''बीबीसी की प्रतियोगिता नहीं जीतने पर दुख हुआ''

सोशल मीडिया पर बीबीसी के कई पाठकों ने बीबीसी हिंदी के 75 साल पूरे होने के मौके पर इससे जुड़ी अपनी यादें हमें भेजी हैं.

पढ़ें पाठकों-श्रोताओं की ऐसी ही कुछ यादें.

दीप्ति दुबे- ''ये मेरे पापा की चिट्ठी है''

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मेरे पापा राजा दुबे सरकारी अधिकारी हैं और रिटायर्ड हैं. उन्होंने कहा कि ये चिट्ठी आप तक पहुंचा दूं.

उन दिनों जब अंग्रेजों और अंग्रेजी को उपनिवेशिक दासता की याद दिलानेवाला माना जाता था तब भी बीबीसी के प्रसारण सुनने की भारतीय श्रोताओं की ललक बरकरार थी.

पापा पंचायत विभाग में काम करते थे. प्रतिदिन सुबह-शाम रेडियो पर आॅल इंडिया रेडियो के समाचार सुनवाना पापा की नौकरी का हिस्सा था.

मैं तब पांचवी में था उम्र 12 साल. मुझे याद है गांव के सुननेवाले मेरे माध्यम से बीबीसी लगवाने का आग्रह करते थे और मैं उनकी सिफारिश पापा तक पहुंचाता था.

हमारे गांव में बीबीसी की हिन्दी प्रसारण सेवा खूब सुनी जाती थी.

भारत पाक युद्ध, ऑपरेशन ब्लू स्टार, जेपी का आंदोलन या फिर आपातकाल ये बीबीसी की विश्वसनीयता ही थी कि देश के हाल की सच्ची खबरें हमें बीबीसी से मिलती थीं.

मार्क तुली या रत्नाकर पांडे की आवाज़ें आज भी मन में रची-बसी हैं. मुझे लगता है कि बीबीसी एक विश्वास है और विश्वास का कोई विकल्प नहीं होता.

संदीप कुमार- ''बीबीसी से लगा ख़बरें सुनने का चस्का''

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पहले समाचारों में मुझे कोई रूचि नहीं होती थी. लेकिन बीबीसी हिंदी के उद्घोषकों की आवाज से आकर्षित होकर मुझे ख़बरें सुनने का चस्का लगा.

ज़िंदगी में कई पड़ाव आए, कई जगहें बदलीं लेकिन बीबीसी का साथ कभी नहीं छूटा.

चाहे पढ़ाई हो या काम बीते 25 सालों में शायद ही कभी ऐसा दिन आया हो जब मैंने बीबीसी नहीं सुना हो.

एक बार मेरे स्कूल के दिनों में बीबीसी हिंदी ने फुटबाल विश्वकप के दौरान श्रोताओं के लिए एक प्रतियोगिता का आयोजन किया.

इसमें जीतने वालों को पुरस्कार में रेडियो दिया जाना था. मैंने जवाब ढूंढने के लिए कई समाचारपत्र और मैगज़ीन पढ़ डाले.

मैंने सारे उत्तर खोज लिए और बीबीसी को चिट्ठी भी भेजी. लेकिन जब लॉटरी में नाम नहीं निकला तो मैं बहुत दुखी हुआ था.

लेकिन तीन साल पहले जब प्रिय राष्ट्रपति नाम से कार्यक्रम में मेरा पत्र चयनित हुआ और प्रकाशित तो मैं बहुत खुश हुआ.

जितेंद्र कुमार पांडे- ''आवाज़ें आज भी कानों में गूंजती है''

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बचपन में पिताजी के रेडियो पर हर रविवार राज नारायण बिसारिया से 'चौपाल' सुनता था. बड़े हुए तो आजकल में 'काम की बातें' सुना करता था.

ठीक से याद नहीं लेकिन शायद उसे परवेज़ आलम प्रस्तुत करते थे. मुझे याद है इस कार्यक्रम को सुनने के लिए घर से बहुत दूर दोस्तों के यहां जाना पड़ता था.

फिर वर्षांत में प्रस्तुत किए जाने वाले रेडियो नाटक और बीबीसी हिन्दी के श्रोता कवि आत्मा, जंग बहादुर के पत्र आज भी याद हैं.

ओमकार जी, ममता जी, अचला जी की शहद मिश्रित आवाज़ आज भी कान में गूंजती है.

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