'बीबीसी रेडियो के लिए मार खा चुका हूं'

सोशल मीडिया पर बीबीसी के कई पाठकों ने बीबीसी हिंदी के 75 साल पूरे होने के मौके पर इससे जुड़ी अपनी यादें हमें भेजी हैं.

पढ़ें पाठकों-श्रोताओं की ऐसी ही कुछ यादें.

विकास कुमार- 'शॉर्ट वेव लगाते, लोग काबिल समझते'

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बीबीसी हिंदी से जुड़ी हमारी यादें पुरानी हैं. जब रेडियो का ज़माना था हम तब के मार खाए हुए हैं. रेडियो खरीदवाने के लिए. असल में मैं पत्रकार भी बना बीबीसी हिंदी की वजह से...

शाम के समय जब शॉर्ट वेव लगा लेता था तो गांव जवार में हमें लोग काबिल समझते थे. शॉर्ट वेव ट्यून करना मुश्किल काम होता था.

बीबीसी के दो पत्रकार रुपा झा और ब्रजेश उपाध्याय से मिलने के लिए हम उनका पीछा करते हुए मुज़फ़्फ़रपुर के चंद्रलोक होटल पहुंच गए थे .

जब अचला शर्मा पटना के मौर्या होटल पहुंची थीं तो मौर्या होटल के रिसेप्शन वाले को इतने फ़ोन किए कि वो तंग हो गए.

'करियर क्या करुं' सुनते थे अतुल संगर का तो तय किया कि पत्रकार बनेंगे. घर में कोई हमारे फैसले से खुश नहीं था लेकिन हम दिल्ली भाग आए और किसी तरह पत्रकारिता का कोर्स किया.

आज पत्रकार भी हैं. खुश हैं. कहीं और काम करते तो खुशी नहीं मिलती. दिल्ली में नौकरी करने के दौरान जब मैंने अपने एक संपादक के सामने बीबीसी को खबर का सही स्रोत बता दिया तो संपादक महोदय खिसिया गए...

शेखर सिंह- 'मैं, मेरा मोबाइल और बीबीसी हिंदी'

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हम छोटे थे तो बाबा शाम को खाने के बाद रेडियो में बीबीसी हिंदी सुनने के लिए जैसे ही लगाते थे हम भी कौड़ा के आगे बैठ कर सुनते थे.

देश और दुनिया अपने गाँव में, 7:20 का प्रादेशिक समाचार और उसके बाद बीबीसी का ये समाचार ना बाबा का छूटता था ना ही बचपन से मेरा.

रेडियो से साथ छूटा तो इंटरनेट से नाता जुड़ा बीबीसी से और आजकल तो एप्प डाउनलोड कर लिया है.

इससे बना रहता है हमेशा रिश्ता बीबीसी हिंदी से, मैं मेरा मोबाइल और बीबीसी हिंदी.

निशांत यादव- 'अराफ़ात को बीबीसी से जाना'

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'बीबीसी लंदन लगा और सुन, धीरे धीरे मिला.'

‘नहीं मिल रहा है पापा.’

'अरे मूर्ख, रेडियो का बैंड तो बदल.'

और मैं बस अंदाज़े से रेडियो की चूं चूं के बीच में बीबीसी लदन लगा ही लेता था.

पिताजी रोज 7:20 का समाचार सुनकर फटाक से बोलते थे, जल्दी कर बीबीसी लंदन लगा. उस समय विदेश की बेहतर खबर सुनने का एक मात्र माध्यम बीबीसी लंदन ही था.

जैसे ही बीबीसी लंदन लगता था, पिता जी को खबर बोलने वाले की आवाज़ से पता लग जाता था. वो थोड़ा चिल्लाने के स्वर में कहते- 'रुक यही है.' मैं रेडियो की ट्यूनिंग बटन जस का तस छोड़ देता.

फिर धीरे रेडियो की साइड बदल, आवाज़ और साफ़ होती जाती. उस समय यासिर अराफ़ात और इसराइल की खबरें आया करती थीं. मैने यासिर अराफ़ात को बीबीसी लंदन की खबरों से ही जाना .

हिंदुस्तान की भी खबरें आती थीं लेकिन कुछ चुनिंदा ही. मज़े की बात ये है, मैंने कभी बीबीसी हिंदी लंदन की रेडियो फ्रीक्वेंसी नहीं देखी. बस बचपन में अंदाज़े से मिलाया करता था.

आज जब ये लिखने बैठा हूँ, तो गूगल पर देखा बीबीसी लंदन की फ्रीक्वेंसी 94.9 है.

बीबीसी लंदन को लेकर बचपन की तमाम यादें है जो भुलाये नहीं भूलती. मगर अफ़सोस ये, अब न तो पिता जी बीबीसी लंदन सुनते है और न मैं बीबीसी लंदन ट्यून करता हूँ .

अभिषेक कुमार- 'साफ़दिल, निष्कपट और बिना अहंकार'

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बीबीसी हिंदी एक खुशनुमा अहसास है, असहनीय तनाव भरे मीडिया चैनलों की भीड़ में. एक ऐसा मंच जहाँ हर खबर को वज़न मिलता है, आवाज मिलती है, नई पहचान मिलती है.

पहली बार जब मैंने बीबीसी हिंदी रेडियो 2004 में सुना, मेरी उम्र उस वक्त 8-9 साल की होगी... वह सुनामी का दौर था और बीबीसी हिंदी पर मृतकों की संख्या और तबाही में गतिशील बढ़ोत्तरी सुनकर उपजी दहशत की धुंधली तस्वीर अब भी साफ़ हो जाती है.

कई वर्षों तक रेडियो पर बीबीसी हिंदी को साफ़ सुनने के लिए जद्दोजहद करते हुए, उद्घोषकों की आवाज को मशीनी समझते हुए, एक दौर बीता और यह हकीकत भी मेरे सामने आई कि समाचार पढ़ने वाले वाकई हमारी तरह इंसान ही हैं.....

कुछ बेहतरीन कार्यक्रम जो सिर्फ और सिर्फ बीबीसी हिंदी के बस की बात थी और है...

सलमान रावी की रिपोर्ट 'लाल सलाम' एक मील का पत्थर है जिसे मैं फिर से और बार-बार सुनना पसंद करूँगा.

लोकसभा चुनाव 2014 में बीबीसी हिंदी के कार्यक्रम 'कैंपस हैंगआउट' के दौरान मुज़फ़्फ़रपुर में बीबीसी हिंदी कुछ नामी-गिरामी चेहरों के साक्षात दर्शन हुए...साफ़दिल, निष्कपट और बिना अहंकार के (पत्रकार बिरादरी में यह सबसे बड़ा आश्चर्यजनक संयोग है)....

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