्रियां जैसे-जैसे बेमानी होती जा रही हैं, सार्वजनिक जीवन में उनकी अहमियत एक तरह से बढ़ती जा रही है.

अगर ऐसा न होता तो दिल्ली की दो सरकारों के दो मंत्री डिग्री विवाद से न घिरे होते.

क्या संयोग है कि एक तरफ़ केंद्र की मोदी सरकार की मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की डिग्री अलग-अलग चुनावों के दौरान दिए गए उनके अपने हलफ़नामों की वजह से सवालों में घिरी है तो दिल्ली की केजरीवाल सरकार के क़ानून मंत्री जितेंद्र तोमर की क़ानून की डिग्री ही फ़र्ज़ी बताई जा रही है.

यह बात कुछ हैरान करती है कि इन दो मंत्रियों ने अपनी डिग्रियों को लेकर कुछ ग़लत या अंतर्विरोधी सूचनाएं क्यों दीं?

अगर डिग्री ना होती तो?

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अगर इन दोनों के पास ये दो डिग्रियां न होतीं तो भी ये मानव संसाधन मंत्री या क़ानून मंत्री होने की न्यूनतम योग्यता रखते थे. यही नहीं, इनकी डिग्रियों से इनकी कार्यकुशलता का भी कोई वास्ता नहीं है.

स्मृति ईरानी अगर बीए या एमए पास नहीं हैं और जितेंद्र तोमर के पास अगर क़ानून की डिग्री नहीं है तो इससे न उनका सामाजिक सम्मान घटता है न उनकी राजनीतिक हैसियत में कमी आती है.

फिर वह कौन सी चीज़ है जो डिग्रियों को इनके लिए इतना ज़रूरी बनाती है?

क्या अपने भीतर का कोई खोखलापन, क्या आत्मविश्वास की कोई कमी- जिसकी वजह से इन्हें लगता है कि डिग्रियों की ओट लेकर ये छुप जाएंगे या कुछ और मज़बूत दिखने लगेंगे?

डिग्री कब ज्ञान पर हावी हो गई

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ध्यान से देखें तो भारतीय समाज में डिग्रियों का यह आतंक आधी सदी से पुराना नहीं है. समाज में बहुत सारे लोग ऐसे थे जो परंपरा से या अपनी इच्छा से इतना कुछ पढ़-लिख लेते थे कि वे कई पढ़े-लिखे

लोगों को पढ़ाते थे. वैसे तब की डिग्रियां भी इतनी बेमानी नहीं थीं. उन दिनों के मैट्रिक पास लोग भी अपने ज्ञान के बुनियादी अनुशासन में बहुत ठोस हुआ करते थे.

लेकिन आज स्वाध्याय की वह परंपरा भी क्षतिग्रस्त है और डिग्रियां बांटने वाले संस्थानों की विश्वसनीयता भी.

कहने को भारत सूचना क्रांति के केंद्र में है और आइआइटीज़ की संख्या बढ़ती जा रही है, लेकिन पचास बरस में हम सीवी रमन या सत्येंद्रनाथ बोस के पाये का एक भी वैज्ञानिक पैदा नहीं कर पाए.

हम बस सूचना प्रौद्योगिकी के बाज़ार में, कवि वीरेन डंगवाल के शब्दों में ‘बिल गेट्स का दक्ष किंतु निर्जीव हाथ’ बन कर खुश हैं. दूसरे अनुशासनों की दशा और गंभीर है. हिंदी साहित्य में पीएचडी

लगभग मज़ाक़ का विषय हो चुकी है.

पर ऐसा हुआ क्यों?

इसके बावजूद जितेंद्र तोमर या स्मृति ईरानी के भीतर ख़ुद को विशेष डिग्रीवाला बताने की चाह क्यों है?

क्योंकि क्षरण डिग्रियों का ही नहीं, ज्ञान की पूरी परंपरा का हुआ है. शिक्षा अब ज्ञानवान या बेहतर इंसान बनने की कोशिश या प्रक्रिया का नाम नहीं है, वह बेहतर- यानी अच्छे पैसे वाली- नौकरियां दिलाने का ज़रिया है- इसके लिए विज्ञान भी रटा जा सकता है और इतिहास भी- और दोनों को नौकरी पाकर भूला जा सकता है. भले ही पढ़ाई आपने देश के सबसे भारी-भरकम संस्थानों से की हो.

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पिछले दिनों बिहार के एक विद्यालय में दूसरी-तीसरी मंज़िल पर खिड़की के सहारे लटक कर अपनों को इम्तिहानों में नक़ल करा रहे लोगों की तस्वीर बिल्कुल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वायरल हो गई थी, लेकिन खिड़की के दूसरी तरफ़ की असलियत किसी ने देखने-जानने की ज़हमत नहीं मोल ली थी.

हमारे यहां पैसेवाले अगर ट्यूशन के सहारे, कोचिंग के सहारे, गाइडबुक के रट्टामार तरीकों के सहारे इम्तिहान पास करते हैं तो ग़रीब लट्ठमार ढंग से- फ़र्क़ बस इतना है.

लेकिन जब आपके पास ज्ञान की ठोस परंपरा न हो, अपनी अर्जित शिक्षा का आत्मविश्वास न हो तो आपको डिग्रियां दिखाना ज़रूरी लगने लगता है, क्योंकि यह किसी और चीज़ से नहीं, सिर्फ़ आपकी डिग्री से साबित हो सकता है कि आप पढ़े-लिखे हैं.

बुरा हो इस देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का कि लोगों का यह घपला भी पकड़ में आ जाता है.

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