गुजरात में कितने हैं जंगल के राजा?

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इसरायल जितने बड़े एक क्षेत्र में भारतीय वन्यजीव प्राधिकरण गुजरात में शनिवार को अब तक की सबसे बड़ी मुहिम को अंजाम देंगे.

दरअसल यह प्राधिकरण गुजरात में जंगल के राजा यानी शेरों की गिनती करेगा. शेरों की गिनती के काम में क़रीब 2,200 लोग जुटेंगे.

गुजरात के गिर अभ्यारण्य में हर पांच साल में शेरों की गिनती होती है. हालांकि इस साल यह गणना बड़े पैमाने पर की जा रही है.

इसकी वजह यह है कि शेर की आबादी अब महज़ 1,400 वर्ग किलोमीटर सासन गिर अभ्यारण्य संरक्षित क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि ये शेर अब भारत के पश्चिमी राज्य के 21,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पाए जाते हैं.

गणना की तैयारी

गुजरात में मुख्य वन संरक्षक सी एन पांडेय का कहना है, "हम प्रत्यक्ष गणना पद्धति को अपनाएंगे यानी शेर को सीधे देखकर उनकी गिनती करेंगे. एक बार देखे गए शेर की तस्वीर ली जाएगी और उसके विशिष्ट पहचान से जुड़े निशान नोट किए जाएंगे. शेर अक्सर एक समूह में रहते हैं तो उनके समूह के बर्ताव, आकार और उसकी बनावट के ब्योरे को नोट किया जाएगा जिससे चीज़ों को अलग करके देखने में मदद मिल सके. जीपीएस का इस्तेमाल कर उन जगहों को रेखांकित कर दिया जाएगा जहां शेर देखे गए."

पांडेय कहते हैं कि उनका विभाग पिछले 9 महीने से गणना की तैयारियों में जुटा हुआ था.

उन्होंने बताया, "हमने शेर के व्यवहार और उनकी गतिविधियों, उनके समूह के विस्तार का अध्ययन किया. जीपीएस और जीआईएस के ज़रिए उनके समूह की गतिविधि और वे जहां शिकार करते हैं उन जगहों पर नज़र रखी गई, उनकी तस्वीरें ली गईं. इन आंकड़ों का इस्तेमाल कर क़रीब 30 नक़्शे तैयार किए गए जिनसे जनगणना क्षेत्र तय हुआ."

उनका कहना है कि जनगणना के काम में जुटे लोग शेरों की विशिष्ट पहचान मसलन चेहरे पर कोई निशान, कान के आकार, पूंछ में बाल के गुच्छा, रंग और पेट की लकीरों का रिकॉर्ड भी रखा जाएगा.

पांडेय कहते हैं, "गर्मी के दिनों में अमूमन शेरों को नदियों या पानी वाली जगहों के आसपास देखा जा सकता है. हमने करीब 600 टीम बनाई है जो जंगल में दो दिनों तक रहेंगे. पूर्णिमा होने की वजह से रात में भी इतनी पर्याप्त रोशनी होगी कि शेरों को देखा जा सके. टीम पेड़ पर बने घरों और टेंट में रहेगी."

शिकार की मार

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मुख्य वन संरक्षक का कहना है कि टीमों ने खुद को गुजरात के आठ ज़िलों जूनागढ़, गिर-सोमनाथ, देवभूमि द्वारका, भावनगर, बातोड़, जामनगर, पोरबंदर और अमरेली में बांट लिया है और ये टीमें 24 घंटे में गिनती कर वापस आ जाएंगी.

उन्होंंने कहा, "एक बार जब हमारे पास शेर और उनके विभिन्न समूहों के व्यापक आंकड़े होंगे तब अगली टीम 4 मई को फिर इन क्षेत्रों में जाएगी और पहले देखकर जुटाई गई सूचना के आधार पर समान कार्रवाई की जाएगी ताकि उनमें कोई ख़ामी न रहे और सही आंकड़े तय हो सकें."

टीम जब वापस आ जाएगी तब गिर अभ्यारण्य के एक केंद्र में आंकड़ों का मिलान कर गिनती के काम को अंजाम दिया जाएगा और जनगणना का ब्योरा 9 मई और 10 मई को जारी किया जाएगा.

20वीं सदी की शुरुआत में शिकार और सूखा पड़ने की वजह से गुजरात में शेर की आबादी कम होकर महज दर्जन भर रह गई थी.

लेकिन उस वक़्त जूनागढ़ राज्य के नवाब महाबत खांजी ने शेरों के शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया और वह उनका संरक्षण करने में सक्षम रहे. वे जानवरों से बेहद प्यार करते थे और उन्होंने 300 पालतू कुत्ते रखे थे.

बढ़ी आबादी

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इंटरनैशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) ने वर्ष 2000 में एशियाई शेर को विलुप्त होने वाली प्रजाति की सूची में शामिल कर दिया था.

वर्ष 2005 में जब शेर की आबादी बढ़ने लगी और यह 250 की संख्या को पार करने लगी तब इसे उस सूची से हटाया गया.

संरक्षण के उपायों और स्थानीय लोगों की मदद से उसी वक़्त से शेर की आबादी बढ़ती जा रही है.

हालांकि अब भी संरक्षणकर्ताओं के सामने शेरों की किसी दुर्घटना की वजह से हुई मौत और क्षेत्र में होने वाला अवैध खनन, सबसे बड़ी चुनौती है.

पिछले पांच सालों में सुरक्षित क्षेत्र और उसके आसपास के इलाके में 260 से ज़्यादा शेर मारे गए हैं.

हालांकि अब शेर की आबादी अभ्यारण की क्षमता से ज्यादा हो रही है ऐसे में आदमी और जानवरों के बीच संघर्ष और संक्रामक रोग का ख़तरा बढ़ रहा है.

नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे उस दौरान शेरों को मध्य प्रदेश के अभ्यारण्य में स्थानांतरित करने से रोकने के लिए लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़ी गई थी.

लेकिन भारत में गणना के आंकड़े वन्यजीव संरक्षकों के लिए ख़ुशी का सबब बन सकते हैं जो एशियाई शेरों की आख़िरी आबादी को बचाने में सफल रहे.

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