बलात्कार की शिकायत भी जिन्हें चुभती है

इमेज कॉपीरइट AP

''जिस गाड़ी के आप मालिक हों उसे चलाने के लिए आपको किसी की इजाज़त की ज़रूरत नहीं होती, न ही आप ये उम्मीद करते हैं कि इसके लिए आपको सज़ा मिलेगी!!''

Virendra Giri फेसबुक पर बीबीसी के पाठक हैं और ये राय उन्होंने वैवाहिक बलात्कार पर मेरी रिपोर्ट पढ़ने के बाद लिखी.

पत्नी की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ पति अगर उसके साथ यौन संबंध बनाता है तो उसे वैवाहिक बलात्कार कहा जाता है और अब ये बहस छिड़ी है कि इसे क़ाननून जुर्म माना जाए या नहीं. इस मायने में वीरेंद्र शायद पत्नी और गाड़ी के बीच कोई फ़र्क़ नहीं मानते!

वैवाहिक बलात्कार पर बीबीसी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें

इस रिपोर्ट को लेकर बीबीसी के सोशल मीडिया मंच पर लगातार आ रही कई भद्दी टिप्पणियों और सवालों को देखकर मुझे लगा कि उनका जवाब देना मेरी ज़िम्मेदारी है.

समस्या की जड़

इमेज कॉपीरइट Reuters

ख़ासकर उन लोगों को जिनकी टिप्पणियां 'बलात्कार' की शिकार रश्मि और प्रिया को 'फिज़ूल का रोना रोने वाली' बताती हैं.

पाठकों से मेरा पहला और बुनियादी सवाल ये है कि रश्मि और प्रिया जिनकी कहानी इस रिपोर्ट में शामिल है उन्हें गाली देने से क्या औरतों के साथ बंद कमरे में होने वाली ज़्यादतियां बंद हो जाएंगी. या भारत की वो 10 फीसदी औरतें सरकारी आंकड़ों से ग़ायब हो जाएंगी जिन्होंने शादी के भीतर यौन हिंसा को स्वीकारा है.

रश्मि से हुई बीबीसी की बातचीत सुनने के लिए क्लिक करें

जो लोग मीडिया में इन कहानियों को इसलिए छपने से रोकना चाहते हैं कि इससे ''समाज-परिवार टूटेंगे'' और ''भारतीय संस्कृति की साख कम होगी'', उन्हें औरतों का मुंह बंद करने की बजाय उनकी नज़र से इस बहस को समझना होगा.

Shambhu Saran जब यह कहते हैं कि, 'शादी का मतलब ही है यौन संतुष्टि. शादी के बाद तो क़ानून ही पति को ये हक देता है कि वो पत्नी के साथ सेक्स कर सके.' या फिर Gangaram Jangid की ये बात कि 'शादी सिर्फ़ सेक्स के लिए की जाती है, अगर सेक्स नहीं तो शादी क्यों?' तो मैं ये समझ पाती हूं कि समस्या की जड़ आखिर कहां है.

समस्या की जड़ यह है कि भारत में पुरुषों का एक बड़ा तबका अभी तक सेक्स को अधिकार और शक्ति प्रदर्शन का ज़रिया समझता है. सेक्स करने का अधिकार क़ानून से नहीं मिलता बल्कि पति को पत्नी से और पत्नी को पति से मिलता है.

यहां ग़ुस्सा क्यों नहीं

इमेज कॉपीरइट P.M.TEWARI

बलात्कार की ख़बर आने पर अक्सर जब लोगों का ग़ुस्सा सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक फूटता है तो लोग 'बलात्कारी' को सरेआम फाँसी देने, पत्थरों से मारकर उसकी जान लेने यहाँ तक कि उसे नपुंसक बना देने की माँग करते हैं.

तो वही ज़बरदस्ती अगर पति कर रहा है तो क्या औरत की तक़लीफ़ कम हो जाती है? अगर कोई औरत लगातार ये बात साबित करती है कि बंद कमरे में उसके साथ यौन हिंसा हो रही है तो उसकी बात क्या सिर्फ़ इसलिए नहीं सुनी जाए कि अब उसकी शादी हो चुकी है और उसके शरीर को नुक़सान पहुंचाने वाला उसका अपना पति है?

सोचिए जब रश्मि ये कहती हैं कि, “महीने के उन दिनों जब मेरी तबियत ठीक नहीं रहती थी, तब भी वह मुझसे ज़बरदस्ती करते थे,” तो क्या किसी महिला के गुप्तांग में टॉर्च घुसाने पर भी उस पुरुष को इसलिए कुछ नहीं कहा जाना चाहिए क्योंकि वो उसका पति है?

इमेज कॉपीरइट AP

Alok Behera की जानकारी के लिए बीबीसी ने ये रिपोर्ट ''केवल उस लड़की का रोना सुनकर'' नहीं लिखी बल्कि मामले से जुड़े सारे पक्षों से बात कर लिखी है. तीन दिन तक उसके पति ने जब बीबीसी से बात नहीं की तब हमने सरकारी कागज़ों से मामला पुख्ता कर कहानी प्रकाशित की.

Arun Kumar Tiwari का कहना है, ''मीडिया में घटिया औरत बोलती है और ये औरत इसलिए ऐसा बोल रही है क्योंकि इसके नाजायज़ संबंध हैं.'' मेरा कहना है कि ये सही है कि मीडिया के ज़रिए कई तरह की गलत और ‘घटिया’ बातें कही जाती हैं लेकिन मीडिया के ज़रिए अक्सर वो औरतें भी बोलती हैं जिनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं और कोई थाना उनकी एफआईआर लिखने को राज़ी नहीं!

चरित्र पर सवाल

और ऐसा क्यों है कि जब भी महिला यौन संबंधों से जुड़े किसी मसले पर खुलकर बात करती है तो सबसे पहले उसके चरित्र पर कालिख पोत दी जाती है.

इमेज कॉपीरइट Think Stock

यह देखकर दुख होता है कि बीबीसी के मंच पर भी सवालों और कमेंट्स के शोरगुल के बीच Rosy Harit जब ये कहती हैं कि, ''रश्मि अकेली नहीं, हज़ारों औरतों के साथ ये होता है'' या Sabina Chothia Seedat कहती हैं कि, ''जो पुरुष यहां गालियां लिख रहे हैं क्या उन्होंने कभी अपनी बहनों से ये जानने की हिम्मत की, कि कहीं उनके साथ भी तो यही सब नहीं हो रहा'' या फिर Nayana Nakum जब लिखती हैं कि ''ये सरासर अन्याय है, और औरत को हर कीमत पर न कहने का हक होना चाहिए,'' तो हमेशा कि तरह इन आम औरतों की आवाज़ घुटी-घुटी सी सुनाई पड़ती है.

लेकिन सबसे ज्यादा अफ़सोस मुझे Prameshwar Choudhary या Akash Mishra जैसे हमारे उन पाठकों को पढ़कर होता है जो लगातार ये सोच कर परेशान हैं कि ये कहानियां मुझ जैसी महिला पत्रकारों की 'कुंठा' का नतीजा हैं.

या फिर Tajwar Dadkhan और Sameer Khan जैसे पाठक जो रश्मि और प्रिया से सहानुभूति तो रखते हैं लेकिन इसे केवल 'हिंदू-मुसलमान' या 'जात बाहर शादी' के चश्मे से देखते हैं.

हो सकता है बहुत से पाठकों को मेरी ये बातें अब भी पसंद न आएँ, मगर मैं ये चाहती हूँ कि आप इस बहस में शरीक़ हों, गालियों के सिलसिले के साथ नहीं बल्कि तर्कों के साथ.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार