फणीश्वरनाथ रेणु की 'किरदार' बनी घर की बहूरानी

दुलारी, फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास के पात्र की प्रेरणा इमेज कॉपीरइट Manish Shandilya
Image caption माना जाता है कि परती परिकथा की पात्र मलारी का चरित्र दुलारी से प्रेरित था.

उपन्यासकार फणीश्वरनाथ रेणु का एक बहुचर्चित उपन्यास 'परती: परिकथा' है.

उपन्यास कुछ प्रेम संबंधों के सहारे भारत के आंचलिक समाज की सच्चाई को दिखाता है और अपने अंजाम तक पहुंचता है. बहुत कुछ रेणु की कालजयी रचना 'मैला आंचल' की तरह.

इसी उपन्यास की एक पात्र हैं मलारी. मलारी दलित हैं जबकि उनका प्रेमी सुमंत ऊंची जाति का है और गरीब है. ऐसे में प्रेम विवाह करने के बाद ये दोनों गांव में नहीं टिक पाते.

'परती: परिकथा' लिखे जाने के बाद आधी सदी से भी ज़्यादा समय गुज़र चुका है. और अब कुछ-कुछ मलारी-सुमंत जैसी ही प्रेम कहानी एक बार फिर वास्तविक जीवन में सामने आई है.

यह प्रेम-कहानी भी उसी आबो-हवा में पनपी है जहां 'परती: परिकथा' के बीज पड़े थे. इत्तेफाक यह कि इस प्रेम कहानी का पुरुष पात्र जहां रेणु के पोते हैं तो महिला पात्र 'मलारी की पोती' हैं.

दुलारी बनाम मलारी

रेणु के कई पात्रों के बारे में कहा जाता है वे ऐसे व्यक्तियों के जीवन से प्रभावित थे जो उनके बहुत क़रीब रहे.

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माना जाता है कि मलारी का क़िरदार दुलारी से प्रेरित है. दुलारी अभी जीवित हैं और सक्रिय भी. वह रेणु के गांव औराही हिंगना के पास स्थित बांध टोला में रहती हैं.

रेणु के बेटे और फॉरबिसगंज से विधायक पद्म पराग राय वेणु बताते हैं, "दलित परिवार से आने वाली दुलारी पढ़ी-लिखी हैं. बहुत खूबसूरत हैं. अपने समय में सामाजिक रूप से बेहद सक्रिय थीं. और बगावती तेवर भी रखती थीं."

वेणु के मुताबिक़, ये सारे गुण परती परकिथा की मलारी में भी हैं. उसी दुलारी या कहें कि मलारी की पोती अमृता कुमारी की शादी अप्रैल के अंत में रेणु के पोते और वेणु के बेटे अनंत कुमार राय से हुई.

बीस साल लंबी प्रेम कहानी

अनंत और अमृता के परिवार परिचित थे, आना-जाना था. अनंत अपनी दादी से सामाजिक बदलाव और अपने दादा-परदादा की कहानियां सुन कर बड़े हुए थे.

ऐसे में उनका झुकाव पढ़ी-लिखी और सोचने समझने वाली अमृता और उनके परिवार की ओर हुआ. अनंत बताते हैं कि उन्होंने पहली बार अमृता को गांव के स्कूल में चलने वाले एक कोचिंग क्लास में देखा था.

यह किस्सा 1995 का है तब अनंत दसवीं और अमृता छठवीं में पढ़ती थीं. अमृता बताती हैं, "2004 में अनंत ने पहली बार अपने प्यार का इज़हार किया. तब मैंने इसे गंभीरता से नहीं लिया था."

लेकिन फिर 2006 में अनंत के परिवार की पहल के बाद बात आगे बढ़ी जो इस साल शादी के रूप में अंजाम तक पहुंची. अमृता अभी अपने गांव के पास ही सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं जबकि अनंत पटना में व्यवसाय करते हैं.

अनंत बताते हैं, "उनके घर में तो इस अंतर्जातीय शादी को लेकर विरोध नहीं था, लेकिन गांव-समाज के कुछ लोग सवाल करते थे. वे कहते थे कि दूसरी जाति की पत्नी को लेकर कहीं कैसे जाओगे."

गौरतलब है कि अनंत के आस-पास के समाज में भी वर्तमान जातीय व्यवस्था की जड़ें गहरी हैं. अनंत मध्य जाति समूह से आते हैं तो अमृता दलित हैं.

रेणु का सपना

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Image caption रेणु के पोते अनंत की शादी दुलारी की पोती अमृता से हुई है.

'परती परिकथा' कोसी बांध निर्माण की पृष्ठभूमि में लिखा गया उपन्यास है. आलोचकों के मुताबिक़, इसमें रेणु ने बहुत बारीकी से तब के समाज के जाति और वर्ग के मुद्दों को उठाया है.

साहित्य अकादमी पुरस्कार हासिल कर चुके रचनाकर रमेशचंद्र शाह इसके काव्यात्मक पक्ष के बारे में कहते हैं, "परती परिकथा में लोकगीत जैसी उड़ान है. इसके चरित्र कभी न भूलने वाले और ग्रामीण समाज का अंतरंग हिस्सा हैं."

वरिष्ठ साहित्यकार और राजनीतिज्ञ प्रेमकुमार मणि रेणु के करीबी रहे हैं. मणि बताते हैं, "रेणु समाजवादी तबियत के इंसान थे और समाजवादी राजनीति से भी जुड़े थे. उन्होंने जातिविहीन समाज का सपना देखा था."

वह आगे कहते हैं कि ऐसे में उनके पोते ने जातिमुक्त होकर एक दलित लड़की से शादी की है तो यह रेणु के सपने का पूरा करने की दिशा में एक सराहनीय कदम है.

गौरतलब है कि खुद रेणु ने भी अंतर्जातीय शादी की थी और उनके परिवार में अनंत की शादी के पहले भी जाति बंधनों को तोड़ शादियां हुई हैं.

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